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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 508 में से

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पृष्ठ 402

३७२ रंगनाथ रामायण
सभी वानर-सैनिक राम के पास भागे और उन्हें सारा वृत्तांत कह सुनाया । राम ने
जांबवान् आदि श्रेष्ठ वानर-वीरों को कुंभ के साथ युद्ध करने के लिए भेजा । वे वृक्षों
तथा शिलाओं को फेंकते हुए राक्षस-सेना को भगाने लगे । तब कुंभ ने अनेक पैने शरों
को चलाकर वानर-वीरों के आक्रमण को रोका और अपनी सेना को आश्वस्त किया ।
कपि-वीरों तथा अंगद को युद्ध-भूमि में मूर्च्छित गिरे देखकर सुग्रीव क्रोधोन्मत्त होकर असंख्य
विशाल पर्वत तथा अश्व-कर्ण वृक्षों को उखाड़कर उनसे दानवों पर प्रहार करने लगा ।
किन्तु, देखते-ही-देखते कुंभ ने उन सब को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और रवि-पुत्र पर कई
बाण चलाकर उसे अत्यधिक पीड़ा पहुँचाई । फिर भी, विचलित न होकर सुग्रीव ने उस
राक्षस के धनुष को छीनकर उसे खंड-खंड कर दिया । दाँत तोड़ने से जैसे हाथी क्रोध से
अपने शत्रु पर झपटता है, वैसे ही कुंभ क्रोधावेश से सुग्रीव को मार डालने का निश्चय
करके, उसकी ओर लपककर उससे जूझ गया । उस समय वे दोनों ऐसे लगते थे, मानो
दो हाथी आपस में भिड़कर लड़ रहे हों । इस प्रकार, दोनों उद्धत हो, अपनी श्रेष्ठ भुज-
शक्ति को प्रदर्शित करते हुए, अपने चरण-ताड़नों से पृथ्वी को कँपाते हुए धुएँ के समान
लंबी साँस छोड़ते हुए, परस्पर ऐसे टकराते थे कि उनके आघातों से सारा आकाश विदीर्ण
हो जाता था ।
९४. सुग्रीव के द्वारा कुंभ का वध
निदान, सुग्रीव ने उस कुंभ को उठाकर चारों ओर वेग से घुमाया और उसे समुद्र
में फेंक दिया, तो सभी देवता हर्ष की ध्वनि करने लगे । वह राक्षस समुद्र में ऐसे जा गिरा,
मानो मंदराचल ही समुद्र-तल में गिर गया हो । किन्तु, वह राक्षस फिर अत्यधिक वेग से
सूर्य-पुत्र के समक्ष पहुँच गया और अत्यंत क्रोध से सुग्रीव के वक्षस्थल पर अपनी-
मुष्टि से ऐसा प्रहार किया कि उसका प्रभाव सुग्रीव की हड्डियों पर भी पड़ा और अग्नि-
कण ऐसे छितरा गये, जैसे वज्रपात होने से कनकाद्रि से अग्नि-कण निकलते हों । इससे
क्रोधाग्नि से जलते हुए सूर्य-पुत्र ने उस नीच राक्षस के वक्षःस्थल को लक्ष्य करके अपनी
मुष्टि से ऐसा तुला हुआ प्रहार किया कि राक्षस अपनी शक्ति खोकर पृथ्वी पर लुढ़ककर
मर गया । शांत अग्नि के समान, प्रताप से हीन हो जब वह गिर गया, तब सभी राक्षस
भयभीत हो, ऐसे भागने लगे कि सारी पृथ्वी हिल उठी और सभी समुद्र आलोड़ित
हो उठे ।
अपने अग्रज को इस प्रकार गिरते हुए देखकर निकुंभ की आँखों से अग्नि-कण निकलने
लगे । वह क्रोधावेश से सिंहनाद करके, कनक-रत्न-प्रभा से युक्त तथा सतत पुष्प-चंदन से अर्चित
अपने परिघ को ऐसे घुमाने लगा कि समस्त ब्रह्माण्ड टूटता हुआ-सा दीखने लगा, सभी
दिशाएँ चटकती-सी दिखाई पड़ने लगीं और वायु-पाश टूटते-से दीखने लगे । तब हनुमान्
सुग्रीव की सहायता के लिए आ पहुँचा और गर्जन करते हुए स्वयं उस राक्षस का सामना
किया । तब राक्षस ने क्रोधोन्मत्त हो अपना परिघ मारुति के वक्ष स्थल पर चलाया । उस
प्रहार से चारों ओर अग्नि-कण छिटक पड़े और परिघ आश्चर्यजनक ढंग से चूर-चूर
होकर हनुमान् के वक्ष की कठोरता को प्रकट करने लगा । उस आघात के कारण