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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 508 में से

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पृष्ठ 403

हनुमान् स्वयं ऐसा हिल गया, जैसे प्रचंड वायु के कारण कोई विशाल वृक्ष डोलने लगता है ।
फिर भी, अत्यंत धैर्य के साथ हनुमान् ने निकुंभ के वक्ष पर अपनी मुष्टि का ऐसा
प्रबल प्रहार किया कि उसका वक्ष विदीर्ण हो गया और रक्त की धारा फूट निकली ।
निकुंभ भी प्रचण्ड वायु-वेग से आहत वृक्ष की भाँति काँप गया और शीघ्र ही सँभलकर
उद्धत गति से हनुमान् को ऊपर उठा लिया । यह देखकर सभी दानव हर्ष की ऐसी ध्वनि
करने लगे कि सारा आकाश काँप उठा । किन्तु, कपि-पुंगव हनुमान् ने अपने-आपको शीघ्र ही
उसके हाथों से छुड़ा लिया और युद्ध-भूमि पर कूद गया । उसने अपनी मुष्टि से
निकुंभ पर प्रबल प्रहार किया और उसे उठाकर पृथ्वी पर ऐसे पटका कि उसकी हड्डियाँ
चूर-चूर हो गईं । फिर, उसने उस राक्षस की छाती पर चढ़कर उसका सिर काट डाला
और ऐसा भयंकर गर्जन किया कि सभी दिशाएँ हिल उठीं और पृथ्वी, आकाश, समुद्र एवं
सारा दिङ्‌मण्डल उस ध्वनि से गूँजने लगा ।
हतशेष राक्षस शीघ्र लंका में रावण के निकट पहुँच गये और कुंभ-निकुंभ आदि छह
शक्तिशाली वीरों की मृत्यु का समाचार कह सुनाया । तब रावण ने अत्यंत क्रुद्ध होकर
खर के योग्य पुत्र मकराक्ष को बुलाकर कहा--'तुम अपनी विशाल सेना को साथ लेकर
अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए राम-लक्ष्मण तथा उन वानरों का संहार करके आओ ।'
९५ मकराक्ष का युद्ध
रावण का आदेश पाकर मकराक्ष अत्यधिक उत्साह से भर गया कि मुझे अपने
पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का अवसर मिल गया । हर्ष से उसकी छाती फूल गई ।
उसने रावण को प्रणाम किया और उसकी आज्ञा लेकर रथ पर आरूढ़ होकर चल पड़ा ।
उसने रणोत्साह से फूलते हुए अपने निकट उपस्थित वीरों को देखकर कहा--'तुम उग्र
रूप से कपियों से युद्ध करो । मैं अपने भीषण शरों की अग्नि से राम-लक्ष्मण को तथा
वानरों को छिन्न-भिन्न करके उनका नाश करूँगा ।'
उसके आदेश को स्वीकार करके सभी दानव उसके पीछे-पीछे चलने लगे । चलते
समय उन्हें कई दुःशकुन दिखाई पड़े । किन्तु, उन सबकी उपेक्षा करके तुरही-नाद तथा
सिंहनाद करते हुए राक्षस-सेना कपि-सेना पर ऐसे टूट पड़ी कि पृथ्वी तथा आकाश
विचलित हो गये । वानरों ने दैत्यों पर पर्वतों तथा वृक्षों की वर्षा की, तो दानवों ने गदा,
दंड, कोदंड, खड्ग आदि महान् शस्त्रों की सहायता से उन सबको शीघ्र ही खंडित कर
दिया और अपने शस्त्रों के प्रहार से वानरों को व्याकुल करके सिंह-गर्जन किया । उस
समय मकराक्ष ने सभी वानरों पर अपना रथ वेग से चलाते हुए उन पर कभी तीस,
कभी सौ, कभी साठ, कभी पैंसठ, कभी बीस, कभी छब्बीस, कभी छह, कभी बारह, कभी
दो, कभी दस, कभी पन्द्रह, कभी अठारह, कभी तेरह, कभी चार, कभी चौदह, कभी तीन,
कभी पाँच, कभी सात और कभी नौ बाण चलाकर उन्हें पीड़ित कर दिया ।
उन अस्त्रों को सह न सकने के कारण सभी वानर इस वेग से भागने लगे कि
पृथ्वी भी काँप उठी । तब राम ने धनुष उठाकर वानरों को आश्वासन देते हुए कहा--
'भयभीत होकर भागो मत, मैं अभी आता हूँ', यों कहते हुए राम राक्षसों की चतुरंगिणी

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