रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 410, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० रंगनाथ रामायण
इन्द्रजीत के वाणो से सैकडो कपियो को मरकर ढेर होते देखकर, सौमित्र ने क्रोध
से अपने भाई से कहा—'हे देव, इस राक्षस के हाथो से वानरो का सर्वनाश हो गया है।
तब भी आप ऐसे चुप साधे क्यो है ? वहाँ देखिए, भालुओ के नेता सभी दिशाओ में गिर-
कर लोट रहे हैं और अनेक वानरनायक नष्ट हो गये है । हे प्रभु, सभी वानर आपका
भरोसा करके बडी भक्ति के साथ युद्ध में आये और इन्द्रजीत के दारुण अस्त्रो से आहत
होकर गिरते हुए आपका ही नाम ले रहे हैं । शत्रु ने आपकी सारी सेना को समाप्त कर
दिया है । अब आप यदि इसे नही रोकें, तो अनर्थ हो जायगा । हे सूर्यवंशतिलक, शत्रुओ
का सर्वनाश करने की क्षमता रखनेवाले आपके बाण चारो दिशाओ में व्याप्त होकर अपने
दिव्य शरीर धारण किये हुए रहते हैं । आप उन्हें ग्रहण करके शत्रु का वध कर डालिए ।
इन शत्रुओ की शक्ति ही क्या है कि आपका सामना करके युद्ध कर सकें ? ऐसे शांत
रहना क्षत्रिय के लिए उचित नही है । आप ऐसी चिंता में क्यो पडे हैं ? हे सूर्य-सम
तेजस्वी प्रभु, आप अपने भुज-बल तथा पराक्रम का विचार ही नही करते । हे नाथ,
आपकी भक्ति करनेवाले मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आप चिंता क्यो करते हैं ? आपकी
कृपा से मै स्वय इस नीच दानव का वध करने में समर्थ हूँ । मै अभी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग
करके इस कुटिल राक्षस-वंश का नाश करता हूँ ।'
तब राघव ने अपने अनुज से कहा—'हे लक्ष्मण, केवल इस एक के कारण अनेक
का सहार करना क्या उचित है ? जो लोग युद्ध में भाग नही लेते हैं, क्या, उनका भी
सहार करना ठीक है ? उसे ब्रह्मा का यह वर प्राप्त है कि यह देव-दनुज तथा रुद्रादि
देवो के द्वारा नही मरेगा , उस वर के गौरव की रक्षा करने के लिए ही मै अबतक
इसके औद्धत्य का सहन कर रहा हूँ । अब भी यदि यह युद्ध-भूमि में रहा, तो मै स्वय
इसका सहार करने की क्षमता रखनेवाले वीर-वानरो को भेजूँगा । वे ही बुरी तरह इसे
पीडित कर सकेंगे । यदि ऐसा नही हो सका, तो भले ही यह मेघनाद, इन्द्रलोक में
आश्रय ले, ब्रह्मलोक में शरण ले, रुद्र-लोक में छिप जाय, पृथ्वी में प्रवेश कर रसातल में पहुँच जाय,
समुद्र में डूब जाय या चाहे यम ही इसकी रक्षा करे, अथवा इसका दादा पुलस्त्य स्वयं इसे
अपनी आड में छिपा ले, फिर भी मै इसका वध अवश्य करूँगा, मै इसे छोडूंगा नही ।'
राम के इस प्रकार कहते ही उनके क्रोध की कल्पना करके इन्द्रजीत युद्ध करने की
इच्छा छोडकर अपनी भयकर सेना को साथ लिये हुए लका को लौट गया और अपने
पिता से कहने लगा—'हे दानवेन्द्र, मैने युद्ध में वानर-सेना का सर्वनाश और राम-लक्ष्मण
का मान-हरण किया है ।' उसकी बातें सुनकर रावण ने क्रुद्ध होकर कहा—'युद्ध के लिए
तुम्हारा इस प्रकार जाना और फिर लौट आना किस प्रयोजन का है ? तुम ने कौन बडा
कार्य किया है कि मेरे सामने डीग हाँक रहे हो ? राम-लक्ष्मण का वध किये बिना तुम
लौट आये और कहते हो कि सब मर गये । यदि तुम अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए
युद्ध करते, तो समस्त लोक भस्म हो जाते । अबतक जो सफलता तुम्हें मिली है, उसे
बहुत बडा मानकर तुम सतुष्ट मत होओ । अपने पराक्रम से राम लक्ष्मण को तथा वानरो
को मारकर, फिर मुझे अपना मुख दिखाओ ।'