रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 415, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ३८५
१०४. लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान
तब रघुराम ने अपने अनुज से कहा—'हे अनघ, वीर इन्द्रजीत वादलों में तिरोहित
होनेवाले सूर्य की भाँति अपनी माया से अपनी गति को प्रकट किये बिना विचरण करने
के लिए यज्ञ कर रहा है । उस वीर को इन्द्रादि देवता भी युद्ध में जीत नही सकते ।
अपने मन्त्रियों के साथ विभीषण उस यज्ञ को तुम्हें दिखायगा । हे सौमित्र, तुम जाओ और
यज्ञ पूरा होने के पहले ही उस राक्षस का वध कर डालो । शक्तिशाली भालुओं की
सेना के साथ पराक्रमी जाम्बवान् तथा विजय और विक्रम में धुरंधर हनुमान् भी तुम्हारे
साथ जायेंगे ।' इतना कहकर रघुराम ने अपने अनुज को समुद्र के दिये हुए वज्र-कवच,
श्रेष्ठ खड्ग, दो तूणीर, धनुष तथा श्रेष्ठ आभूषण आदि देकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए
कहा—'हरि, तुम्हें सतत विजय प्रदान करें, शंकर तुम्हें सब प्रकार के शुभ दें, ब्रह्मा
तुम्हें दीर्घायु दें, समस्त देवता सभी दिशाओ में तुम्हारी रक्षा करें, अनल तथा अनिल
आगे और पीछे तुम्हारी रक्षा करते रहें ।'
तब लक्ष्मण ने अत्यत उत्साह से धनुष सँभाला, कवच धारण किया, तूणीर कसे,
खड्ग लिया और विविध आभूषणो से विलसित हो, राम को भक्ति के साथ प्रणाम किया
और बडे साहस के साथ कहने लगे--'हे देव, कमल-सरोवर में हंसो के प्रवेश होने की
भाँति, श्वेत पखवाले मेरे बाण आज इन्द्रजीत को पार करके लका में गिरेंगे । रूई के ढेर
की भाँति मैं अपनी बाणाग्नि से उसे भस्म करूँगा ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होंने रामचन्द्र की आज्ञा लेकर, गरुड पर आरूढ विष्णु की
भाँति हनुमान् पर आरूढ हो, वानर-सेना तथा जाम्बवान् आदि वीरो के साथ युद्ध के लिए
प्रस्थान किया । निदान, वे वहाँ से तीस योजन दूर स्थित निकुभिला के पास पहुँचे ।
१०५ निकुंभिला-होम में विघ्न
यज्ञ-भूमि, मत्त गज, उत्तम अश्व, श्रेष्ठ रथ, तथा पदचर सेना से घिरी हुई भयकर
एव अभेद्य प्रतीत होती थी । सारी सेनाएँ बिना कल-कल ध्वनि के, तरग-हीन समुद्र की
भाँति दिखाई दे रही थी । ऐसी राक्षस-सेना को देखकर महान् शस्त्रास्त्रो से सपन्न सौमित्र
से विभीषण ने कहा--'हे अनघ, इस महान् सेना को जबतक आप अपने बाण-समूह से
काट नही डालेंगे, इन्द्रजीत हमें दिखाई नही देगा, इसलिए आप अपने श्रेष्ठ बाणो से
पहले इस सेना का सहार कीजिए । उसके पश्चात् हालाहल के सदृश भयकर अपनी बाणाग्नि
मे इस दुरात्मा का सहार कर डालिए, जिसमे इसका प्रारभ किया हुआ यज्ञ पूरा
न हो ।'
विभीषण की सलाह के अनुसार सौमित्र ने अपनी आँखो से अग्नि-कणो की वर्षा-सी
करते हुए राक्षस-सेना पर विविध बाण चलाये । तुरत ही अतीव बलशाली वानर राक्षसो
पर पर्वतो तथा वृक्षो की वर्षा करने लगे । राक्षसों ने अत्यधिक क्रुद्ध होकर, परिघ चलाते
हुए, गदाओ से प्रहार करते हुए, करवालो से मारते हुए तथा भिन्न-भिन्न महान् शस्त्रो से आधान
करते हुए विविध रीतियों से वानरो पर आक्रमण किया । ऐसी भयकर गति से भिडे हुए
वानर तथा राक्षस-सेनाओ के भीषण गर्जनो से लका डोल उठी । राक्षस-सेना नष्ट होने
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