रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
बालकाण्ड ६
४. कुश-लव का रामायण-गान
कोसल-देश में सरयू नदी के किनारे, पृथिवी के ऊरु-भाग के समान अयोध्या नगर
सुशोभित था। वह बारह योजन लंबा, पाँच योजन चौड़ा था और शिल्प-निपुण मय द्वारा
निर्मित था। वह शत्रु-राजाओ की आँखो में खटकनेवाला नगर सूर्यवंशी राजाओ की राज-
धानी था। वह रत्नमय गोपुर, मणिमय तोरण, मणिमय कुट्टिम (फर्श), गवाक्ष, क्रीडा-
गृह, कृत्रक शैल (बनावटी पर्वत), पटह-नाद (नगाडे की आवाज), विशालकाय हाथी,
उत्तम घोडे, नाना प्रकार के रथ-समूह, सेना, स्वच्छ सौध, बाजार, कमनीय उपवन, सरोवर,
तालाब, बावडी ऊख के खेत, धान के खेत, गहरी खाई तथा महलों से भरा हुआ संसार-
भर में विख्यात था। उस नगर में दशरथ नामक राजा राज्य करते थे, जो धनुर्विद्या में
निपुण, साम, दाम, भेद आदि चार उपायो के ज्ञाता, (भगवान् के ऐश्वर्य आदि) षड्गुणों के
आगार, (इच्छा, ज्ञान एव क्रिया) शक्तित्रय-संधानकर्त्ता, धर्मनिरत, कृताध्वर (जिसने
यज्ञ किया है), श्रीसपन्न, धर्मशास्त्र, पुराणादि के ज्ञाता, अजनंदन, बाल्यावस्था से, नियमानुकूल
प्रजा का पालन करते रहनेवाले परमपवित्र व्यक्ति, इन्द्र के निमित्त शंबरासुर का गर्व भंग
कर इंद्र से मंदार-पुष्पों को प्राप्त करनेवाले, इन्दुमती के पुत्र और सूर्यवंश में श्रेष्ठ राजा थे ।
वे तेज, कांति, त्याग, चातुर्य, उदारता, साहस, आदि सद्गुणो के भाडार थे ।
वे उदित होते हुए सूर्य की भाँति अपने उग्र तेज से सप्त द्वीपो को दीप्त करते हुए शासन
करते थे। उस नरनाथ के तीन सौ पचास रानियाँ थीं, जिनमें विशेष कर अचल शील-
वाली कौसल्या, कुचकुभ-निर्जित परिधानवाली कैकेयी, पुण्यशीला सुमित्रा त्रयी विद्याओ
के समान थीं। इस पृथिवी पर उनके हितैषी पुरोहित वसिष्ठ आदि पुण्य संयमी थे। पुण्यात्मा
धृष्टि, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, जयंत, नीतिवेत्ता अशोक, धीमान् मंत्री सुमंत्र आदि
उनके आठ सचिव थे। सभी सचिव परस्पर मित्र और स्वामिकार्य में विचक्षण और चतुर थे।
वे परम मर्मों के उद्घाटन में निपुण थे और विचार-पूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे।
समस्त कार्यों को सँभालनेवाले ऐसे आठ मंत्रियो से युक्त राजा दशरथ अष्टाक्षर और अष्ट-
भुजाओ से समन्वित नारायण की तरह सुशोभित थे। उनके राज्य में निर्बल, चुगलखोर,
रोगी, दरिद्र, व्यभिचारी, अनाचारी, पापी, क्रूर, नीच, जड, मूर्ख, मद, एक भी व्यक्ति नहीं था।
सारी प्रजा मणि-कुडल आदि से अलकृत, धर्मपरायण, कुलाचार-निरत, सकलशास्त्र-
पारंगत तथा विष्णु-भक्त थीं। इस प्रकार बडी कुशलता से राज्य का पालन करते और
राज्य-सुख भोगते हुए राजा दशरथ एक दिन अपने मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे।
५. पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने के लिए दशरथ का मंत्रियों से परामर्श
राजा दशरथ अपनी निस्संतान अवस्था का तथा अपनी ढलती आयु का विचार
करते हुए बहुत दुःखी हुए। उन्होंने अपने सभी श्रेष्ठ मंत्रियो को बुला भेजा और उन्हें
उचित आसन पर बैठने का आदेश देकर स्वयं भी आसन पर बैठ गये। और, उनसे इस
प्रकार कहने लगे- "मैंने बहुत दान दिये, अनेक धर्म-कार्य किये, कई यज्ञ किये और बहुत
१० रंगनाथ रामायण
सालों से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मैंने बड़ी कीर्त्ति पाई है। तुम्हारे जैसे स्नेही मंत्रियों
के रहते हुए मुझे किसी बात का अभाव नहीं है। पुत्र-हीन होने का एकमात्र दुःख ही
मुझे है। कुल का उद्धार करनेवाले पुत्रों के बिना कोई भी व्यक्ति पुण्य और स्वर्गलोक
की प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए मेरे भी पुत्र उत्पन्न होने चाहिए। समस्त संसार
मेरी प्रशंसा करे, एतदर्थ मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा और उसके बाद पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करूँगा।
इन यज्ञों के कारण मेरा हित होगा और मैं जरूर पुत्र प्राप्त करूँगा। राजा के यों कहने
पर वे सब बड़े संभ्रमचित्त होकर मन में हर्षित हुए। उन्हें प्रसन्न देखकर राजा मन में
विचारकर बोले—
मैं अनुपम रीति से, बड़े विनय के साथ अश्वमेध यज्ञ करूँगा, जिसकी प्रशंसा देवता
भी करेंगे और पुत्रों के लिए पुत्रकामेष्टि-यज्ञ नेत्र-पर्व रीति (दर्शकों की आँखों को तृप्ति
देनेवाली रीति) से करूँगा। ऐसा कहकर उन्होंने आवश्यक प्रबन्ध करने के लिए सब लोगों
को भेजा। उसी समय अनघ वसिष्ठ आदि मुनि वहाँ आये। (राजा ने) दण्डवत की और
बड़ी श्रद्धा से उन्हें लिवा लाये और उनसे बोले—हे महान् संयमी तथा पुण्यवान् वसिष्ठ !
यथाशीघ्र आप मुझसे श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ करवाइए, जिससे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो।'
इस पर (मुनि बोले)—'तुम्हारे द्वारा संपन्न होनेवाले अश्वमेध यज्ञ का निर्वाह हम करेंगे।
उस श्रेष्ठ यज्ञ की महिमा का वर्णन करना क्या सहज है ? इसके अतिरिक्त पुत्र-कामेष्टि
करने से तुम धन्यात्मा पुत्रों को प्राप्त करोगे।' यह सुनकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ।
उन्होंने सबको विदा किया और रनवास में पहुँचकर सभी रानियों को यह शुभ संवाद
सुनाया। तब से वे प्रसन्नचित्त रहने लगे। एक दिन अनघ सूत (सुमंत्र) राजा के पास
आकर एकान्त में यों कहने लगे—
६. ऋष्यशृंग का वृत्तांत
सुमंत्र ने कहा—“हे महाराज, इसके पहले आपको संतान-प्राप्ति कैसे होगी, इस
सम्बन्ध में मैंने एक कथा सुनी थी। आप उसे सुनें। अंगराज के पुत्र गुणवान् रोमपाद के
राज्य में न जाने उनके किस अपराध से वर्षा नहीं हुई। अपने राज्य में कहीं भी वर्षा
न होते देख राजा बहुत दुःखी हुए। उन्होंने श्रेष्ठ मुनियों से वर्षा के निमित्त बहुत हवन
करवाये, फिर भी वर्षा नहीं हुई। तब राजा को अत्यंत दुःख से पीड़ित देखकर मुनियों ने
कहा—“हे महीपाल ! हे राजचन्द्र ! इस पृथ्वी पर वर्षा होने के लिए हम शुद्ध मन से आपको
एक उपाय बतायेंगे। हे पर्वत के समान वीर ! परहितनिरत विभांडक के पुत्र पुण्यनिधि
ऋष्यशृंग जन्म से नगर-ग्राम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान न रखने के कारण स्त्रियों के नाम
तक से अनभिज्ञ हैं। वे तपस्वी की वृत्ति में जंगलों में रहते हैं। हे वसुधेश ! उनके यहाँ
आते ही अनावृष्टि-दोष तुरन्त दूर हो जायगा। इसपर राजा अपन मन में सोचने लगे कि
उन मुनिश्रेष्ठ को नगर में कैसे ले आ सकूँगा। उन्होंने बुद्धिमान् मंत्रियों तथा मुनियों को
बुलाकर बड़े प्रसन्न चित्त से पूछा। मुनियों तथा मंत्रियों ने भी बड़ी प्रसन्नता से उपाय
बताये, तो राजा मन ही मन बहुत हर्षित हुए। मुनियों ने कहा—“महाराज, अभी
आप कई (प्रकार के) मिष्टान्न तथा सुन्दर वस्तुएँ देकर वेश्याओं को वन में भेजिए।
बालकांड ११
वे प्रौढ कामिनियाँ सीधे वहाँ जाकर, अच्छी तरह उस मुनि के दर्शन करेंगी, उनकी महिमा
देखेंगी, उन्हें मिष्टान्न देंगी और बडे प्रेम से उनके मन को विचलित करेंगी । वे कामिनियाँ
अपनी विलास-चेष्टाओ से उनके मन को रसार्द्र बना देंगी और अपने मोहक रूप की माया
का प्रभाव डालकर यहाँ वापस आयेंगी । तब वे भी उनके पीछे-पीछे यहाँ आयेंगे ।
यो कहकर सभी मुनि चले गये । उस दिन रात्रि को राजा बहुत प्रसन्नचित्त रहे ।
सवेरे उठते ही राजा ने मुनियो का स्मरण करते हुए बडी अनुरक्ति के साथ अनुपम यौवन-
रूप-सपन्न, कामदेव के मोहन मत्र के सदृश सुन्दर तथा चतुर वेश्याओ को वन में भेजा ।
वे युवतियाँ उस मुनि के वन में गईं और उनके आश्रम के पास जा पहुँचीं । उन्होने अपनी
नाट्य-कला तथा सगीत-कला का परिचय मुनि को दिया । वे पुण्यनिधि यह न जान सके
कि वे स्त्रियाँ है, और मगीत आदि का रसास्वादन न कर सकने के कारण सोचने लगे कि
ये इस वन में रहनेवाली मदगामिनी कोई अनोखी मृगी है । एक दिन वे रमणियाँ उनके
पास पहुँच गईं । उन्होने कामिनियो को अच्छी तरह देखा, उनके कुचो का नाम पूछा, कुचो
पर डोलनेवाले हारो का उद्देश्य पूछा और कहने लगे—“मेरे सिर पर तो एक ही शृग है,
लेकिन आपके उर पर दो शृग निकल आये हैं । आपके ये वल्कल वस्त्र बडे ही कोमल हैं ।
ये अनुपम दल्कल किस पेड से प्राप्त होते है ? आपके जटाजूट मेरी जटाओ के
समान नही है, वे चमक रहे है । आपके शरीर पर मली हुई राख सुगध दे रही है ।
आपके ये वेद-नाद श्रुतिमधुर है । मैने इस वन में ऐसा दृश्य अबतक नही देखा है,
न सुना है । कही मुनियो की भी ऐसी वेष-भूषा होती है ? आप कहाँ के मुनि है ?”
