रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 409, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मास्त्र-से रक्षित, तथा युद्ध-भूमि में अदृश्य रूप से विचरण करनेवाले एक रथ को
प्राप्त किया । उस रथ पर आरूढ होकर वह युद्ध के लिए रवाना हुआ । जाते समय
उसने राक्षस-सैनिको से कहा—'अब मैं तुम्हारे समक्ष ही उन दाशरथियो को युद्ध-क्षेत्र
में गिराकर उनसे प्रतिशोध लूँगा और अपने पिता दशकंधर के दुख को दूर करके उन्हें
विजयी बना दूँगा । मैं एक निमिष मात्र में सूर्य-पुत्र तथा अन्य वानर-पुगवों का
सहार कर डालूँगा और देखते-देखते ही युद्ध-क्षेत्र में, मैं अन्य वानर-वीरो का भी
नाश कर दूँगा ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् वह अदृश्य हो गया । राक्षसो से युद्ध करनेवाले
राघवो को देखते ही उसकी भौहें तन गईं । तुरंत धनुष का संधान करके उसने दुर्वार
गति से उन पर ऐसी शर-वृष्टि की, जैसे प्रलय-काल में बादल जल-वृष्टि करते है । यह
देखकर राघवो ने क्रोध से समस्त आकाश को उग्र वाणो से भर दिया । इद्रजीत ने तब
उन सबको खंडित करके ऐसी शर-वृष्टि कर दी कि सभी दिशाओ में अधकार-सा छा गया ।
केवल उसके विशाल एव प्रचंड कोदंड की भयकर ध्वनि, रथ की नेमियो की ध्वनि,
रथ के अश्वो की टापो की ध्वनि तथा प्रत्यचा का टकार-मात्र सुनाई पडता था, किन्तु
उस राक्षस का रूप कही दिखाई नही पडता था । इससे दोनो राजकुमार आश्चर्य से
आकाश की ओर देखने लगे । किन्तु, वह राक्षस शीघ्र उनके शरीरो के सभी अगो में
पैने बाणो से प्रहार करने लगा । तब राघवेंद्र ने क्रुद्ध होकर उसी दिशा में अपने बाण
चलाकर उसके वाणो को जहाँ-के-तहाँ काट दिया । तब भुजवली इन्द्रजीत अपने रथ को
भिन्न-भिन्न दिशाओ में चलाते हुए असंख्य शर चलाने लगा । तब उसके बाणो से क्षत-
विक्षत अंगो से राम-लक्ष्मण पुष्पित किंशुक-वृक्षो के सदृश दीखने लगे । प्रलय-काल के
बादल के सदृश अपने विशाल शरीर को छिपाये हुए दक्षिण-दिशा से इन्द्रजीत ने राघवो
को देखकर कहा—'अब तुम कहाँ जाओगे और कहाँ छिपोगे ? तुम मेरे हाथो में फँस
गये हो । अब तुम्हारी रक्षा करनेवाला कौन है ? देवता तो अब इस ओर अपना मुँह
भी नही दिखा सकेंगे । दुबले-पतले बदरो पर भरोसा करके बड़े साहस के साथ तुम युद्ध
में आकर धोखा खा गये । मेरे तीक्ष्ण वाणो की अग्नि-शिखाओ से बचकर तुम अब कहाँ
जाओगे ? उस विभीषण के वचनो पर अधिक विश्वास करके मेरी शक्ति को तुम पहचान
नही सके । मैं अभी तुम्हारा वध करता हूँ और आज ही जाकर अयोध्या में रहनेवाले
उन भरत-शत्रुघ्न का भी अत करता हूँ ।
यह सुनकर सभी वानर तथा देवता सभ्रमित-से हो गये । इन्द्रजीत क्रुद्ध होकर
कभी पश्चिम दिशा से गर्व का प्रलाप करता, तो कभी उत्तर दिशा मे धनुष का टकार
करता । फिर, पूर्व दिशा से घोर शर-वृष्टि करता और तुरंत दक्षिण दिशा मे ऐसा घोर
गर्जन करता कि पृथ्वी हिल उठती । इस प्रकार, वह भिन्न-भिन्न दिशाओ में संचार करते हुए
वानरो पर बाण चलाने लगा । तब राम-लक्ष्मण धनुष पर बाण चढ़ाये हुए शीघ्र ही,
उस राक्षस के चलाये हुए बाणो को बीच में ही तोड देते । उसके इस युद्ध-कौशल को
देखकर देवता तथा सूर्य-पुत्र आदि वानर-वीर आश्चर्य-चकित हो गये ।