रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकाण्ड ३७५
विदा लेकर अपने भाइयो की मृत्यु का स्मरण करके, अत्यत क्रुद्ध हो, बडे दर्प के साथ
वह आगे बढा । उसके पीछे असख्य दानव-सेना तथा काम-रूप मत्री उसकी सेवा करते
हुए चले । उसी समय साठ करोड, चार दाँतवाले विशालकाय गज तथा भेरुण्ड पक्षी
के समान बृहदाकार, तोते के रगवाले चार करोड घोडे उत्तर द्वार मे निकले । ऐसी
घोर युद्ध-सज्जा से युक्त हो इद्रजीत निसानो की भयावह ध्वनि के वीच लकापुर से निकला
और वानर-वीरो के दुर्वार गर्जनो की ध्वनि से गुजायमान होनेवाली युद्ध-भूमि में जा पहुँचा ।
९७. इन्द्रजीत का होम करना तथा कृत्ति नामक शक्ति प्राप्त करना
युद्ध-भूमि में पहुँचकर इन्द्रजीत रथ से उतरा और चारो ओर दैत्यो को खडा
किया । एक त्रिकोणाकार वेदी बनाई और दक्षिण दिशा से श्मशान की सिद्ध-अग्नि ले
आकर उसे वेदी पर प्रतिष्ठित किया । उसके पश्चात् उसने बडी भक्ति से रक्त वर्ण के
वस्त्र, माला तथा चदन धारण किये, दण्ड, उपवीत तथा मौर्जी (मूंज की करधनी) धारण
की और सपूर्ण मन से खट्वाग का ध्वज स्थापित किया, महान् निष्ठा से कपाल पर आसीन
होकर ककाल की परिधि बनाई और दक्षिण दिशा में लोहे के स्रुक् तथा स्रुवा सजाये ।
फिर, उसने कृष्ण वर्ण के यज्ञ-पशुओ के रक्त तथा मास अग्नि-कुड में डालकर मौन
धारण किया । तत्पश्चात् अथर्ववेद की विधि के अनुसार अविराम मत्रोच्चारण करते हुए
स्रुक्-स्रुवाओ को अपने हाथ में लेकर उस प्रज्वलित अग्नि में विधिवत् ताड की
समिधाओ, तिल तथा सरसो का हवन किया और उस होम के धूम से समस्त ब्रह्माण्ड
को भर दिया । उस समय उस अग्नि-कुड से एक विशाल रथ निकला । फिर, भयकर
केश, भयावह रूप तथा कपाल, चमकनेवाली डाढें, अस्थि की मालाएँ तथा अग्नि-ज्वालाओ
को उगलनेवाली आँखो से युक्त हो, निरतर अट्टहास करती हुई दहाडनेवाली एक (कृत्ति) देवी
निकली । उस देवी ने कहा--'हे देव-वैरी, जो भी कार्य हो, मुझे सौपो। मै उसे सपन्न
करूँगी । उस देवी को पहचानकर, इन्द्रजीत अस्त्रो को तथा उसको लिये हुए, रथ पर
बैठे, आकाश में चला गया और वानरो पर आक्रमण करने के लिए छिपा रहा । उसकी
सारी सेना लका को लौट गई ।
इन्द्रजीत कपि-सेना पर घोर शर-वृष्टि करके उन्हें विवश कर दिया । शिलाओ
की वर्षा के कारण चारो ओर उडनेवाले पक्षियो की भाँति कुछ वानर तितर-वितर होकर
भाग गये । कुछ वानर अपना प्रताप खोये हुए रहे । कुछ घायल होकर लाल रग की
नदियो से युक्त पर्वतो के ढहने की भाँति रक्त-धाराएँ बहाते हुए पृथ्वी पर गिरने लगे ।
उस राक्षस-कुमार के वाणो के कारण चारो ओर अधकार व्याप्त हो गया । वानर-वीर
अतरिक्ष में छिपे हुए इद्रजीत को देख नही सकते थे । इसलिए, वे उन वाणो को रोकने
का कोई उपाय भी नहीं कर सकते थे । किन्तु, इन्द्रजीत अविराम गति से भूमि तथा
आकाश को अपने वाणो से भरने लगा । उन पैने वाणो से कुछ वानरों की कमरें कट
गई, कुछ चूर-चूर हो गये, कुछ खण्ड-खण्ड होकर मिट्टी में मिल गये । कुछ इद्रजीत के
वाण लगते ही, युद्ध करने के लिए लाये हुए वृक्षो को, पृथ्वी पर छोड़कर भूमि पर
लोट गये ।