रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलगी । तब वानर-सेना भी क्रुद्ध होकर राक्षमो पर ऐसे प्रहार करने लगी कि राक्षस-
सेना अपना दर्प खोकर इंद्रजीत की आड में शरण लेने लगी ।
तबतक इन्द्रजीत यज्ञ की सफल ममाप्ति के लिए आवश्यक दो सौ दस आहुतियो
में से, एक-एक करके एक सौ नौ आहुतियाँ महावर्त्ति की ज्वालाओ में दे चुका था ।
उसी समय वानर-सेना अपने भयंकर गर्जनो से पृथ्वी को कँपाती हुई वहाँ आ पहुँची ।
यह देखकर क्रोधोन्मत्त हो इन्द्रजीत ने अपने हाथ की आहुति नीचे फेंक दी, अपनी आँखों
से चिनगारियाँ बिखेरते हुए वह युद्ध के लिए सन्नद्ध हुआ । अपने रथ पर आरूढ हो,
हाथ में अपना भयंकर धनुष लिये हुए, वह वानर-सेना पर टूट पड़ा और उन्हें अपने तीव्र
शरों के आघात से भागने के लिए विवश कर दिया । इसी बीच सौमित्र को साथ लिये
हुए विभीषण ने निकुम्भिल-वन में प्रवेश किया और घने नील मेघ की भाँति दीखनेवाले
वटवृक्ष के नीचे स्थित इंद्रजीत का हवन-कुंड दिखाकर कहने लगा—'हे सौमित्र, देखा
आपने ? युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इस राक्षस ने यहाँ यह हवन प्रारम्भ किया है
और भूतों की बलि देकर अग्नि से अद्वितीय शक्ति को प्राप्त कर शत्रुओं को जीतने का
संकल्प किया है । इसके पहले भी इसने इसी प्रकार हवन करके दुर्वार शक्ति प्राप्त की थी
और इन्द्र को जीत लिया था । वहाँ देखिए, हवनकुंड से अरुण नेत्र, अरुण केश,
अरुण वस्त्र तथा अरुणवर्ण माला धारण किये हुए काले रग का सारथी तथा अरुण अश्वों
से युक्त रथ उभर-उभरकर निकलनेवाले हैं । इंद्रजीत शीघ्र ही लौट आयेगा और
हवन से प्राप्त शक्ति से इस रथ पर आरूढ होगा । उसके पश्चात् उसे कोई भी जीत
नहीं सकेगा । अतः, हे सौमित्र, आप अपने भयंकर बाणों के प्रहार से इन्द्रजीत का महार
कीजिए ।' तुरत लक्ष्मण धनुष का भयंकर टंकार करने लगे ।
१०६. लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के वचन कहना
तब करवाल हाथ में लिये हुए, कवच धारण किये, अग्निवर्ण रथ पर सवार हो
इन्द्रजीत लक्ष्मण के समक्ष उपस्थित हुआ । उसे देखकर सौमित्र ने क्रोध से कहा—'हे
मायावी राक्षस, अब तुम्हारी माया से कोई प्रयोजन नहीं है । यदि तुम वीर हो, तो मेरा
सामना करो और अपनी सच्ची वीरता को प्रकट करते हुए मेरे साथ युद्ध करो । मैं
अवश्य तुम्हें यमपुरी को भेजूँगा । तुम भले ही कपट-रूप धारण करो या अपने निज
रूप में रहो, मैं शीघ्र तुम्हें समाप्त कर दूँगा ।'
यह मुनकर इन्द्रजीत ने रोषपूर्ण आँखों से लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे लक्ष्मण,
बालक होकर तुम ऐसा हठ क्यों करते हो ? किंचित् काल ठहरो, मैं अपने बाणों से विजय-
लक्ष्मी से तुम्हें दूर करके, तुम्हारे शौर्य का नाश करूँगा और तुम्हारे प्राण लेकर पृथ्वी पर
गिरा दूँगा और तुम्हारे शरीर को काटकर उस मास से कौओ तथा गीधो को तृप्त
करूँगा । क्या, इतने शीघ्र तुम भूल गये कि मैंने तुम्हें नाग-पाशो में बाँधा था ।'
इसके पश्चात् उसने विभीषण को देखकर क्रोध से कहा—'हे धर्म-घातक, तुम मेरे
चाचा हो, और मैं तुम्हारा प्रिय पुत्र हूँ । क्या, तुम्हें यह उचित है कि तुम मेरा अहित
करो । दुर्मति होकर कुल-द्रोह करनेवाले तुम, भला औचित्य का विचार ही कैसे करोगे ?