उस महान् व्यक्ति को अपने जाल में फँसते देख उन स्त्रियो ने हँसते हुए कहा—
“हे मुनि, कर्ण-मधुर साम-गान करते हुए, उसके अनुसार शुद्ध रीति से पदन्यास करके
दिखाना हम जानती है । इस पृथ्वी पर हमारा कौशल जानना आपके लिए कहाँ सभव है ?”
इस तरह अपनी वचन-चातुरी से उस मुनिनाथ को भुलावा देकर उन सुदरियो ने
पूछा:-‘आप कौन है ? किनके पुत्र है ? क्यो इस वन में रहते है, बताइए ।' तब उन्होने
कहा—“मै शुद्ध कीर्त्तिमान्, पुण्यात्मा विभाडक का पुत्र हूँ । मेरा नाम ऋष्यशृग है । तप
में महान् निष्ठा रखते हुए तपस्या करने के लिए ही मै यहाँ रहता हूँ । मेरे पिताजी
भागीरथी में स्नान करने की इच्छा से योगिपुगवो के साथ गये हुए है । वे अन्य देशो में
न जाकर बडी तपस्याएँ करने हुए अमल तथा भक्तियुक्त चित्त से यही पर रहते हैं ।
आप लोगो के यहाँ आने से मै पापरहित हुआ, कृतार्थ हुआ । अपने पिताजी की कृपा से
बहुन अधिक तपश्चर्या में लीन मैं भी यही रहता हूँ । इन वनो में आप जैसे नागर लोगो
को, देखकर मुझे आश्चर्य हुआ । क्या अब हम सब आश्रम में चलें ? ”
यो कहकर उन मुनियो को (उन वार-वनिताओ को) अपने आश्रम में ले जाकर
ऋष्यशृग ने उनका आदर-सत्कार किया । उन युवतियो ने प्रसन्नता मे उन मुनि का आतिथ्य
ग्रहण करने के बाद कहा—‘हे मुनिवर, यह लीजिए, हम अपने वन मे श्रेष्ठ फल लाये हैं ।'
यो कहकर उन्होने स्वादिष्ट एव मनोहर लड्डू, पूडी और तरह-तरह के स्वादिष्ट
मिष्टान्न उन्हें दिये । मुनि उन्हें खाते जाते थे और बीच-बीच में उनके स्वाद की प्रशसा
१२ रंगनाथ रामायण
करते जाते थे । उन युवतियो की ओर देखकर बार-बार मिठाई माँगते, परवश-से होकर
हाथ फैलाते और कहते—'हे मुनिवर, मैं ने अब तक ऐसे फल कभी नहीं देखे । आपका
ही तप श्रेष्ठ तप है ।'
यह सुनकर उन युवतियो ने मुस्कुराते हुए अपनी तनुलताओ को उनके शरीर से
छुलाकर, अपने सौरभमय उच्छ्वासो से उनके धैर्य को डिगाने हुए हौले-हौले अपने
मुख-कमलो को उनके मुख से सटाया और मीठे वचन, हाव भाव, मधुर संगीत तथा मादक
दृष्टियो से उन्हें मोहित कर उनके हृदय को रसार्द्र करते हुए, अपने कुचो से कसकर
आलिंगन पाश में उन्हें परवश बनाया और फिर कहने लगी—'हे अनघ, अब हमें आज्ञा
दें कि अपने आश्रम को वापस जायँ ।' यो कहते हुए विभाडक के आगमन के भय से
पीडितं वे वहाँ मे रवाना हो गईं और उस वन के निकट ही रहने लगी । उन कमल-
लोचन रमणियो के जाने के पश्चात्, ऋष्यश्रृंग ने यह सोचते हुए कि न जाने वे फिर कब
लौट आयेंगी, सारी रात जागकर ही व्यतीत कर दी और दूसरे दिन वे उस जगह पर जा
पहुँचे, जहाँ पहले दिन उन्होने उन रमणियो को देखा था ।
७. वेश्याओं के साथ ऋष्यशृंग का रोमपाद के घर आना
पायलो का झकार करती हुई, राजहंसो की गति से वे युवतियाँ मुनि के पास आईं
और प्रफुल्ल वदन हो चारो ओर से उन्हें घेरकर कहने लगी—'हे मुनिवर, आप हमारे
वन में पधारें ।' जब उन्होने स्वीकार कर लिया, तब वे उस श्रेष्ठ मुनि के चित्त कोद्रवित
करनेवाली बातें करते हुए, अपने उपायो तथा हाव-भावो से उनको मोह-मुग्ध कर लिया
और उन्हें अग-देश में इस प्रकार ले आई, जैसे शिकारी पक्षी किसी नये शिकार को पकड-
कर ले जाते समय विस्तृत पथ के भय से उसे बचाने के लिए अपने हस्तपल्लव-रूपी
पालकी में (चंगुल में) ले जाता है । उस ऋष्यशृंग के आने ही अग-राज्य में घोर वर्षा
होने लगी और सस्य बढने लगे । राजा सकल सौभाग्य से युक्त हो सतुष्ट हुए । उन्होने
बडी भक्ति मे उस मुनि की पूजा की और अपनी पुत्री शान्ता का विवाह उनके साथ
कर दिया । वे मुनि उसी राजा के यहाँ रहते हैं । यदि दशरथ उस मुनि को अपने यहाँ
ले आकर उनसे पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करायें, तो वे (दशरथ) चार बहुश्रुत तथा महान् पुत्र
तथा समृद्धि प्राप्त करेंगे । इस प्रकार मुझमे पहले सनत्कुमार ने कहा था । इसलिए आप
उस ऋष्यशृंग मे भक्तियुक्त प्रार्थना कर उन्हें यहाँ ले आयें ।"
इस प्रकार कहकर सूत चले गये । उनके जाने के वाट मन में हर्ष तथा भक्ति
का अनुभव करते हुए चतुर दशरथ उस राजा रोमपाद के यहाँ गये और मुनिश्रेष्ठ ऋष्यशृंग
को प्रणाम करके कहा—'हे पवित्र आत्मा मुनिराज, आप मेरी विनती सुनें । मैं अपने, मन
में पुत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर आपके यहाँ आया हूँ । आप मुझे अपनाइए ।' राजा ने
उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस प्रकार उनकी स्तुति की और उनसे यज्ञ का ऋत्विक्
बनने की प्रार्थना की । फिर अनुपम पालकी में उन्हें बिठाकर अयोध्या के लिए
रवाना हुए । उन्होने दूतो के द्वारा अपने नगरनिवासियो को यह आदेश भेज दिया कि नगर
इन्द्रपुरी के समान सुन्दर सजाकर रखा जाय । दूतो ने नगरनिवासियो को यह आदेश
सुनाया । उन्होंने नाना प्रकार से नगर को सजाया और जहाँ-तहाँ दुंदुभि, शंख, आदि का
तुमुल नाद करने लगे । उसी समय राजा ने भी नगर में प्रवेश किया और मंगलवाद्यों के
बजते हुए, विघ्ननाशक (ऋष्यशृंग) को शांता देवी के साथ, बड़ी चतुरता से अयोध्या में लाये ।
राजा ने ऋष्यशृंग को लाकर अन्तःपुर में ठहराया । अर्घ्य-पाद्यादि देकर विधिवत्
उनकी पूजा की और अपने को कृतार्थ मानकर प्रसन्न हुए । उसी समय कौसल्या आदि
रानियों ने राजा की आज्ञा लेकर बड़े हर्ष से शान्ता देवी को श्रेष्ठ भूषण, वस्त्र, माला
आदि देकर बहुविधि से उनका सत्कार किया ।
कुछ दिन के पश्चात् संसार के प्राणियों को आनंदित करने हुए वसन्त ऋतु आई ।
तब राजा बड़े उत्साह से ऋष्यशृंग के पास गये और बड़ी भक्ति से प्रणाम करके विनय
किया—‘हे संयमीप्रवर ! आप मुझसे यज्ञ कराके मेरा उद्धार कीजिए ।’ तब उन्होंने—
‘ऐसा ही हो,’ कहकर रविकुलोत्तम राजा दशरथ से आगे कहा—‘हे राजन्, यज्ञ के लिए
विधिवत् आवश्यक सामग्री शीघ्र मँगवाइए ।’ तब राजा ने योग्य व्यक्तियों को उन सब
वस्तुओं का संचय करने के लिए भेजा और सब सामग्री मँगवाई । (उन्होंने) सुमंत्र को
भेजकर कीर्तिमान् केकयराज, अप्रतिहत तेजस्वी काशिराज, जनक महाराज, अंगराज आदि
पुण्यचरित्र नरेशों को यज्ञ देखने के लिए सविनय आमंत्रित किया । (इसके पश्चात्)
उन्होंने सुमंत्र से कहा—‘तुम शीघ्र जाकर पुण्यवान् वेदवेदांग-पारंगत, गृहस्थ, निपुण एवं
महिमा-समन्वित ब्राह्मणों को तथा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, महात्मा वसिष्ठ तथा वामदेव
आदि (पुरोहितों) को लिवा लाओ ।’
सुमंत्र बड़ी प्रसन्नता से गया और बड़ी श्रद्धा से उन सबको लिवा लाया । (राजा ने)
उन्हें अर्घ्य, पाद्य आदि देकर (उनका स्वागत-सत्कार किया) । वे अपने निर्मल व्रत
की निष्ठा के अनुकूल धर्मसम्मत तथा उचित वचन यों बोले—“हे मुनिश्रेष्ठ, पुत्रहीन होने
से अत्यन्त दुःखी हूँ, पुत्र-प्राप्ति की इच्छा बलवती होने के कारण मित्रों के परामर्श से
अश्वमेध यज्ञ, तथा पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करने के लिए इन ऋष्यशृंगजी
को आमंत्रित किया है । (अब) आपके अनुग्रह का प्रार्थी हूँ ।”
राजा की बातों से प्रसन्न होकर वसिष्ठ आदि तपोधन मुनियों ने कहा—“हे रवि-
कुलोत्तम, लोकहितार्थ पुत्रों को प्राप्त करने की आपकी इच्छा सर्वथा संगत है । अब अश्व
को छोड़िए । इस अश्वमेध से आपके विश्वरक्षक एवं उज्ज्वल पराक्रमी चार पुत्र होंगे ।”
इससे बहुत सन्तुष्ट होकर राजा ने यज्ञ के लिए योग्य जवनाश्व (तेज जानेवाला
घोड़ा) को चुनकर, भुवनपावन मूर्ति की पूजा करके, उस घोड़े के ललाट पर अपना
नामांकित एक पट्ट बाँधकर, एक साल तक उसे अपनी इच्छा से घूमने के लिए
छोड़ दिया । उस अश्व की रक्षा के लिए पराक्रमी सेना तथा सामंत नरेश भी भेजे । उसके
बाद वसिष्ठ आदि मुनियों की अनुमति से अनुपम शिल्पकारों को बुलाकर सरयू नदी की
