रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 421, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुछ ही समय के पश्चात् इन्द्रजीत की चेतना लौट आई । वह चिंतित होकर
सोचने लगा- 'यह कैसी विचित्र बात है कि एक मानव ने मुझे इतना व्याकुल कर दिया ।
इसके पहले के युद्धों में मैंने कभी ऐसी व्याकुलता का अनुभव नहीं किया था । समय की
गति प्रबल है, कोई उसके प्रतिकूल जा नहीं सकता।' इस प्रकार चिंता से पीड़ित हो वह
दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए धनुष पर बाण का संधान करने की इच्छा नहीं रहने के कारण
चुपचाप शत्रु को देखता रहा । तब सभी देवता रामानुज की प्रशंसा करने लगे ।
इंद्रजीत के कांतिहीन तथा विवर्ण मुख को देखकर वानर हर्ष-ध्वनि करने लगे ।
तब वीराग्रणी प्रमाथी, मेघ-सदृश विशालकाय एवं मेघनिस्वन शरभ तथा ऋषभ ने पर्वत-
शृंगों को, इन्द्रजीत के रथ पर फेंककर अश्वों के साथ रथ को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ।
इस पर विपुल क्रोध से इन्द्रजीत ने सिंहनाद करके विभीषण के ललाट को तथा लक्ष्मण के
वक्ष को लक्ष्य करके तीन-तीन पैने बाण चलाये और धनुष का टंकार करते हुए सिंह-गर्जन
किया । तब विभीषण ने क्रोधोन्मत्त हो, आँखों से अग्नि-कणों की वर्षा करते हुए पाँच
बाण ऐसे चलाये कि वे उस राक्षस के वक्ष को पार कर निकल गये । तब इन्द्रजीत ने
क्रोध से अपने पिता (विभीषण) पर आग्नेय बाण चलाया । उसको आते देखकर लक्ष्मण ने वारुणास्त्र
का प्रयोग किया । दोनों शर आपस में टकराकर पृथ्वी पर गिर पड़े । उसके पश्चात् उस
राक्षस-कुमार ने उरगास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने गरुडास्त्र के प्रयोग से उसको विफल कर
दिया । फिर, उसने कुबेरास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने ऐन्द्रास्त्र से उसे खंडित कर डाला ।
तब दानव ने गंधर्वास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने उसे रौद्रास्त्र से काट डाला । उन दोनों का
युद्ध प्रलय-काल में पृथ्वी की दशा का स्मरण दिला रहा था। उस समय सौमित्र की रण-
क्लान्ति को मिटाने के लिए मानो, मंद-मंद पवन चलने लगा ।
तब लक्ष्मण ने यम की भाँति क्रूर हो इन्द्रजीत को देखकर अपने धनुष की ऐसी
ध्वनि की कि दिशाएँ विदीर्ण-सी हो गईं । और, उसके पश्चात् उन्होंने भयंकर सिंहनाद
करके, देवेन्द्र से प्राप्त ऐन्द्रास्त्र को अपने धनुष पर चढ़ाया और कहा-- 'यदि रामचन्द्र
धर्मात्मा हैं, यदि देवी सीता पतिव्रता हैं, यदि देवताओं की कृपा मुझ पर है, यदि इन्द्र
आदि देवताओं का हित (इन्द्रजीत के अंत से) होनेवाला है, तो यह महान् शर इन्द्रजीत
का सिर काट देगा।' इस प्रकार कहते हुए उन्होंने लक्ष्य साधकर इन्द्रजीत पर वह बाण
चलाया । रत्न की नोक से सुशोभित वह बाण, समस्त आकाश में व्याप्त हो, घोर वज्र के
समान भीषण रूप धारण किये हुए, क्रूर गति से चल पड़ा । उस शर ने विहगेन्द्र के सदृश
वेग के साथ, सर्प के मुख से निकलनेवाले अग्नि-कणों की चंचलता लिये हुए, सूर्य-बिंव की-सी
भयंकर दीप्ति से प्रज्वलित होते हुए, अपनी कांति से पृथ्वी तथा आकाश को भरते
हुए उग्र दंड देने के उद्देश्य से भयंकर बनकर उस राक्षसेन्द्र के पुत्र पर आक्रमण किया ।
उस महान् उद्दण्ड अस्त्र ने अनुपम मणिकुंडलों तथा ललित अरुण अक्षतों से अलंकृत इन्द्रजीत
के सिर को मुकुट के साथ पृथ्वी पर गिरा दिया, मानो (लक्ष्मण ने) लंका की निधि सिद्ध
करने की इच्छा से प्रेरित हो, उसके पहले बलि देने के लिए, एक जंगली भैंसे का सिर
काट लिया हो । युद्ध-क्षेत्र में गिरे हुए इन्द्रजीत को देखकर, लक्ष्मण विजय-लक्ष्मी से