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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 508 में से

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पृष्ठ 51

बालकाण्ड २१
१८. विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण को भेजना
इस प्रकार वसिष्ठ के कहने पर, उनकी बातो पर विश्वास करके राजा ने रामचन्द्र
को बुला भेजा । उनका बालकपन देखकर राजा की आँखो में आँसू भर आये । उन्होने
उन्हें गले से लगाया, प्रेम से आशीर्वाद दिये, उनके केशो पर हाथ फेरा, कपोलो को प्यार
से छुआ, थोडी देर सोचते रहे, फिर पुण्याह वाचन पुण्यव्रत, पुण्य हवन और ग्रहो की पूजा
करके सुन्दर वस्त्र तथा भूषण प्रेम से दिये । फिर स्वय, कौसल्या तथा वसिष्ठ ने (उन्हें)
उचित आशीर्वाद देकर, पुण्य मुहूर्त्त में अपने पुत्र-रत्न को पुण्यात्मा गाधि-पुत्र को सौंपा । प्रेम
और त्याग, इन दोनो का सघर्ष (मन में) चलते रहने पर भी (राजा ने) उस मुनि का
सत्कार करके उन्हें विदा किया । तब लक्ष्मण भी उस राम से प्रार्थना करके उनके साथ गये ।
( उस समय ) वृष्टि हुई, अनुकूल पवन चलने लगा, श्रेष्ठ मगल वज उठे ।
आकाश से देवता बडे प्रेम से धनुष, उत्तम शस्त्र, महान तूणीर, खड्ग आदि सहज
रीति से धारण किये हुए, बडे उत्साह से जानेवाले राघव को देखने लगे । अक्षय
तूणीर, पहुँचा तथा अगुली-त्राण पहने कटि से लटकनेवाले कृपाण के साथ दिव्य शर तथा
चाप लिये हुए राघव उस मुनि के पीछे बडे उत्साह से इस प्रकार जा रहे थे, जैसे अश्विनि-
देवता भक्ति से ब्रह्मा की सेवा करते हुए जा रहे हो । वे पुण्य-चरित आधा योजन चलकर
सरयू नदी के तट पर (पहुँचते-पहुँचते) थक गये । तब कौशिक ने राम-लक्ष्मण को बुलाकर
उन्हें बल, अतिबल, नामक महामंत्रो का उपदेश दिया, जिन्हें उन्होने घोर तपस्या के
उपरान्त प्राप्त किया था और जो ब्रह्मा की पुत्रियाँ थी और सभी मंत्रो की मूलाधार थी
तथा सदा सुखप्रदायिनी थी । राम-लक्ष्मण ने उस मत्र-शक्ति के प्रताप से सूर्य का-सा तेज
प्राप्त कर लिया । थकावट, भूख और प्यास आदि सकट से वे मुक्त हो शवित से शोभायमान
हो गये । उस रात्रि को दाशरथि सरयू नदी के किनारे, तरुण कोमल कुश-शय्या
पर, कौशिक से पुण्य-कथाएँ सुनते हुए बडे आनन्द से सो गये ।
गाधिपुत्र-प्रभात के समय शीघ्र ही उठे और वहाँ तृण-शय्या पर आँखें बन्द किये
हुए राघवो को देखकर बडे कौतूहल से कहने लगे—'हे अनघ, अरुणोदय हो चला । प्रात
काल के नित्य कर्मों का पालन होना चाहिए । इसलिए तुम्हें अब जागना चाहिए ।' यह
सुनते ही (वे उठे और ) सध्यावन्दन से निवृत्त होकर प्रफुल्लचित्त से कौशिक को
प्रणाम किया । (उसके पश्चात्) नदी-धारा के किनारे-किनारे चलकर वे सरयू तथा गगा के
सगम के पास पहुँचे और वहाँ कई सहस्र वर्षो से नियमबद्ध हो तपस्या करनेवाले परम
सयमी मुनियो को देखकर, बहुत ही हर्षित होकर दशरथात्मज ने गाधि-पुत्र से
यो कहा—
१९. अनंगाश्रम का वृत्तान्त
'हे सयमीन्द्र, यह किसका आश्रम है ? इस तपोभूमि में कौन रहते हैं ?' तब
मुनि ने कहा—"यह अनगाश्रम के नाम से लोक में विख्यात है। इस आश्रम में बडे धैर्य के
साथ तप में लीन शिव को देखकर कंदर्प ने बडे दर्प के साथ चन्द्रशेखर पर (पुष्प) वाण
चलाया था और उस देव के भाल-नेत्र की अग्नि से भस्म होकर अनग नाम पाया था ।