उत्तर दिशा में वेद-विधि के अनुसार एक यज्ञ-शाला का निर्माण करने के लिए भेजा
और सभी देश के राजाओं तथा उन देशों में निवास करनेवाले विप्र, क्षत्रिय, वैश्य तथा
शूद्रों को भी आमंत्रित किया ।
१४ रंगनाथ रामायण
इतने में एक वर्ष पूरा हुआ और मधुमास आया। तब राजा ने चिर तपोनिधि
ऋष्यशृंग की अनुमति तथा गुरु की आज्ञा लेकर एक अच्छे मुहूर्त में बड़े उत्साह से शान्ता
तथा ऋष्यशृंग के साथ, यज्ञोपकरणों तथा हवन-कुंड से युक्त, इक्कीस सुन्दर यूपों से
शोभायमान, श्रौतधर्म-क्रियाचार-विहित, मायाप्रवीण, राक्षसों से रहित तथा समस्त पाप-
रहित यज्ञ-शाला में प्रवेश किया।
८. दशरथ का यज्ञ-दीक्षा लेना
यज्ञाश्व के आने ही, यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर, यतिबुद्धि प्राप्त करके, वसिष्ठ आदि
श्रेष्ठ मुनिजनों को ऋत्विकों के रूप में वरण कर, अपनी इच्छा से सवनत्रय को पूरा करके,
विमल यूपकाष्ठों में बँधे हुए जलचर, वनचर, विहग, उरग आदि तीन सौ पशुओं तथा
प्रख्यात यज्ञाश्व का वध करके श्रुतियों में जिन-जिन मंत्रों के साथ, जिन-जिन आहुतियों को
देने की विधि बताई गई है, उन मंत्रों के साथ ऋत्विकों ने उन आहुतियों का हवन
किया। अग्निदेव सप्त-जिह्वाओं से प्रज्वलित हुए। देवता उन आहुतियों से तृप्त हुए।
उस यज्ञ के दिनों में न कोई भूखा रहा, न कोई संतप्त रह गया। सभी मिष्टान्न, वस्त्र
स्वर्ण, मणिभूषण आदि से संतृप्त किये गये।
जब किसी भी विघ्न के बिना यज्ञ समाप्त हुआ, तब ज्योतिष्टोम, विश्वजित् आदि
महान् यज्ञ-क्रियाओं को सांग रूप से पूरा किया और यज्ञ-दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु (यज्ञ-
करानेवाले चार ऋत्विकों में से एक) को (अपने राज्य का) दक्षिण का भाग, होता को
पश्चिम का भाग तथा उद्गाता को उत्तर का भाग दिया। अयोध्या को छोड़ बाक़ी सभी
देशों को (दान में) दे दिया, जिससे ऋत्विक् प्रसन्न होकर कहने लगे—"कब हम आपके
दिये हुए राज्य का शासन करें और कब अपने अनुष्ठान का पालन करें। हम कहाँ और
देश का शासन कहाँ ? हे राजन्, आप हमें इस राज्य का मूल्य दे दें।" तब राजा ने
दस करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ, सोने की चौगुनी चाँदी और एक लाख गायें उन्हें दीं। ऋष्यशृंग
आदि ऋत्विक् उस धन को आपस में बाँटकर संतुष्ट हुए। उस विमल यज्ञ-कर्म में
प्रवृत्त परिचारकों को राजा ने एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं। माँगनेवालों को श्रेष्ठ आभूषण दिये।
जिसने जो कुछ माँगा, राजा ने प्रेम से उसे वह दे दिया। उन्होंने सभी ब्राह्मणों
को भक्ति से प्रणाम किया और क्रमशः उनके आशीर्वाद पाते हुए उन्हें दिव्य वस्त्राभरण
देकर अकलंक चित्त से यज्ञांत स्नान किया। (उधर) ऋष्यशृंग के द्वारा कराये गये पुत्र-
कामेष्टि यज्ञ में आकर क्रमशः अपने-अपने यज्ञ-भाग प्राप्त करनेवाले देवता रावण के सम्बन्ध
में अपने मन में विचार करने लगे।
९. रावण के अत्याचारों के बारे में ब्रह्मा से देवताओं की शिकायत
ब्रह्मा के पास पहुँचकर (देवताओं ने) उनको प्रणाम किया और यों विनती की—
"हे प्रभो ! आपके वर की शक्ति से दशकन्धर, पुण्यात्मा आचार्यों ब्रह्मर्षियों, देवताओं तथा
मुनियों को दुःख दे रहा है। हे कमलासन ! हमारा खयाल है कि आपके वर की प्रचण्ड
शक्ति के कारण ही हम उसको जीत नहीं सकते। वह देवताओं के साथ इन्द्र को भी
पकड़कर उनका अपमान करता है और उन्हें दुःख देता रहता है। (अपने) भुजबल के दर्प से
बालकांड १५
वह गंधर्व, यक्ष आदि देवगणो, मुनियो तथा साधुओ को पकड़कर कष्ट दे रहा है ।
सभी कुल-पर्वत उसके नाम से डरते है । सूर्य भी ताप फैलाने से डरता है । वह जिस
नगर में रहता है, वहाँ पवन भी अपनी पूरी शक्ति के साथ चलने से डरता है । उसके
अतिशय प्रताप से डरकर समुद्र अच्छी तरह गर्जन नही कर पाता है । दीख पड़ने पर हमें
भी दुख देता है । ऐसे पापी दशकंधर का अन्त करने का उपाय आपको सोचना चाहिए ।"
तब ब्रह्मा ने उन सारी बातो को हृदयगम करके देवताओ से कहा--" (रावण)
अमरो के हाथ नही मरेगा, राक्षसो से नष्ट नही होगा, गधर्वो से मिटेगा नही, रजनीचरो
से समाप्त नही होगा, भुजगो से मारा नही जायगा, यक्षो से हत नही होगा, पक्षिसमूह से
पराजित नही होगा । मेरे वर देते समय उसने नरो का नाम नही लिया था, इसलिए
वह नरो से ही मरेगा । स्पष्ट सुनो, हिरण्यकशिपु जब सारे संसार को दुख देता था, तब
नारायण ने स्वय नरसिंह का रूप धारण कर उसे चीर डाला था । उसी ने अब विश्रवसु
के यहाँ जन्म लिया है । इसलिए नारायण ही अब इसका नाश करेंगे । अब हमें उस विष्णु
से अभयदान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।"
ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर सभी लोग तुरन्त क्षीर समुद्र के निकट गये और
अच्युत को देखकर पवित्र हृदय से उनकी स्तुति की । हाथ जोडकर बड़ी भक्ति से प्रणाम
किया और विष्णु से इस प्रकार विनती की ।
१०. देवताओं का विष्णु की स्तुति करना
हे त्रिलोकीनाथ, कमलालय-वक्ष, वसुमत्तिरक्षक, वनजाक्ष, आपके अतिरिक्त हमारा
कोई (सहायक) नही, यह सत्य हे । हे गोविन्द, परिपूर्णगुण चिदानन्द, हे देव, जगन्मय,
देवाधिदेव, देवो के रक्षक, दिव्यावतार, अमृतसागर में पहले आपकी शरण में आये हुए हमें
(आपने) अपना अभयदान दिया था । हे दानवदलन, आपके भुजवल-विक्रम से ही समस्त
लोको की रक्षा होती है । हे भक्तवत्सल, भक्तियोग को छोड़ अन्य उपायो से आपको
पहचानना असंभव है । हे मधुसूदन, मन में आपका ध्यान करनेवालो को क्या कभी कोई
विपदा सता सकती है ? जगत् की सृष्टि, स्थिति, लय आदि आपकी लीलामात्र है ।
समस्त लोक आपकी माया का आधार लेकर ही आपका महनीय तनु धारण करते है ।
हे शेषशायी, आपका वैभव तथा आपकी महिमा अवाङ्मानसगोचर है । हे शरणागत
रक्षक, हे लोकेश, हम आपकी शरण में आये है । हम शरणार्थियो की रक्षा आपको करनी
ही चाहिए । आप त्रिलोक-कटक रावण का वध करके हमारी रक्षा कीजिए । हे लोकैक-
स्तुत्य, बिना विलंब हमारा कार्य सपन्न कीजिए और यश पाइए । निर्मलचित्त, निश्चलव्रती,
धर्मात्मा, उत्तमगुण-समन्वित, राजा दशरथ अश्वमेध यज्ञ पूरा करके पवित्र मन से युक्त
हुए है । उस काकुत्स्थ-वंशी (राजा दशरथ) की स्त्रियो का विचार करें, तो कोई भी स्त्री
उनकी बराबरी नही कर सकती । हे कमलगर्भ, आप अपने चारो अंशो के साथ नर के
रूप में जन्म लीजिए । वर के प्रताप से जो देवताओ के लिए अवध्य है, जो लोकत्रासक है
जिस पापी ने गंधर्व एव किन्नरो का वध किया है, हे पुण्डरीक, ऐसे दशकंधर का वध
करके यज्ञ-संपादन कराइए और संयम-धनी पुरुषो की तथा संसार की रक्षा कीजिए ।"
१६ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार विनती करनेवाले देवताओ को देखकर वनजाक्ष (विष्णु) ने घन-गर्जन
के समान गंभीर ध्वनि में कहा—"हे देवताओ, तुम लोग सुखी होओ। मैं मर्त्यलोक में
अवतार लूँगा और उसके पश्चात् दशकंधर का बंधु, मित्र, अमात्य, पौत्र तथा बहुओ के
साथ नाश करके, ग्यारह हजार वर्ष तक नियमानुकूल इस पृथ्वी का पालन करूँगा। ब्रह्मा
के वर से ही राक्षसेन्द्र इस अवनीतल पर जीवित है।" यों कहते हुए असुरारि (विष्णु)
ब्रह्मा तथा देवताओ को विदा करके चले गये।
११. दशरथ को यज्ञ-पुरुष का पायस देना
उधर विमल हवनाग्नि से नीले अंगवाले, अरुणावरधारी, सूर्य के समान तेजस्वी,
महान् विक्रमी तथा पुण्यात्मा एक दिव्य मूर्ति अपने हाथ में पायस (खीर) से भरे एक
स्वर्ण-पात्र को लिये बाहर आये। उन्हें देख राजा अद्भुत आश्चर्य में पड गये और विनय
के साथ उठकर खडे हो गये। राजा को देखकर (यज्ञ-पुरुष ने) कहा—"राजन्, मैं यज्ञ-
