रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 411, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंरावण के इन वचनों को सुनकर इन्द्रजीत ने कहा--'ऐसा ही होगा', और अपने
पिता की आज्ञा लेकर वहाँ से चल पड़ा । उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि इस
भयंकर युद्ध में अतिकाय, कुंभकर्ण आदि दैत्य-वीर अपने प्राण खो बैठे हैं, इसलिए मैं किसी-
न-किसी प्रकार से राम-लक्ष्मण को अवश्य परास्त करूँगा । यो सोचकर उसने अपनी
माया से एक माया-सीता की सृष्टि की और उसे साथ लिये हुए अपनी सेना के साथ
पश्चिम दिशा की ओर रवाना हुआ । उस राक्षस के प्रताप से भयभीत हो सभी वानर
भिन्न-भिन्न दिशाओ में भागने लगे । तब हनुमान् एक महान् शैल-शृंग को उठाकर उस
राक्षस का सामना करने के लिए आया । वहाँ उसने इन्द्रजीत के रथ पर माया-सीता
को देखा । वह (माया) सीता राम की अत्यधिक विरहाग्नि से पीडित आहार तथा निद्रा
मे रहित अत्यत दुख से अभिभूत दिखाई पड रही थी । नि श्वास छोडनेवाली उस माया-
सीता का शरीर नितात दुर्बल था, मुख पीला पड गया था और उसके कमल-दल-जैसे
नेत्रो से आँसू बह रहे थे । उसके केश उलझे तथा मलिन थे । उसके सभी अग पृथ्वी पर
लोटने के कारण धूलि-धूसरित थे । वह अपना कातिहीन मुख, कर-पल्लव पर टेके हुए
इस प्रकार काँपती हुई बैठी थी, जैसे प्रचंड वायु से लता कपित होती है । उस सीता को
देखकर हनुमान् दुखी होने लगा, 'हाय भगवन्, यह राक्षस राम की पत्नी की न जाने
और क्या दुर्गति करेगा । उनकी यह दीन दशा मुझे देखना पड रहा है ।' फिर भी वायु-
पुत्र घोर वानर-सेना के साथ दारुण रूप से उस राक्षस पर आक्रमण करने का उपक्रम करने
लगा । यह देखकर दशकंठ के पुत्र ने बडी क्रूरता से हनुमान् को देखकर कहा--'रे वानर,
अब क्यो आगे बढ रहा है ? ले, सीता को यहाँ देख । इसी सीता के लिए तो तू इस
प्रकार उतावला हो रहा है ? मै अभी इसका सिर काट डालता हूँ ।'
तब वाण के सम्मुख पडी हुई हिरणी के समान दीखनेवाली सीता अपनी आँखो
से अश्रु बहाते हुए, 'हाय राम, हाय राम' कहकर आर्तनाद करने लगी । वह क्रूर राक्षस
सीता के केश पकडकर खीचने लगा । तब वायुपुत्र ने उस राक्षस से कहा--'रे दुरात्मा,
क्या, यह तुम्हारे लिए उचित है ? तुम राक्षस हो तो क्या हुआ ? तुम विश्रवसु के पोते हो,
क्या तुम्हारे लिए यह शोभा देता है कि तुम मनुकुलेश्वर राम की पत्नी को इस प्रकार
केश पकडकर खींचो ?'
हनुमान् के इतना कहते ही इन्द्रजीत ने अपने खड्ग को उठाकर उस माया-सीता का
सिर काट डाला और कहा--'अब तुम जाकर यह समाचार राम-लक्ष्मण से कहो ।' यह
देखकर अनिलकुमार अत्यत शोक-सतप्त हुआ । खड्ग से कटकर, रक्त से लथपथ माया-
सीता को दिखाकर इन्द्रजीत ने हनुमान् से कहा--'हे वानरोत्तम, राम की पत्नी इस सीता
का वध मैने अपने खड्ग से कर डाला । अब तुम्हारा रणोत्साह शिथिल पड जायगा ।'
इतना कहकर इन्द्रजीत युगात के घनघोर मेघ के गर्जन की भाँति सिंहनाद करके दिग्गजो
के कर्ण-पुटों तथा दिशाओ को विदीर्ण करते हुए, शत्रु-सैनिको के मन में भय उत्पन्न करते
हुए, युद्ध-भूमि में आगे बढा । उस राक्षस को देखते ही सभी वानर भागने लगे । तब