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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 508 में से

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पृष्ठ 414

में अपने भयकर वाणो की अग्नि से राक्षसो के साथ सारी लका को शीघ्र ही भस्म
कर दूंगा ।”
१०३. इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवों को समझाना
लक्ष्मण के इन वचनो को सुनते ही विभीषण ने राम की मूर्च्छा दूर करने का सफल
प्रयत्न किया। जब उनकी चेतना लौट आई, तब वह कहने लगा--'हे देव, यह सब इन्द्र-
जीत की माया है । सीता पर कोई विपत्ति नही आई है । मेरी बातो पर विश्वास
कीजिए । उस पापात्मा दशकठ के मन का भेद मैं भली भाँति जानता हूँ । मैने उसे
कितना समझाया कि तुम सीता को राम के चरणो में सौंप दो । किन्तु, उसने मेरे हित-
वचनो पर कान नही दिया । ऐसा रावण, भला, सीता का वध क्यो करायेगा ? हे राजन्,
सभव है कि यह उसकी माया हो । यदि सीता का वध सत्य होता, तो क्या अबतक
सभी लोक नष्ट-भ्रष्ट नही हो जाते ? यह असत्य ही है । आप चिंता क्यो करते हैं ?
मैं अभी जाता हूँ और सीता का कुशल जानकर आता हूँ ।'
उसके पश्चात् विभीषण ने राम की अनुमति पाकर, अपना विशाल रूप छोडकर
सूक्ष्म रूप ग्रहण किया और राक्षसेश्वर के वन में निर्विघ्न चला गया, वहाँ सीता को
देखकर तुरत लौटा और रामचंद्र को प्रणाम करके बडी भक्ति के साथ सारा समाचार
कह सुनाया । उसकी बातें सुनकर राम ने कहा- 'हे विभीषण, इन्द्रजीत ने युद्ध-भूमि में
ऐसा क्यो किया ?' तब विभीषण ने कहा- 'हे देव, उसने आसुर होम करने का सकल्प
किया है । हनुमान् आदि वानर-वीरो को निरुत्साह करके उन्हें आपकी सेवा में भेजने
के निमित्त ही उसने यह उपाय किया है । उसकी योजना सफल हुई और उसके यज्ञ में
विघ्न डालनेवाला वहाँ कोई नही रह गया । यह देखकर उसने निकुभिल में यज्ञ प्रारभ
कर दिया है । हे देव, यदि वह निष्ठा तथा भक्ति-युक्त मन से विधिवत् यज्ञ को पूरा
कर लेगा, तो देव तथा दानव कोई भी उस वीर को जीत नही सकेंगे । अत, हमें उस
राक्षस के यज्ञ में विघ्न डालना चाहिए । हे राजन्, हम अभी अपनी सेना के साथ उसके
यज्ञ में विघ्न डालने के निमित्त जायँगे, आप लक्ष्मण को हमारे साथ भेजिए । दशकठ
के पुत्र इन्द्रजीत आज निकुभिल वन में यज्ञ के अनुष्ठान में लगा हुआ है । लक्ष्मण आज अपने
प्रचड वाणो से उसे वध कर डालेंगे । यज्ञ का अनुष्ठान पूरा होने के पहले ही यदि उसको
हम दण्ड नही देंगे, तो यज्ञ की समाप्ति पर वह ब्रह्मा से ब्रह्माग्निर नामक शर, धनुष, कवच,
खड्ग, दो तूणीर, कई मत्र-पूत अस्त्र और देवाश्वो से तथा सुदर ध्वजा से युक्त, वायु-
वेग से चलनेवाला रथ, उस होम-कुड से निकलेंगे । यदि इन्द्रजीत उस रथ पर आरूढ
होकर अपने हाथ में वह धनुष सँभाले, तो देवासुर भी उसके समक्ष खडे नहीं
रह सकेंगे । इसके पहले, ब्रह्मा ने उसे वर-प्रदान करते समय उससे कहा था कि यदि तुम
निकुभिल-यज्ञ करोगे तो सब प्रकार से अजेय हो जाओगे । यदि यज्ञ के बीच में विघ्न
उपस्थित हो और यज्ञ अधूरा रह जाय, तो तुम युद्ध में शत्रुओं के द्वारा मारे जाओगे ।
इसलिए हे राजन्, आप युद्ध का आवश्यक प्रयत्न कीजिए और इन्द्रजीत का वध करवाइए ।
यदि यह मायावी मारा जाय, तो निश्चय समझिए कि देवताओ का शत्रु दशकंठ भी मर गया ।