पुरुष हूँ। तुम्हें पुत्र-दान देने की इच्छा से आया हूँ। इस पायस को ग्रहण कर भक्ति के
के साथ अपनी रानियो को दो।" इसपर राजा ने बड़ी भक्ति के साथ उनकी पूजा की
और पायस यों ग्रहण किया, जैसे शचीपति ने सुधा-कलश ग्रहण किया था। अग्निदेव
के अन्तर्द्धान होने के बाद राजा अन्त पुर में गये, तो रानियो ने बड़े आनन्द से उनका
स्वागत किया। (राजा ने) देवताओ से बनाये गये उस पायस का आधा भाग कौसल्या
को दिया, शेष आधे का आधा सुमित्रा को दिया, बचे हुए भाग का आधा कैकेयी को और
शेष पुनः प्रसन्नता से सुमित्रा को दिया।
उस पायस को भक्ति से ग्रहण करने के बाद रानियाँ गर्भवती हुईं। उन्हें देखकर
राजा आनन्द-मग्न दिखाई देने लगे। निदान, राजा ने ऋष्यशृंग आदि मुनियो तथा अन्य
राजाओ को बड़े आदर-सत्कार के साथ विदा किया और रानियों के साथ परम अनुरागयुक्त
हो नगर में लौट आये।
१२. देवताओं को वानरों के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्मा की सलाह
अपना-अपना यज्ञ-भाग लेकर जब देवता अपने लोक को जाने लगे, तब ब्रह्मा ने
इन्द्रादि देवताओ को देखकर कहा—"लोकरक्षणार्थ विष्णु इस पृथ्वी पर अवतार ले रहे हैं।
इसलिए तुम्हें भी उनकी सहायता के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इसलिए तुम लोग
लोकहितार्थी शक्तिमान्, पराक्रमी, बल तथा पराक्रम में अपने समान शक्तिमान् कई वानरों को,
किन्नर, गंधर्व, खेचर, यक्ष, पन्नग, अमर, तथा सिद्ध स्त्रियो (के गर्भ) से उत्पन्न करो।
मैं अत्यन्त बलनिधि जाम्बवान् को पहले ही जन्म दे चुका हूँ। मेरे जँभाई लेने समय उसने
जन्म लिया है। वह चिरजीवी है।"
इस तरह ब्रह्मा का आदेश पाकर देवता लोग प्रसन्न हुए। इन्द्र ने वालि को,
अग्नि ने नील को, सूर्य ने सुग्रीव को, बृहस्पति ने तार को, वरुण ने सुषेण को, कुवेर ने
गंधमादन को, विश्वकर्मा ने नल को, अश्विनीकुमारो ने द्विविद-मैंद को, पर्जन्य ने शरभ
को और वायुदेव ने हनुमान् को इस पृथ्वी पर जन्म दिया। अन्य देवताओ ने भी अपने-
अपने तेज से अमित पराक्रमी तथा श्रेष्ठ वानरों को जन्म दिया। वे (सभी) वानर जगत् के
बालकांड ९७
ओप्त वपु, दावाग्नि-तुल्य विक्रमी, आकार तथा शक्ति में पर्वत की समानता करनेवाले,
बड़े साहसी, कामरूपी, समुद्रो को भी पार करनेवाले, पहाड़ो को भी उखाड़ फेंकनेवाले,
नख और दाँतो में अमित शक्ति रखनेवाले, अलौकिक शक्तिवाली तथा पृथ्वी को भी चीर
डालनेवाली क्षमता रखनेवाले थे । ऐसे होने पर भी, आश्चर्य ! उनमें कुछ लोग सुग्रीव
की, कुछ हनुमान् की, कुछ नील की, और कुछ मेदकुमुद की सेवा करते थे । वे सर्वत्र
सिद्ध होते हुए अपना शौर्य प्रकट करते हुए, मलय, दर्दुर, गंधमादन, तथा विंध्य पर्वत एव
काननो और बहुत-से जल-नद-नदी प्रान्तो में बड़े आनन्द के साथ विचरण करते थे ।
उस महिमायुक्त पायस के प्रभाव से राजा की कुलवधुओ ने गर्भ धारण किया ।
गर्भधारण के समय से (उनकी) क्षीण कटियाँ पुष्ट होने लगी । अमृतमय भोजन की रुचि
लगातार कम होने लगी । सुन्दर देह की कान्ति पाँडु रंग धारण करने लगी, मानो ये
सभी रावण की साम्राज्य-लक्ष्मी की नाक में कालिख लगानेवाले चिह्न हो । उनके कुचाग्र
(इस प्रकार) काले होने लगे, मानो अनपत्यता-दोष (शरीर से) बाहर निकल रहा हो ।
कपोल पतले हो गये । दोहद (मचली आदि) दीखने लगे । नाभियाँ उभरने लगी,
त्रिवलियो की रेखाएँ मिट गई और (अनेक प्रकार की चीजो को पाने की) इच्छाएँ उत्पन्न
होने लगी । धीरे-धीरे नौ महीने पूरे हुए ।
१३. श्रीराम आदि का जन्म
प्रशंसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, बुधवार, पुनर्वसु नक्षत्र
में मध्याह्न के समय ग्रह-पंचको के उच्च स्थिति में रहते समय, गुरु और चन्द्र का योग
रहते हुए, ललित कर्क लग्न में, सर्वलोकाधार, जगदेकवीर, इंद्रादि देवताओ से स्तुत्य, दिव्य
लक्षणो से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, आर्त्त-त्राण-परायण, भव्य, चिदानन्द, परम कल्याण-
मूर्त्ति, देवताओ के रक्षक, दीनात्तिर्हरण, गुणो से अलंकृत, महान् कीर्त्तिवान्, शेषशायी, श्रीपति,
हृषीकेश, उस कमल-गर्भ (विष्णु) के अद्धांश के रूप में, काकुत्स्थवणी श्रीराम कौसल्या
के गर्भ से उत्पन्न हुए । जिस प्रकार अदिति ने इन्द्र को और प्राच्य-मती ने चन्द्र को जन्म
दिया था, वैसे ही पुण्य-नक्षत्र युक्त मीन लग्न में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया । स्तुत्य
आश्लेषा नक्षत्र-युक्त कर्क लग्न में कमलदललोचनी सुमित्रा ने समान-चरित्रवाले लक्ष्मण
तथा शत्रुघ्न को जन्म दिया । देव-दुंदुभियो से सारा आकाश गूंजने लगा, देवस्त्रियाँ नृत्य
करने लगी, पुष्पो की अत्यधिक वृष्टि होने लगी, ब्रह्मादि देवता परितुष्ट हुए, अयोध्या में
छोटे-बड़े सभी निवासी उत्सव मनाने लगे ।
तब दशरथ ने पुण्यात्मा वसिष्ठ को बुलाकर (बालको का) जातकर्म आदि करवाया।
फिर, पुत्र-जन्मोत्सव ऐसा मनाया कि देवताओ तथा पुरजनो का नेत्रोत्सव हो गया । जात-
शौच समाप्त होने के पश्चात् एक पुण्य दिन को राजा ने उन वंशोद्धारक पुत्रो का नाम-
करण-संस्कार करने की प्रार्थना वसिष्ठ से की । उन्होने अपने मन में विचार करके कहा
कि 'रम्', अर्थात् 'क्रीडा' नामक धातु से 'रमयति' अर्थ देनेवाला 'राम' नाम से कौसल्या-
सुत अभिहित होगा । कैकेयी का पुत्र महान् बलशाली, सुकुमार शरीरवाला तथा सुकीर्त्ति-
वान् है, इसलिए वह भरत के नाम से विख्यात होगा । विचार करके देखने से सुमित्रा के
३
१८ रंगनाथ रामायण
पुत्र सुन्दर तथा श्रेष्ठ गुणो से युक्त है, इसलिए उनके लिए लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नाम
उचित होगे । (राजा ने) उन लक्ष्मी-समन्वित (राजकुमारो को) राम, भरत, लक्ष्मण तथा
शत्रुघ्न जैसे सुन्दर नाम देकर नामकरण-सस्कार सम्पन्न किया और अपरिमित धन
दान में दिया ।
१४. श्रीरामादि का वचपन
वे (वालक) माताओ तथा धाइयो के स्नेह तथा ममता-युक्त पालन-पोषण में
(फलस्वरूप) बढने लगे । (वे) भोली-भाली हँसी के साथ आँखें खोलने लगे । धीरे-धीरे
अटपटाकर चलते हुए अपनी तोतली बोली से सबको आनन्द पहुँचाने लगे । उनकी लटो में
(पिरोई गई) मोती तथा मणियों की लड़ियाँ कपोलो तक फैली थी । उनके भाल (रूपी)
इन्दु पर अशोक के पत्ते के समान एक माँगटीका डोल रहा था । मणिखचित बहुत सुन्दर
बघनखा की श्रेष्ठ कान्ति उनके हृदय पर विराज रही थी । शरीर पर जहाँ-तहाँ मरकत
मणियो के आभरण शोभा दे रहे थे, कटि को करधनी से घूँघरू के शब्द हो रहे थे तथा
घुँघरूदार नूपुर पैरो में ध्वनि कर रहे थे । वे राजा के सामने हँसते हुए अपनी वालक्रीडाएँ
करते और उन्हें अपनी मोहनाकृति से मुग्ध कर देते थे । वे चारो (कुमार) धीरे-धीरे
वढने लगे और समान रूप से उनका मानसिक विकास होने लगा ।
वे दशरथात्मज आपस में जोड़ियाँ बना लेते । रमणीय आकृतिवाले राम और लक्ष्मण
की एक जोडी बनती और भरत-शत्रुघ्न की दूसरी जोड़ी बनती । उनके चूड़ाकरण
तथा यज्ञोपवीत-सस्कार कराये गये और वे सुन्दर (राजकुमार) तरह-तरह के खेलो में
मग्न रहने लगे ।
एक वार रघुराम अपने मित्रो के साथ वडे प्रेम से (अपने-अपने) गुइयाँ चुनकर,
गेंद तथा डडा लिये फुर्ती से खेल रहे थे । उसी समय कैकेयी की दासी मथरा वेग से
वहाँ आई और कौतुक से गेंद को रोक लिया । इस पर राम ने वडे क्रोध से डडे से
उसपर प्रहार किया, जिससे तुरन्त उसकी टाँग टूट गई । (इसके पश्चात् भी) श्रीराम
को अधिक उत्साह से खेलते हुए देखकर उनपर क्रुद्ध हो, लँगडी टाँग से वह कैकेयी के
महल में गई और सारा वृत्तान्त कह सुनाया । कैकेयी ने तुरन्त यह समाचार दशरथ को
सुनाया । सारी बातें जानकर राजा ने वसिष्ठजी को अयोध्या में बुलवाकर उन्हें भक्ति से
