रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबालकांड १५
वह गंधर्व, यक्ष आदि देवगणो, मुनियो तथा साधुओ को पकड़कर कष्ट दे रहा है ।
सभी कुल-पर्वत उसके नाम से डरते है । सूर्य भी ताप फैलाने से डरता है । वह जिस
नगर में रहता है, वहाँ पवन भी अपनी पूरी शक्ति के साथ चलने से डरता है । उसके
अतिशय प्रताप से डरकर समुद्र अच्छी तरह गर्जन नही कर पाता है । दीख पड़ने पर हमें
भी दुख देता है । ऐसे पापी दशकंधर का अन्त करने का उपाय आपको सोचना चाहिए ।"
तब ब्रह्मा ने उन सारी बातो को हृदयगम करके देवताओ से कहा--" (रावण)
अमरो के हाथ नही मरेगा, राक्षसो से नष्ट नही होगा, गधर्वो से मिटेगा नही, रजनीचरो
से समाप्त नही होगा, भुजगो से मारा नही जायगा, यक्षो से हत नही होगा, पक्षिसमूह से
पराजित नही होगा । मेरे वर देते समय उसने नरो का नाम नही लिया था, इसलिए
वह नरो से ही मरेगा । स्पष्ट सुनो, हिरण्यकशिपु जब सारे संसार को दुख देता था, तब
नारायण ने स्वय नरसिंह का रूप धारण कर उसे चीर डाला था । उसी ने अब विश्रवसु
के यहाँ जन्म लिया है । इसलिए नारायण ही अब इसका नाश करेंगे । अब हमें उस विष्णु
से अभयदान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।"
ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर सभी लोग तुरन्त क्षीर समुद्र के निकट गये और
अच्युत को देखकर पवित्र हृदय से उनकी स्तुति की । हाथ जोडकर बड़ी भक्ति से प्रणाम
किया और विष्णु से इस प्रकार विनती की ।
१०. देवताओं का विष्णु की स्तुति करना
हे त्रिलोकीनाथ, कमलालय-वक्ष, वसुमत्तिरक्षक, वनजाक्ष, आपके अतिरिक्त हमारा
कोई (सहायक) नही, यह सत्य हे । हे गोविन्द, परिपूर्णगुण चिदानन्द, हे देव, जगन्मय,
देवाधिदेव, देवो के रक्षक, दिव्यावतार, अमृतसागर में पहले आपकी शरण में आये हुए हमें
(आपने) अपना अभयदान दिया था । हे दानवदलन, आपके भुजवल-विक्रम से ही समस्त
लोको की रक्षा होती है । हे भक्तवत्सल, भक्तियोग को छोड़ अन्य उपायो से आपको
पहचानना असंभव है । हे मधुसूदन, मन में आपका ध्यान करनेवालो को क्या कभी कोई
विपदा सता सकती है ? जगत् की सृष्टि, स्थिति, लय आदि आपकी लीलामात्र है ।
समस्त लोक आपकी माया का आधार लेकर ही आपका महनीय तनु धारण करते है ।
हे शेषशायी, आपका वैभव तथा आपकी महिमा अवाङ्मानसगोचर है । हे शरणागत
रक्षक, हे लोकेश, हम आपकी शरण में आये है । हम शरणार्थियो की रक्षा आपको करनी
ही चाहिए । आप त्रिलोक-कटक रावण का वध करके हमारी रक्षा कीजिए । हे लोकैक-
स्तुत्य, बिना विलंब हमारा कार्य सपन्न कीजिए और यश पाइए । निर्मलचित्त, निश्चलव्रती,
धर्मात्मा, उत्तमगुण-समन्वित, राजा दशरथ अश्वमेध यज्ञ पूरा करके पवित्र मन से युक्त
हुए है । उस काकुत्स्थ-वंशी (राजा दशरथ) की स्त्रियो का विचार करें, तो कोई भी स्त्री
उनकी बराबरी नही कर सकती । हे कमलगर्भ, आप अपने चारो अंशो के साथ नर के
रूप में जन्म लीजिए । वर के प्रताप से जो देवताओ के लिए अवध्य है, जो लोकत्रासक है
जिस पापी ने गंधर्व एव किन्नरो का वध किया है, हे पुण्डरीक, ऐसे दशकंधर का वध
करके यज्ञ-संपादन कराइए और संयम-धनी पुरुषो की तथा संसार की रक्षा कीजिए ।"