रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार विनती करनेवाले देवताओ को देखकर वनजाक्ष (विष्णु) ने घन-गर्जन
के समान गंभीर ध्वनि में कहा—"हे देवताओ, तुम लोग सुखी होओ। मैं मर्त्यलोक में
अवतार लूँगा और उसके पश्चात् दशकंधर का बंधु, मित्र, अमात्य, पौत्र तथा बहुओ के
साथ नाश करके, ग्यारह हजार वर्ष तक नियमानुकूल इस पृथ्वी का पालन करूँगा। ब्रह्मा
के वर से ही राक्षसेन्द्र इस अवनीतल पर जीवित है।" यों कहते हुए असुरारि (विष्णु)
ब्रह्मा तथा देवताओ को विदा करके चले गये।
११. दशरथ को यज्ञ-पुरुष का पायस देना
उधर विमल हवनाग्नि से नीले अंगवाले, अरुणावरधारी, सूर्य के समान तेजस्वी,
महान् विक्रमी तथा पुण्यात्मा एक दिव्य मूर्ति अपने हाथ में पायस (खीर) से भरे एक
स्वर्ण-पात्र को लिये बाहर आये। उन्हें देख राजा अद्भुत आश्चर्य में पड गये और विनय
के साथ उठकर खडे हो गये। राजा को देखकर (यज्ञ-पुरुष ने) कहा—"राजन्, मैं यज्ञ-
पुरुष हूँ। तुम्हें पुत्र-दान देने की इच्छा से आया हूँ। इस पायस को ग्रहण कर भक्ति के
के साथ अपनी रानियो को दो।" इसपर राजा ने बड़ी भक्ति के साथ उनकी पूजा की
और पायस यों ग्रहण किया, जैसे शचीपति ने सुधा-कलश ग्रहण किया था। अग्निदेव
के अन्तर्द्धान होने के बाद राजा अन्त पुर में गये, तो रानियो ने बड़े आनन्द से उनका
स्वागत किया। (राजा ने) देवताओ से बनाये गये उस पायस का आधा भाग कौसल्या
को दिया, शेष आधे का आधा सुमित्रा को दिया, बचे हुए भाग का आधा कैकेयी को और
शेष पुनः प्रसन्नता से सुमित्रा को दिया।
उस पायस को भक्ति से ग्रहण करने के बाद रानियाँ गर्भवती हुईं। उन्हें देखकर
राजा आनन्द-मग्न दिखाई देने लगे। निदान, राजा ने ऋष्यशृंग आदि मुनियो तथा अन्य
राजाओ को बड़े आदर-सत्कार के साथ विदा किया और रानियों के साथ परम अनुरागयुक्त
हो नगर में लौट आये।
१२. देवताओं को वानरों के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्मा की सलाह
अपना-अपना यज्ञ-भाग लेकर जब देवता अपने लोक को जाने लगे, तब ब्रह्मा ने
इन्द्रादि देवताओ को देखकर कहा—"लोकरक्षणार्थ विष्णु इस पृथ्वी पर अवतार ले रहे हैं।
इसलिए तुम्हें भी उनकी सहायता के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इसलिए तुम लोग
लोकहितार्थी शक्तिमान्, पराक्रमी, बल तथा पराक्रम में अपने समान शक्तिमान् कई वानरों को,
किन्नर, गंधर्व, खेचर, यक्ष, पन्नग, अमर, तथा सिद्ध स्त्रियो (के गर्भ) से उत्पन्न करो।
मैं अत्यन्त बलनिधि जाम्बवान् को पहले ही जन्म दे चुका हूँ। मेरे जँभाई लेने समय उसने
जन्म लिया है। वह चिरजीवी है।"
इस तरह ब्रह्मा का आदेश पाकर देवता लोग प्रसन्न हुए। इन्द्र ने वालि को,
अग्नि ने नील को, सूर्य ने सुग्रीव को, बृहस्पति ने तार को, वरुण ने सुषेण को, कुवेर ने
गंधमादन को, विश्वकर्मा ने नल को, अश्विनीकुमारो ने द्विविद-मैंद को, पर्जन्य ने शरभ
को और वायुदेव ने हनुमान् को इस पृथ्वी पर जन्म दिया। अन्य देवताओ ने भी अपने-
अपने तेज से अमित पराक्रमी तथा श्रेष्ठ वानरों को जन्म दिया। वे (सभी) वानर जगत् के