प्रणाम किया और कहा—'हे श्रेष्ठ मुनिचन्द्र, आप इन बालको को वेदादि समस्त विद्याएँ
सिखायें ।' यह कहकर राजा ने वालको को वसिष्ठ को सौंप दिया । उस मुनीश्वर ने भी
वैसा ही किया । राजकुमारो ने उस सयमी मुनि की कृपा से हाथी-घोडे की सवारी, रथ-
सचालन आदि की क्रियाएँ सीख लीं । समस्त वेदो, शास्त्रो और शस्त्रास्त्रो के प्रयोग भी
सीख लिये । उनमें श्रीराम तो विष्णुदेव ही थे । इसलिए अपार शौर्य, विवेक तथा सद्-
गुणो में सबसे श्रेष्ठ थे ।
१५. विश्वामित्र का आगमन
(राजा) अपने पुत्रो के विवाह की बात सोच रहे थे कि (एक दिन) विश्वामित्र
मुनि आ पहुँचे । द्वारपाल ने आकर महाराज दशरथ से निवेदन किया—'देव, विश्वामित्र
मुनि द्वार पर आये है।' तब दशरथ अपने बधु-वर्ग तथा वसिष्ठ मुनि के साथ बडी
प्रसन्नता से, परमेष्ठी की अगवानी के लिए जानेवाले इन्द्र की तरह, उनका स्वागत करने गये ।
उनकी अमित शक्ति को जानते हुए उनको लिवा लाये और अर्घ्य, पाद्यादि देकर
उनकी उचित रीति से पूजा की । तब मुनि ने पूछा—'(हे राजन्) तुम्हारी प्रजा कुशल
से तो है, हे पूजनीय व्रती वसिष्ठ, आप कुशल से हैं न ? हे मुनियो, आप कुशल से
हैं ?' (तब राजा ने कहा)—'हमें किसी बात का अभाव नही है । हम धन्य हैं । हे
परम मुनींद्र, आप हमारा गृह पवित्र करने की इच्छा से यहाँ पधारे । इस कृपा से मैं
समस्त लोको में प्रख्यात हुआ और सभी राजाओ में आदरणीय हुआ । आप अपने आगमन
का कारण कहें । आपका जो भी कार्य होगा, मैं उसे सम्पन्न करूँगा ।
१६. यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भेजने के लिए राजा से विश्वामित्र की प्रार्थना
तब विश्वामित्र ने राजा को देखकर कहा—'हे राजन्, दसरात्रि-पर्यंत यज्ञ करने
की इच्छा से मैं ( यज्ञ ) करने लगा, तो भयंकर आकारवाले राक्षस हमारी यज्ञशाला में
लगातार रक्त-मास की वर्षा करते हुए प्रबल विघ्न डालने लगे । यज्ञ करते समय हमें
क्रोध नही करना चाहिए, इसलिए तुम्हारे पुत्र महाबली श्रीराम को यज्ञ-रक्षणार्थ ले जाने के
लिए आया हूँ । वे क्रूर राक्षस उनके सिवा अन्य किसी से नही मारे जायेंगे । उनकी
(राम की) महत्ता में जानता हूँ, (और) ब्रह्मा के पुत्र ये वसिष्ठ भी जानते हैं । हे
अनघ ! 'राम बालक हैं' ऐसा विचार मत करो । 'वे मेरे पुत्र हैं', ऐमा लोभ छोड दो ।
वे स्वयं यज्ञ-कर्त्ता, यज्ञ-मूर्त्ति तथा यज्ञ-भोक्ता हैं । उन्हें लोकाराध्य मानकर भेजो । में
उन्हें अतुल्य शस्त्रास्त्र दूँगा । उनसे ही हमारे यज्ञ की रक्षा होगी ।"
मुनि के ऐसा कहते ही राजा मूर्च्छित हो गये । बडी देर के बाद उनकी मूर्च्छा दूर
हुई । वे फीके पड गये और दीन तथा दुखी होकर गद्गद-कंठ से विश्वामित्र की विनती
करते हुए बोले—"राम अभी बालक हैं, वह बच्चा है । वह युद्ध-कला नही जानता । वह
पन्द्रह साल का ही है । हिलती हुई शिखावाला है (अभी उसमें दृढता नही आई है ) ।
अपने तथा शत्रुओ के बल का विचार करने की क्षमता उसमें नही है । हाय ! आप दया-
मय होते हुए ऐसे बच्चे को क्यो माँगते हैं ? राक्षस तो कई दिव्य शस्त्रास्त्र रखनेवाले हैं ।
वे युद्ध-कला में निपुण होते हैं । वे विपुल बाहुबलवाले हैं । उनके साथ लडने की
योग्यता राम में कहाँ है ? कहाँ वे और कहाँ यह ? हे श्रेष्ठ मुनीश्वर, साठ हजार साल
तक पृथ्वी का शासन करने पश्चात् असमय वृद्धावस्था में मैने इसे प्राप्त किया है । मैं
इसे भेज नही सकता। यज्ञ रक्षा की चिन्ता आपको क्यो है ? आप जाइए, मैं आज ही सेना के साथ
आपके पीछे-पीछे चला आऊँगा । हे मुनिनाथ, आपके यज्ञ में बाधा डालनेवाले राक्षसो की
शक्ति कितनी है ? वे कौन है ? उनके नाम क्या हैं ? यह राघव उन्हें कैसे जीत सकेगा ?"
तब विश्वामित्र ने राजा से कहा—"पुलस्त्य ब्रह्मा का पोता, विश्रवसु का पुत्र,
अखिल लोक का कंटक, पापी रावण के आदेश से बल प्राप्त करके घमण्ड से भरे
मारीच तथा सुबाहु नामक (राक्षस) उग्र रूप धारण कर यज्ञ में विघ्न डालते हैं । राम
के सिवा अन्य कोई भी रणभूमि में उनका सामना नही कर सकेगा ।"
२० रंगनाथ रामायण
ऐसा मुनि के कहने पर, उन बातो पर विश्वास न करके राजा ने मुनिनाथ से
विना संकोच कहा—"वह (रावण) चौथा ब्रह्मा है, महान् साहसी है और ब्रह्मा से वर
प्राप्त किये हुए हैं । ऐसे रावण के भेजे हुए वीरो को जीतने में यह (राम) कैसे समर्थ
होगा ? उन (राक्षसो) की शक्ति जाने विना मै आने की वात कही थी । अब आप लौट
जाइए ।"
यो राजा के कहते ही विश्वामित्र (क्रोध से) जलते हुए, रोष-रक्त नेत्रो से देखने लगे ।
उनके गण्डस्थल अत्यधिक वेग से हिलने लगे, सारा शरीर काँपने लगा । वे राजा
को देखकर बोले—"काकुत्स्थ-वशजो की रीति पर विचार किये विना ही ऐसे कुवचन क्यो
कह रहे हो ? (तुमने) मेरे आगमन का कारण वताने के लिए कहा । यह कहा कि मै
आपका कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा । अब तुम मुकर रहे हो । यज्ञ-रक्षा क लिए मैने राम
को भेजने की प्रार्थना की । पर तुम हिम्मत हारकर कहत हो 'नही भेजूंगा ।' हे असत्य-
भाषी, तुम्हारा तो मुँह देखना भी नही चाहिए । इसलिग मै जा रहा हूँ ।"
मुनि के इस प्रकार कहने ही समुद्र सूख गये, पृथ्वी धँस गई, समस्त लोक व्याकुल
हो उठे । दिग्गजो ने घुटने टेक दिये, देवता सहम गये, दिशाएँ सिमट गई । सभी भूत
अवाग हो गये । मुनि के क्रोधावेग की कल्पना करके वसिष्ठ ने दशरथ को देखकर यो कहा-
१७. राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए वसिष्ठ की सम्मति
(वसिष्ठ ने कहा)—"हे राजन्, सूर्यवंशी इस ससार में कभी असत्य भाषण नही
करते । यदि तुम असत्य कहोगे, तो तुम्हारी श्रेष्ठ कीर्ति और तुम्हारे पूर्वजो की कीर्त्ति
नष्ट हो जायगी । देने का वचन कहकर नही दोगे, तो शुद्ध (मन से) किये हुए सभी धर्म
नष्ट हो जायेंगे । 'दशरथ महाराज बडे धर्मात्मा हैं'—ऐसे तुम इस पृथ्वी में विख्यात हो ।
लोकरक्षा के सिवा राजाओ का धर्म और क्या है ? इसलिए, हे राजन्, राम को
माननीय गाधि-पुत्र के साथ जाने दो । ऐसी शका क्यो करते हो कि मेरा पुत्र वालक है,
वह युद्ध में महाबली राक्षसो की वरावरी नही कर सकेगा । कौशिक के रहते किस बात का
भय है ? राजन्, विश्वामित्र का उग्र तप और उनकी शक्ति विचित्र हैं । ये पुण्यात्मा देव,
दानव, गधर्व तथा दैत्यो से भी अधिक दिव्यास्त्रो के प्रयोगो को जानते हैं । कोई भी ऐसा
विषय कही भी नही है, जिसे ये नही जानते हो । हे जननायक, दक्ष (प्रजापति) के जया
तथा सुप्रभा नामक दो पुत्रियाँ थी । उन जया और सुप्रभा के द्वारा भृशाश्व ने राक्षस-वध
के लिए अस्त्र के रूप में पचास पुत्र प्राप्त किये । वे सब (पुत्र) कामरूपी हैं । हे राजन्,
उस भृशाश्व ने (उन सभी अस्त्रशस्त्रो को) इन्हें दे दिया । इसलिए ये मुनि सभी शस्त्रास्त्रो
के ज्ञाता हैं । तुम डरो मत । इन मुनि की शक्ति तुम नही जानते । इनको वचन
देकर क्यो टाल रहे हो ? इनके साथ जाने से राम का हित ही होगा, उनकी जय अवश्य होगी ।
क्या ये (स्वय) राक्षसो को जीत नही सकते थे ? राजन् (तुम्हारे) हित-चिन्तक
के रूप में, तुम्हारे पुत्र उज्ज्वल चरित्रवान् (राम) को शस्त्रास्त्र विद्या में निपुण सिद्ध करने
के उद्देश्य से ही ये यहाँ पधारे हैं । अत यज्ञ की रक्षा के लिए राम को भेजो । इन्हें
(राम को) देने में ही (तुम्हारा) कल्याण होगा ।
बालकाण्ड २१
१८. विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण को भेजना
इस प्रकार वसिष्ठ के कहने पर, उनकी बातो पर विश्वास करके राजा ने रामचन्द्र
को बुला भेजा । उनका बालकपन देखकर राजा की आँखो में आँसू भर आये । उन्होने
उन्हें गले से लगाया, प्रेम से आशीर्वाद दिये, उनके केशो पर हाथ फेरा, कपोलो को प्यार
