रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 420, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरनेवाला गर्जन करके राक्षसों पर टूट पड़ा और पर्वत-शृंगों, वृक्षों तथा नखों और दाँतो
से शत्रुओं के ऊपर आघात करते हुए उन्हें व्याकुल कर दिया । तब राक्षस भयंकर परशु,
मुद्गर, शूल, परिघ तथा धनुष लिये हुए भयंकर गति से उनसे भिड़ गये । वानर तथा
निशाचरों का वह संग्राम ऐसा दीख पड़ा, मानो सुरासुरों का संग्राम हो । तब हनुमान् ने
क्रुद्ध होकर लक्ष्मण को नीचे उतार दिया और यम के समान एक-एक प्रहार से अनेक
राक्षसों को पृथ्वी पर गिरा दिया । उसने शैल-शृंगों तथा शाल-वृक्षों का प्रचुर प्रयोग
किया और असंख्य राक्षसों का संहार करके भयंकर सिंहनाद किया । तब विभीषण ने क्रोध
में अपने धनुष का टंकार और अपने मंत्रियों के साथ राक्षस-सेना पर टूटकर अनेक
राक्षसों का संहार किया । फिर, उसने स्वर्ण अनी से युक्त तीव्र शर इंद्रजीत के शरीर पर
चलाया । तब उसने भी क्रुद्ध होकर अद्वितीय शर यों चलाये कि वे विभीषण के वक्ष को
पार करके पृथ्वी में ऐसे गड़ गये कि पृथ्वी भी डोल गई ।
इस प्रकार, विभीषण से भयंकर युद्ध करनेवाले इंद्रजीत को देखकर लक्ष्मण क्रुद्ध
हुए और हनुमान् के कंधे पर बैठकर असंख्य तीव्र शर उस राक्षस पर चलाये । इंद्रजीत ने
भी भयंकर बाण-समूह चलाकर लक्ष्मण के बाणों को काट दिया । इस प्रकार, जब वे दोनों
एक दूसरे पर क्रूर बाण चलाने लगे, तब उन अस्त्रों से ढके हुए शरीर से युक्त वे, वर्षा
की धारा से युक्त बादलों के समान और बादलों से युक्त सूर्य-चंद्र के समान दिखाई पड़ने
लगे । उनके बाणों की तीव्र गति का वर्णन कैसे किया जाय ? ऐसा लगता था, मानो
धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाये हुए बाण जैसे-के-तैसे रहते हों और वे उन्हें छोड़ते ही न हों ।
दोनों ओर के बाण समस्त आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये कि अंधकार छा गया ।
वीर रस के आवेश में अभिभूत वे दोनों उस युद्ध-क्षेत्र में अपने-आपको भूल-से गये ।
आश्चर्य था कि उस समय उस युद्ध-भूमि में वायु का संचलन भी नहीं होता था और
अग्नि दीप्त नहीं होती थी । यह देखकर दिक्पाल, देवता, गंधर्व, यक्ष, किन्नर आदि
चकित-से होकर लक्ष्मण की प्रशंसा करते हुए उनकी शरण में आये । उन्होंने लक्ष्मण की
विजय की कामना करते हुए उन्हें कई आशीर्वाद दिये और कहने लगे—'हे सौमित्र, इस
लोक-कंटक राक्षस का आप अवश्य वध कीजिए ।'
१०८. इन्द्रजीत का वध
देवताओं के इस प्रकार कहते ही भानु-वंशज लक्ष्मण ने भयंकर सिंहनाद करके
अपने धनुष का टंकार करते हुए इंद्रजीत पर आक्रमण किया और असंख्य बाण उस पर
चलाये । उस राक्षस ने भी उन बाणों को काटकर फिर कई भीषण शर लक्ष्मण पर चलाये।
तब, लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर एक अर्द्धचंद्र बाण से उसका धनुष काट डाला, सात बाणों से
उसकी ध्वजा को गिरा दिया, एक बाण ने सारथी का सिर काट डाला, दस बाणों से
उसका वक्ष विदीर्ण करके चार बाणों से रथ के अश्वों को मार गिराया । तब रावण का
पुत्र स्वयं सारथी तथा रथिक बनकर सौमित्र पर भयंकर शरवर्षा करके अट्टहास करने लगा।
तब सौमित्र ने स्वयं रथ चलाते हुए युद्ध करनेवाले इंद्रजीत को लक्ष्य करके तीक्ष्ण बाण
चलाये, जिनके लगने से रावण का पुत्र मूर्च्छित हो गया ।