रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ रंगनाथ रामायण
हनुमान् ने उन्हें देखकर कहा--'हे कपि-वीरो, अपने पराक्रम का प्रदर्शन करना छोड़कर
भाग जाने का क्या यही समय है ? क्या, तुम युद्ध-धर्म को नही जानते ? क्या, युद्ध-क्षेत्र
ने भागना, अपने वंश के लोगो को कलंकित करना नही है ? मैं आगे-आगे चलता हूँ,
तुम मेरा अनुगमन करो ।'
हनुमान् के वचन सुनकर सभी वानर पर्वत-शृंग तथा वृक्षो को उठाये हुए, गर्जन
करते हुए हनुमान् के पीछे-पीछे चले और राक्षसो पर उन पर्वतो तथा वृक्ष को फेंकने
लगे । पवन-कुमार ने भी क्रोध मे एक महान् पर्वत को उखाडकर उस राक्षस पर फेंका ।
तब इन्द्रजीत के सारथी ने रथ को तुरत दूसरी ओर फिरा लिया, तो वह पर्वत भयंकर
ध्वनि के साथ पृथ्वी पर आ गिरा । इतने में वानर फिर से पर्वतों तथा वृक्षो को ला-
लाकर राक्षस-सेना पर फेंकने लगे । वानरो के प्रहारो से अपनी सेना को नष्ट होते देख
रावण का पुत्र क्रुद्ध होकर शूल, मुद्गर तथा खड्गो के प्रहार से वानरो का संहार करने
लगा । तब मारुति ने अत्यंत क्रोधोन्मत्त हो अपने भयंकर रण-कौशल का प्रदर्शन करते
हुए राक्षसो पर शिलाओ तथा वृक्षो की वर्षा करके राक्षसो को भगा दिया । इसके पश्चात्
उसने वानरो को देखकर कहा--'हे वानरो, इस अधम राक्षस ने राम की पत्नी सीता का
वध कर दिया है । हमारा कार्य बिगड गया है । अब हमें युद्ध करने की आवश्यकता ही
क्या है ? मै यह समाचार राघव को सुनाने के लिए जा रहा हूँ । उसके पश्चात् राम जो
आज्ञा देंगे, वही हम करेंगे । अब तुम सावधान होकर रहो । यह राक्षस महान क्रूर है ।'
१०१ इन्द्रजीत का निकुंभिल-यज्ञ करना
इस प्रकार कहने के पश्चात् हनुमान् को जाते हुए देखकर रावण का पुत्र मन-ही-
मन सोचने लगा—'यह बली यहाँ से चला गया, अब मेरे यज्ञ में विघ्न डालने की शक्ति
किसी में नही है ।' यों सोचकर वह राक्षस रक्त-मांसो से अनल को तृप्त करते हुए
निकुंभिल-यज्ञ करने का प्रयत्न करने लगा । इधर राम ने पश्चिम दिशा में अत्यधिक
कोलाहल सुना, तो शीघ्र जांबवान् को बुलाकर कहा--'पश्चिम दिशा में विपुल घोष सुनाई
पड़ रहा है । न जाने, हनुमान् पर कोई विपत्ति आ पडी हो । तुम शीघ्र ही सेना के
साथ जाओ और वहाँ के विपुल घोष के संबंध में पता लगाकर आओ ।'
राम का आदेश पाकर ऋक्षेश (भालुओ का राजा) शीघ्र ही अपने एक करोड
रीछ-सैनिको के साथ पश्चिम द्वार की ओर चल पडा । मार्ग-मध्य में ही वायु-पुत्र उससे
मिला । वायु-पुत्र ने जांबवान् को देखकर इंद्रजीत के कार्य के संबंध में बताया और कहा-
'मैं यह समाचार रामचंद्रजी को सुनाकर अभी आता हूँ; मेरे आते तक तुम इसी स्थान
पर डटे रहो । शक्तिशाली शत्रु के संबंध में असावधान नहीं रहना चाहिए ।' यों समझाकर
पवन-पुत्र ने जांबवान् को भेज दिया और स्वयं राघव के पास चला । राघव हनुमान् को
दूर से ही देखकर सोचने लगे, 'क्या कारण है कि हनुमान् का मुखमण्डल अग्निवत्
(तमतमाया हुआ) दीख रहा है ? न जाने क्या बात है ?' इतने में वायु-पुत्र राम के
निकट आ पहुँचा और उन्हें प्रणाम करके कहा--'हे देव, मैं आपसे क्या विनती करूँ ?
हम सब अपने प्राण हथेली पर लिये राक्षसो से युद्ध कर रहे थे कि इन्द्रजीत भूमि-सुता