से छुआ, थोडी देर सोचते रहे, फिर पुण्याह वाचन पुण्यव्रत, पुण्य हवन और ग्रहो की पूजा
करके सुन्दर वस्त्र तथा भूषण प्रेम से दिये । फिर स्वय, कौसल्या तथा वसिष्ठ ने (उन्हें)
उचित आशीर्वाद देकर, पुण्य मुहूर्त्त में अपने पुत्र-रत्न को पुण्यात्मा गाधि-पुत्र को सौंपा । प्रेम
और त्याग, इन दोनो का सघर्ष (मन में) चलते रहने पर भी (राजा ने) उस मुनि का
सत्कार करके उन्हें विदा किया । तब लक्ष्मण भी उस राम से प्रार्थना करके उनके साथ गये ।
( उस समय ) वृष्टि हुई, अनुकूल पवन चलने लगा, श्रेष्ठ मगल वज उठे ।
आकाश से देवता बडे प्रेम से धनुष, उत्तम शस्त्र, महान तूणीर, खड्ग आदि सहज
रीति से धारण किये हुए, बडे उत्साह से जानेवाले राघव को देखने लगे । अक्षय
तूणीर, पहुँचा तथा अगुली-त्राण पहने कटि से लटकनेवाले कृपाण के साथ दिव्य शर तथा
चाप लिये हुए राघव उस मुनि के पीछे बडे उत्साह से इस प्रकार जा रहे थे, जैसे अश्विनि-
देवता भक्ति से ब्रह्मा की सेवा करते हुए जा रहे हो । वे पुण्य-चरित आधा योजन चलकर
सरयू नदी के तट पर (पहुँचते-पहुँचते) थक गये । तब कौशिक ने राम-लक्ष्मण को बुलाकर
उन्हें बल, अतिबल, नामक महामंत्रो का उपदेश दिया, जिन्हें उन्होने घोर तपस्या के
उपरान्त प्राप्त किया था और जो ब्रह्मा की पुत्रियाँ थी और सभी मंत्रो की मूलाधार थी
तथा सदा सुखप्रदायिनी थी । राम-लक्ष्मण ने उस मत्र-शक्ति के प्रताप से सूर्य का-सा तेज
प्राप्त कर लिया । थकावट, भूख और प्यास आदि सकट से वे मुक्त हो शवित से शोभायमान
हो गये । उस रात्रि को दाशरथि सरयू नदी के किनारे, तरुण कोमल कुश-शय्या
पर, कौशिक से पुण्य-कथाएँ सुनते हुए बडे आनन्द से सो गये ।
गाधिपुत्र-प्रभात के समय शीघ्र ही उठे और वहाँ तृण-शय्या पर आँखें बन्द किये
हुए राघवो को देखकर बडे कौतूहल से कहने लगे—'हे अनघ, अरुणोदय हो चला । प्रात
काल के नित्य कर्मों का पालन होना चाहिए । इसलिए तुम्हें अब जागना चाहिए ।' यह
सुनते ही (वे उठे और ) सध्यावन्दन से निवृत्त होकर प्रफुल्लचित्त से कौशिक को
प्रणाम किया । (उसके पश्चात्) नदी-धारा के किनारे-किनारे चलकर वे सरयू तथा गगा के
सगम के पास पहुँचे और वहाँ कई सहस्र वर्षो से नियमबद्ध हो तपस्या करनेवाले परम
सयमी मुनियो को देखकर, बहुत ही हर्षित होकर दशरथात्मज ने गाधि-पुत्र से
यो कहा—
१९. अनंगाश्रम का वृत्तान्त
'हे सयमीन्द्र, यह किसका आश्रम है ? इस तपोभूमि में कौन रहते हैं ?' तब
मुनि ने कहा—"यह अनगाश्रम के नाम से लोक में विख्यात है। इस आश्रम में बडे धैर्य के
साथ तप में लीन शिव को देखकर कंदर्प ने बडे दर्प के साथ चन्द्रशेखर पर (पुष्प) वाण
चलाया था और उस देव के भाल-नेत्र की अग्नि से भस्म होकर अनग नाम पाया था ।
(उसके) अंगों से प्लावित यह आश्रम-भूमि तब से अंगदेश कहलाने लगी१ । इस आश्रम
भूमि में कठिन तपस्या करनेवाले पुण्यात्मा कृतार्थ हो जाते हैं ।”
इस तरह विश्वामित्र ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया । रघुवीर तथा मुनि वहाँ ठहरकर
स्नानादि अनुष्ठान पूरा करके संतुष्ट हुए । उस स्थान के आश्रमवासी मुनीश्वरों ने दिव्य
दृष्टि से यह बात जान ली । वे रमणीय रूपवाले राम-लक्ष्मण तथा अमित तपोघनी
कौशिक को अपने आश्रम में लिवा ले गये और अत्यन्त उत्साह से अर्घ्य, पाद्यादि देकर
उनका सत्कार किया । पुण्य-कथाओं के कथन से वह रात्रि पुण्यरात्रि हो गई । दूसरे
दिन जब वे पुण्य संयमी उस नदी में नित्य कर्मों से निवृत्त हो चुके, तब विश्वामित्र ने
कहा—'हमें इस नदी का पार उतारने के लिए यह नाविक समर्थ है । यह नाव सूर्य-
वंशजों के लिए लायक है ।' यह सुनकर राम-लक्ष्मण ने उन मुनियों को प्रणाम किया ।
मुनियों ने उनको विदा किया । तब वे विश्वामित्र के साथ नाव पर चढ़कर सरयू नदी
पार करने लगे । जब नाव बीच धार में पहुँची, तब (रामने) आश्चर्य के साथ हाथ जोड़-
कर पूछा—'यह कैसी ध्वनि आकाश तक गूँज रही है । कृपा करके बताइए ।'
मुनि ने कहा—"कैलास पर्वत के मानसरोवर में जन्म लेकर, समृद्ध साकेतनगरी
को चारों ओर से घेरने के बाद गंगा नदी में मिलनेवाली सरयू नदी की लहरों का यह
घोष है । इस पर (राम-लक्ष्मण) ने बड़ी श्रद्धा से उसे प्रणाम किया । उन पुण्यात्माओं ने
नदी को पार किया और हाथी, सूअर, भैंसा, हिरण, शरभ, अजगर, बाघ, रीछ, सिंह से
भरे हुए जंगल में प्रवेश किया । तब राघव ने कहा—"हे मुनीश्वर, खदिर (कत्या),
तिन्दुक, पूग, खजूर, निम्ब, बदरी, वट, अशोक, पाटलि आदि तरुओं तथा बहुकंटक एवं
लता-परिवेष्टित वृक्षों से युक्त, यह निर्जन वन किसका आश्रम है ? कृपया बताइए ।”
तब विश्वामित्र श्रीराम से सारा वृत्तान्त यों कहने लगे—'प्राचीन काल में इन्द्र वृत्रासुर
का वध करने से मल-कलुष-प्राप्त तथा मलिनांग हुआ । तब देवता तथा मुनि इन्द्र को पाप-
मुक्त करने के लिए यहाँ ले आये और पुण्यसलिल तथा पवित्र मंत्रों से पुण्याभिसेचन
किया । इससे उसके शरीर पर लगे मल-कलुष दोनों यहाँ के प्रदेशों में झर गये और
इन्द्र शुद्ध हो गया । इसलिए इन्द्र ने इन प्रदेशों को, मल युक्त होने से 'मलद' तथा क्लेश-
कलित होने से 'करूप' तथा 'पापघ्न' नाम दिये । वृत्रासुर के वध से लगे हुए पाप की
मुक्ति इस प्रदेश में होने से इन्द्र ने इन नगरों को धन-धान्य-वैभव से समृद्ध रहने का वर
दिया । हे रघुराम, एक बात और सुनो ।
२०. विश्वामित्र का श्रीरामचन्द्र को ताड़का का वृत्तान्त सुनाना
“इस पृथ्वी पर ताड़का नाम की एक राक्षसी, एक हजार हाथियों का बल रखती हुई,
बड़े साहस के साथ, इन दोनों प्रदेशों में प्रवेश कर स्वेच्छा से लोगों को तंग करती हैं ।”
इसपर राघव ने पूछा—'उस स्त्री को किसने इतनी शक्ति दी ? यह दुष्टबुद्धि
किसकी लड़की है ? यह पापिन क्यों इन दो प्रदेशों को पीड़ा पहुँचा रही है ? कृपया बताइए ।'
१ वाल्मीकि और कालिदास ने भी अनंगाश्रम का वर्णन किया है, पर वह अंग-
देश में नहीं था । वह तो सरयू नदी के किनारे था । अंग-देश तो वर्त्तमान भागलपुर
और मुंगेर जिले माने गये हैं, जिसमें सरयू नदी नहीं है ।—सम्पादक
इस पृथिवी पर सुकेत नामक एक यक्ष ने पूर्व में ब्रह्मा की तपस्या की थी और
अत्यधिक भक्ति से उनको तृप्त किया और उनसे एक पुत्र माँगा । (तब ब्रह्मा ने कहा)
'मैं तुम्हें पुत्र नही दूंगा । एक हजार हाथियो का बल रखनेवाली एक पुत्री दूंगा ।' उस
वर से उसे एक लडकी प्राप्त हुई । उसने विचार करके अपनी उस लडकी का विवाह
सुद (नामक व्यक्ति) से कर दिया । उसने (सुद ने) उस स्त्री से 'मारीच' तथा 'सुबाहु'
नामक दो भयंकर शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किये । इसके पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई । वह
स्त्री अपने पुत्रो के साथ वडे गर्व से अगस्त्य के आश्रम में जाकर वार-वार उनवो तग
करने लगी । अगस्त्य ने इन पापियो को देखकर क्रोध से उन्हें राक्षस वन जाने का शाप
दिया । उस दिन से राक्षस-रूप धारण कर निर्दयी हो वह मनुष्यो का आहार करती हुई
यही रहती है और पृथ्वी को दुख देती है । तुम्हारे अतिरिक्त कोई इसे मार नही सकता ।
सिवा तुम्हारे हाथ के किसी से यह नही मरेगी । यह मत कहो कि यह स्त्री है, इसलिए
इसे मारना नही चाहिए । यदि गो-ब्राह्मणो का हित हो, तो यही कारण स्त्रियो को मारने
के लिए राजाओ को पर्याप्त है । प्राचीन काल में सारे ससार का नाश करने के लिए
उद्यत, मतिमान् विरोचन की दुष्टा पुत्री को क्या इन्द्र ने क्रोध से नही मारा था ? क्या
वह कार्य (ससार में) स्तुत्य नही हुआ है ? पहले दृढ़ व्रतवाली भृगु-पत्नी के ससार में
अशान्ति फैलाने का उपक्रम करने पर क्या विष्णु ने (स्वयं) उस स्त्री का वध नही किया था ?
इसलिए हे पुण्य-चरित्र, लोकहित के लिए स्त्रियो का वध करना भी पुण्य ही है ।"
२१. ताड़का का वध
विश्वामित्र के ऐसे अनुपम वाक्यो तथा अपने पिता के आदेश का विचार करके
राघव ने , उस ब्रह्मर्षि के वचन की अवहेलना नही करते हुए कहा कि मैं ताडका को
दण्ड दूंगा । उन्होने (अपने) धनुष की टकार से सारे आकाश को गुंजा दिया । (उसे सुनकर)
ताडका क्रोध से उबल उठी । कर्ण-कठोर धनुष की टकार सुनकर उसका चचल लाल नेत्रो
वाला मुख विकृत हो उठा । वह अपने दोनो हाथो को ऊपर उठाये हुए इस प्रकार आने लगी,
जैसे पखोवाला पहाड वडे वेग से आ रहा हो । प्रकट अट्टहास से उसके वडे-वडे
दष्ट्रो की काति चारो ओर बिखर रही थी । (चलते समय) वह अपने पदाघात से अपनी
अमित शक्ति का परिचय पृथ्वी को दे रही थी । सारा आकाश एकदम हिल-सा गया ।
इस प्रकार आनेवाली ताडका को देखकर दाशरथि राम ने सभ्रम-चित्त से अपने भाई से
कहा—'देखा तुमने इसका ढग, इसका रूप और इसकी भयंकर दृष्टि । इसको देखने पर
किसे भय नही होगा ? मैं अवश्य इसका वध करूँगा ।"
इस प्रकार (श्रीराम) कह ही रहे थे कि (अपने) गर्जन से समस्त आकाश को
कँपाती हुई, अपनी पद-धूलि से समस्त (ससार) को ढकती हुई वह भयंकर राक्षसी वडी-
वडी शिलाओ की वर्षा करने लगी । इससे क्रुद्ध हो राघव ने अपने अनुपम अस्त्रो से
उन शिलाओ को काट डाला और उस (राक्षसी) के दोनो हाथ भी काट डाले । तब
लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान इस प्रकार काट डाले, मानो वे यह बतलाना चाहते हों
कि आगे में उस असुर-राज की वहन की भी यही दशा कर दूंगा ।
२४ रंगनाथ रामायण
बड़े आश्चर्य की बात है कि तब वह कामरूपिणी, माया का रूप धारण करके,
कई अस्त्रों की वर्षा करने लगी । तब विश्वामित्र ने कहा—'हे अनघ, संध्या हो रही है
और संध्या के समय राक्षसों को जीतना कठिन है । अब तुम उसपर दया करना छोड़ दो
और लोक-हितार्थ इसे तुरंत मार डालो ।'
तब गाधेय का आदेश मानकर (राघव ने) शब्द-वेधी बाणों से उस मायाविनी की
मायाओं को दूरकर, भयंकर गर्जन करती हुई बिजली के समान आनेवाली राक्षसी को
(उन्होंने) देखा । तब उन्होंने एक महान् अस्त्र उसके कुचाग्र पर ऐसा चलाया कि रक्त
की कई धाराएँ वह निकलीं, मानो रामचंद्र असुरों को दण्ड देने का उपक्रम करते समय
शरों को (रक्त का) उपहार दे रहे हों ।
तब वह (राक्षसी) पृथ्वी पर इस तरह गिरी, मानो प्रलय-मारुत से संध्या का
आकाश टूटकर पृथ्वी पर गिर गया हो । समस्त प्राणी आनंदित हुए । देवता तथा मुनि
हर्षित हुए । कौशिक ने राम को गले से लगाकर आशीर्वाद दिये ।
तब देवता तथा गंधर्वों के नाथ देवेन्द्र वहाँ आया और श्रीराम के दर्शन करके,
उनकी पूजा तथा प्रार्थना की । फिर देव-भक्त गाधेय को देखकर इन्द्र ने कहा—"हमारी
रक्षा करने के लिए इस पृथ्वी पर अवतार लिये हुए इस महापुरुष को आप भृशाश्व की
संतान-रूपी सभी अस्त्र-शस्त्र प्रदान करें ।” इस प्रकार कहकर इन्द्र देव-लोक को लौट गये ।
इतने में सूर्यास्त हो गया । वे लोग वहीं ठहर गये ।
२२. विश्वामित्र का श्रीराम को भृशाश्व-संतान-रूपी शस्त्र देना
दूसरे दिन विश्वामित्र ने राम को बड़े प्रेम से अपने पास बुलाकर कहा—
'हे राम ! तुम्हारा रण-कौशल देखकर हम बहुत प्रसन्न हुए । अब हम तुम्हें ऐसे शस्त्रास्त्र
देंगे, जो अमर, उरग, असुर तथा यक्षों के साथ युद्धों में श्रेष्ठ सिद्ध होंगे ।”
यों कहकर तन और मन से शुद्ध हो, मुनीश्वर ने राम को पूर्वाभिमुख बिठाया,
ध्यान किया और क्रमशः दण्ड-चक्र, धर्म-चक्र, काल-चक्र, विष्णु-चक्र, इन्द्र का वज्र और
खड्ग, वरुण-पाश, धर्म-पाश, काल-पाश, परमशिव का भयंकर शूल, शक्तियुग्म (विष्णु-
शक्ति तथा रुद्र-शक्ति), भयंकर उष्ण तथा अनुष्ण अशनियाँ (शुष्काशनि तथा आर्द्राशनि),
कङ्काल (जिन्हें राक्षस धारण करते हैं), भयंकर करवाल, मूसल, कंकण और क्रौंचबाण
आदि शस्त्र (श्रीराम को) दिये । इसके पश्चात् (उन्होने) बड़ी प्रसन्नता तथा प्रेम से
आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, तेजःप्रभास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्मशिर, प्रस्थापन, नारायण, पैनाक, शिशिर,
दारुण, शौर्य तथा मुदामन् प्रशमन, विलापन, विशठ प्रभाववाला विद्याधर, वायव्य,
सौम्य, संवर्त्त आदि नामक अस्त्र तथा मायाधर, मानव, मदन, मौमन, रुद्र, संतापन, मौसल,
दर्पग, हयधिर आदि अस्त्र, मायाओं का प्रयोग कर विजय दिलानेवाले गंधर्व तथा सम्मोहनास्त्र,
अत्यंत निष्ठा-समन्वित तथा शोणितारव्य अद्वितीय आग्नेयास्त्र, गरुडास्त्र, कौवेरास्त्र,
नर्गमहास्त्र, नागास्त्र, अवार्थ वैष्णवास्त्र, सतत नृत्य वैद्यावरास्त्र, रौद्रास्त्र, राक्षसास्त्र, कल्याण-
प्रद पाशुपतास्त्र, कर्त्तरीचक्र, मेधास्त्र जैसे अगणित अस्त्रसमूह, अखिल दारुण मोदकी,
शिखरी नामक गदाएँ, वामन, पैशाच तथा वायव्य शस्त्र, सोम, सौम्य, संवर्द्धन, साम, मदन,
बालकाण्ड २५
संतापन, तामस, जैसे दारुण अस्त्र, ककोल, करवाल, मूसल आदि धारण-योग्य अस्त्र राम
को दिये । उन्हें लेते हुए राम ने उस महात्मा को देखकर कहा "हे मुनिनाथ, आपकी
कृपा से अभी अस्त्र प्राप्त करके मैं कृतार्थ हुआ । अब आप मुझे उपसंहार के अस्त्र प्रदान
कीजिए ।"
इस पर प्रसन्न हो उस मुनि ने उन्हें सत्यवत, रभस, पराङ्मुख, सत्य-कीर्त्ति, दशाक्ष,
अवाङ्मुख, प्रतिहारतर, मारण, शुचि, शतवक्त्र, दैत्य, धृष्ट, लक्ष्य, कृशन, करवीरक, दश-
शीर्ष, शतोदर, ज्योतिष, विमल, मकर, विरुचि, निष्कुलि, प्रमथन, सुनाम, सर्वनाम, दुदुनाभ,
पद्मनाभ, तृणनाभ, नैराश्य, का रूप, योगधर, सैमन, निद्रा, सधान, मोहन, विषमाक्ष, महानाभ,
बाहुविभूति, जृम्भक, धन, धान्य, वृत्तवत, रुचिर, सार्चिमाली, धृतिमाली नामक कामरूपवाले
महान् अस्त्रो का उपदेश राजकुमार को दिया । इनके अतिरिक्त भी (मुनि ने) उस रघु-
वश प्रभु को अनेक शस्त्रास्त्र-समूह दिये, उनकी शक्ति बताई, उनसे सबध रखनेवाले मत्र
बताये, उनके प्रयोग की तथा उपसहार की विधि बताई । शस्त्रास्त्र-सबंधी सभी
मर्म बताये ।
तब राम के आगे वे सभी ( शस्त्रास्त्र ) तरह-तरह के रूप धारण करके
प्रकट हुए । उनमें कुछ अग्नि-सदृश थे, कुछ भयकर थे, कुछ धूमिल कांति के थे, कुछ
अनुपम दीप्तिमान् थे, कुछ दिव्य शरीरवाले थे, कुछ चंद्र-प्रभा-विलसित थे, कुछ भानु-
दीप्ति-विलसित थे, कुछ अधकार-विलसित थे, कुछ भयकर अट्टहास कर रहे थे और
कुछ पवित्र रूप धारण किये हुए थे । उन सब ने मुकुलित करो से (राम के आगे) खडे
होकर कहा—'हे राजन्, हम कौन-सा कार्य करें, हमें क्या आदेश देते हैं ? हमें कहाँ
भेजेंगे ?' तब राम ने कहा—'मेरे स्मरण करने पर तुम चले आना, अभी तुम जा
सकते हो ।' यह सुनकर सभी शस्त्रो ने उस वसुवेश की प्रदक्षिणा की और नमस्कार
करके चले गये ।
तब राघव ने मुनिनाथ के सामने हाथ जोडकर विनय, भक्ति तथा विश्वास प्रकट
करते हुए कहा—'हे अनघ, आपकी कृपा से में कृतार्थ हुआ ।'
उसके पश्चात् वे विश्वामित्र के पीछे-पीछे चलने लगे । चलते-चलते उन्हें वामनाश्रम
का सुदर प्रदेश दिखाई पडा । उसे देखकर काकुत्स्थवंशी राम ने कहा—"हे सयमीद्र, इस
पर्वत के निकट, नाना मृगो की ध्वनियो, सुदर पक्षियो तथा मृगो से भरा यह दर्शनीय तथा
सुदर वन किसका आश्रम है ? यहाँ सब मृग बडे सुख से रह रहे हैं । हे सर्वज्ञ, आपकी
यज्ञ-भूमि यहाँ से कितनी दूर है ? चचल तथा उद्धत राक्षस आपके यज्ञ को अपवित्र करने
के लिए कहाँ से आते हैं ? में अपने तेज बाणो से उन समस्त राक्षसो को मार डालूँगा
और यज्ञ की रक्षा करूँगा ।"
तब कौशिक ने जगदभिराम राम के कपोल स्नेह से छूकर बडे प्रेम से कहा—
'हे अनघ, क्या कोई ऐसा विषय है, जिसे तुम नही जानते ? यदि मुझसे ही सुनने की
इच्छा है, तो सुनो ।'
४
२६ रंगनाथ रामायण
२३. कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तांत सुनाना ।
"प्राचीन काल में विष्णुदेव बड़े आनंद से तपस्या करने के लिए यहाँ अनेक युगों
तक रहे । इसलिए हे अनघ, इसे वामनाश्रम कहते हैं । उसके पहले यह सिद्धाश्रम नाम से
विख्यात था । हे जननाथ, विरोचन का पुत्र बलि अपने विशाल राज्य-वैभव के कारण
घमंड से प्रबल होकर देव तथा सुरों को यातनाएँ देने लगा । तब मुनि तथा देवता इस
आश्रम में आये और कमलनाभ को प्रणाम करके कहा—'हे शरणागत-प्रिय, हे लोकेश,
हे कमलगर्भ, हमारी रक्षा कीजिए । हमें शरण दीजिए । हमें त्रास देनेवाला बलि यज्ञ कर
रहा है । उस राक्षस-यज्ञ-भूमि में जो कोई भी जो कुछ माँगता है, वह दे रहा है । उस
यज्ञ की समाप्ति के पहले ही आप हमारा हित सिद्ध कीजिए ।'
"उसी समय उज्ज्वल व्रत-निष्ठ कश्यप ने अदिति के साथ एक सहस्र वर्ष का तप
पूरा किया । उसके उपरांत संतुष्ट हो विष्णु ने उन्हें दर्शन दिये । तब (उस दंपति ने)
प्रार्थना की—'हे रवि-शशि-लोचन, आप अपने शरीर में हमें समस्त लोकों के दर्शन
कराइए । हे आद्यन्त-रहित और वेद-वेद्य, हम आपकी शरण में आये हैं ।'
"विष्णु ने कृपा-दृष्टि से कश्यप को देखकर कहा—'आप अपने इच्छानुसार कोई
वर माँग लीजिए, मैं दे दूँगा ।' कश्यप ने बड़ी प्रसन्नता तथा भक्ति से हाथ जोड़कर
कहा—'हे भगवन्, आप अत्यंत तेज-समन्वित होकर मेरे तथा अदिति के पुत्र होकर जन्म
लीजिए तथा सुरों की रक्षा कीजिए । यही मेरी तथा देवताओं की इच्छा है । हम सब
की इच्छा आप पूर्ण कीजिए ।"
"कश्यप के इस प्रकार कहने पर विष्णु ने अपने अनुपम तेज से युक्त हो अदिति
के गर्भ में जन्म लिया । उन्होंने वामन का रूप धारण कर उस दानव (बलि) से तीन
पग धरती माँगी । फिर, दो पगों से पृथ्वी तथा आकाश को नाप लिया और उस धन्यात्मा
(बलि) को बाँधकर इन्द्र को तीनों लोक देते हुए कहा—'तुम इन पर शासन करो !'
इसलिए यह स्थान वामनाश्रम कहलाता है । यही हमारा आश्रम है । इस पुण्यभूमि के
निवासी तपोसिद्ध हैं, अतः यह सिद्धाश्रम भी कहलाता है । तुम्हीं वामन होकर त्रिविक्रम
का अवतार लेनेवाले विष्णु हो । उन दिनों में भी यह तुम्हारा ही वन था । हे राम,
आज भी उसी रीति से यह तुम्हारा ही वन है ।" इस प्रकार, कहते हुए कौशिक अपने
आश्रम में गये और (वहाँ जाकर) राम-लक्ष्मण का सत्कार किया ।
२४. विश्वामित्र का यज्ञ
वहाँ के मुनियों ने बड़े प्रेम के साथ राम की पूजा की । तब राघव ने विश्वामित्र
के देखकर बड़े हर्ष से कहा—'हे मुनीश्वर, आप निश्चित होकर आज ही यज्ञ-दीक्षा
ले लीजिए । यज्ञ के शत्रुओं का संहार मैं अवश्य करूँगा ।'
तब विश्वामित्र अत्यंत हर्षित हुए और मुनियों को बुलाकर स्वयं यज्ञ-दीक्षा ली ।
मुनियों ने यज्ञ की वेदियाँ तैयार कर दीं और यज्ञ के आवश्यक अंगों से यज्ञ-वेदी संपन्न
हो गई । घी की आहुतियाँ पड़ने लगीं और अग्नि की ज्वालाएँ आकाश तक फैलने लगीं ।
हवन की अग्नि के प्रज्ज्वलित होने के साथ-ही-साथ साम आदि वेदों के आनन्द-घोष, निरंतर
( सुनाई पडनेवाली ) देवताओ का आह्वान करनेवाली ध्वनियां तथा होताओ के पुण्य-
मंत्रो के शब्दो से दिशाएँ अत्यधिक गूंजने लगीं । एक ओर बडे आश्चर्य के साथ यज्ञ के
कार्य हो रहे थे, दूसरी ओर रामचन्द्र धनुष धारण कर, भाई सौमित्र के साथ, बडी सतर्कता से,
राक्षसो के आने का मार्ग पहले ही जानकर उस मुनि विश्वामित्र की रक्षा इस प्रकार
करने लगे, जैसे समस्त विश्व को अंधकार से आवृत होने से बचाने के लिए चंद्र और सूर्य
अपनी शाश्वत प्रभा फैलाते हैं । बडी भक्ति के साथ पाँच दिनो तक वे (उस यज्ञ की)
रक्षा इस प्रकार करते रहे, जैसे पलकें पुतलियो की रक्षा करती हैं । छठे दिन मारीच तथा
सुबाहु अपना समस्त बल इकट्ठा करके, उद्धत गति से आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये,
मानो (उन सबके शरीर) काले मेघो की राशि हो और उनके श्रेष्ठ खड्गो की कांति
बिजली हो । वहाँ खडे होकर वे गर्जन करते हुए घमंड से फूलकर यज्ञ-भूमि में लगातार
रक्त-मांस की वर्षा करने लगे । तब होताओ में कोलाहल होने लगा । उपस्थित
सदस्यो में कल-कल ध्वनि प्रारंभ हो गई । परिचारको के दीन वार्त्तालाप सुनाई
पडने लगे ।
यह सुनकर रामचन्द्र ने क्रोध के आवेश में लक्ष्मण से कहा—“हे लक्ष्मण, अब तुम
मेरी शक्ति देखो । उनके धनुष की टंकार विजय-लक्ष्मी के धनुष की टंकार के समान थी ।
उन्होने खडे होकर अपनी दृष्टि आकाश पर केंद्रित की और अत्यंत वेग के साथ वायव्य
बाण चलाया । वह बाण मारीच को द्रुतगति से शत योजन तक उठा ले गया और उस
क्रूर राक्षस को समुद्र में फेंक दिया । वज्र के प्रहार से समुद्र में गिरे हुए मैनाक की तरह
वह असुर समुद्र में गिरा, फिर किसी तरह तट तक पहुँचा । उसने उस सूर्यवंशी (राम)
के उज्ज्वल पराक्रम की प्रशंसा जहाँ-तहाँ की, (अपने) राक्षस-दल को छोड दिया, अपना
शौर्य त्याग दिया, आसुरी वृत्ति को दबा दिया और आसुचन्द्राश्रम-भूमि में सतत तपस्या
में लीन रहने लगा ।
उसके पश्चात् रघुराम ने सुबाहु के हृदय पर अग्नि-बाण चलाकर उसका संहार
कर डाला । एक मानव-शर से अन्य राक्षस-सेना का वध कर दिया । (यह देखकर) देवता
बडे हर्ष से पुष्प-वृष्टि करने लगे । मुनियो ने (राम की) स्तुति की । जिस प्रकार वृत्रासुर का
वध करने पर देवता लोग इन्द्र की प्रशंसा करने के हेतु उनके चारो ओर एकत्र हुए थे,
वैसे ही (आज) राम अपने भुज-बल के प्रताप से यज्ञ के शत्रुओ को दंड देने के कारण
(मुनिजनो के बीच) शोभायमान हो रहे थे ।
विश्वामित्र बडी निष्ठा के साथ यज्ञ की सभी क्रियाओ को समाप्त करके आये
और राम को बडे हर्ष से गले लगाकर उनकी प्रशंसा की और आशीर्वाद देकर बोले—
‘रघुराम, तुम्हारी कृपा से मैं बिना किसी कठिनाई के यज्ञ संपूर्ण करके कृतार्थ हुआ ।’
इस प्रकार, उस पुण्यात्मा विश्वामित्र मुनि का अनुराग प्राप्त करके राम ने वही
रात्रि बिताई और बडे सवेरे, प्रात काल की सभी विधियो से निवृत्त होकर, सब मुनियो
को प्रणाम करके, गाधि-पुत्र से कहा—“हे तपोनिष्ठ, अब हमारे लिए क्या आज्ञा है ?
हम आपके दास हैं और आपकी कृपा के पात्र हैं ।”
२८ रंगनाथ रामायण
तब वहाँ के सभी मुनि गाधि-पुत्र को आगे करके इस प्रकार कहने लगे—"हे रवि-
कुल श्रेष्ठ, महाराज जनक बड़े सुंदर ढंग से यज्ञ कर रहे हैं । हम वहाँ चलें । उनके पास
परमशिव का दिव्य धनुष है । गंधर्व तथा राक्षस आदि कई वीर उसे उठाने में असमर्थ
हो चुके हैं । ऐसे धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढानेवाले श्रेष्ठ वीर के साथ ही अपनी
पुत्री का विवाह करने की प्रतिज्ञा राजा जनक कर चुके हैं । इसलिए उस श्रेष्ठ धनुष
को तथा जनक के यज्ञ को देखने आपको अवश्य जाना चाहिए ।”
इस प्रकार विश्वामित्र तथा अन्य मुनियों ने उन वीर, पुण्यात्मा, दाशरथियों को
मिथिलापुरी चलने की प्रेरणा दी । सब लोग बड़े हर्ष से प्रस्थानकर गंगा के उत्तर तट पर
पहुँचे१ और हिमाचल तथा सिद्धाश्रम को दक्षिण में छोड़कर२ उत्तर की ओर बढ़े ।
उस मार्ग से यात्रा करते हुए वे उस दिन तीसरे पहर तक तीन योजन चले । वहाँ शोण
नदी के किनारे वे ठहरे और वहाँ के पुण्य तीर्थ में स्नान आदि क्रिया से निवृत्त हुए
(उसके पश्चात्) उस रम्य स्थल में मुनियों के साथ बड़े आनंद से रहते हुए राम ने कौशिक
से यो कहा—
२५. कौशांबी का वृत्तांत
(श्रीराम ने कहा)—'हे मुनिनाथ, अत्यधिक प्रजा-समृद्ध यह देश किसका है ?
कृपया बतलाइए ।' तब विश्वामित्र ने कहा—"हे राजन्, सुनो, ब्रह्मा के मानस-पुत्र कुश
नामक एक यशस्वी मुनि पूर्व काल में रहते थे । उन्होंने वैदर्भी नामक स्त्री से रूपवान्
तथा शांत प्रकृतिवाले अमूर्त्तरज, वसु, कुशांब और कुशनाभ नामक चार पुत्र प्राप्त किये ।
चारो पुत्र अत्यंत साहस तथा शूरता के साथ अपने क्षत्रिय-धर्म का पालन करने लगे ।
अपने पुत्रो के चरित्र तथा सद्गुण देखकर कुश ने बडे हर्ष से कहा—'इस पृथ्वी पर तुम
लोगो को प्रजा का पालन करना चाहिए । इससे तुम्हारी कीर्ति व्याप्त होगी ।'
“तब कुशल कुशांब ने बहुत प्रसन्न होकर कौशांबी नाम से एक नगर का निर्माण किया ।
हे दशरथात्मज, कुशनाभ ने महोदय नामक नगर बसाया । शूर अमूर्त्तरज ने धर्मा-
रण्य नामक सुंदर नगर का निर्माण किया और वसु ने गिरिव्रज नामक एक अत्यंत दर्शनीय
नगर बसाया । यह प्रदेश, जहाँ हम है, महाराज वसु के राज्य में है ; इस प्रदेश के
चारो दिशाओ में पाँच पर्वत है । उन पर्वतो के मध्य मागधी नामक एक नदी बहती है। इस
सारे मगध देश पर वसु महाराज अत्यंत धर्म की रीति से प्रजा का पालन करते हैं ।
“कुशनाभ ने घृताची नामक एक अप्सरा से प्रेम करके (विवाह किया)। मन्मथ-शर
जैसे नेत्रवाली सौ रूपवती पुत्रियो को प्राप्त किया । एक दिन कमनीय कांति-युक्त तथा
मनोहर यौवन-सपन्न वे युवतियाँ उद्यान में गईं ।
१ गंगा के दक्षिण तट से चले; क्योकि उत्तर तट पर पहुँचकर चलने से शोण
नदी नहीं मिलेगी । —सम्पादक
२. हिमाचल तो 'जनकपुर' से भी उत्तर है, उसे दक्षिण में छोड़कर 'सिद्धाश्रम'
से चलना असंगत है । वाल्मीकिरामायण में लिखा है कि सिद्धाश्रम हिमालय की ओर
उत्तर दिशा में चलने के उद्देश्य से वे चले।—सम्पादक