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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 508 में से

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पृष्ठ 48

१८ रंगनाथ रामायण
पुत्र सुन्दर तथा श्रेष्ठ गुणो से युक्त है, इसलिए उनके लिए लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न नाम
उचित होगे । (राजा ने) उन लक्ष्मी-समन्वित (राजकुमारो को) राम, भरत, लक्ष्मण तथा
शत्रुघ्न जैसे सुन्दर नाम देकर नामकरण-सस्कार सम्पन्न किया और अपरिमित धन
दान में दिया ।
१४. श्रीरामादि का वचपन
वे (वालक) माताओ तथा धाइयो के स्नेह तथा ममता-युक्त पालन-पोषण में
(फलस्वरूप) बढने लगे । (वे) भोली-भाली हँसी के साथ आँखें खोलने लगे । धीरे-धीरे
अटपटाकर चलते हुए अपनी तोतली बोली से सबको आनन्द पहुँचाने लगे । उनकी लटो में
(पिरोई गई) मोती तथा मणियों की लड़ियाँ कपोलो तक फैली थी । उनके भाल (रूपी)
इन्दु पर अशोक के पत्ते के समान एक माँगटीका डोल रहा था । मणिखचित बहुत सुन्दर
बघनखा की श्रेष्ठ कान्ति उनके हृदय पर विराज रही थी । शरीर पर जहाँ-तहाँ मरकत
मणियो के आभरण शोभा दे रहे थे, कटि को करधनी से घूँघरू के शब्द हो रहे थे तथा
घुँघरूदार नूपुर पैरो में ध्वनि कर रहे थे । वे राजा के सामने हँसते हुए अपनी वालक्रीडाएँ
करते और उन्हें अपनी मोहनाकृति से मुग्ध कर देते थे । वे चारो (कुमार) धीरे-धीरे
वढने लगे और समान रूप से उनका मानसिक विकास होने लगा ।
वे दशरथात्मज आपस में जोड़ियाँ बना लेते । रमणीय आकृतिवाले राम और लक्ष्मण
की एक जोडी बनती और भरत-शत्रुघ्न की दूसरी जोड़ी बनती । उनके चूड़ाकरण
तथा यज्ञोपवीत-सस्कार कराये गये और वे सुन्दर (राजकुमार) तरह-तरह के खेलो में
मग्न रहने लगे ।
एक वार रघुराम अपने मित्रो के साथ वडे प्रेम से (अपने-अपने) गुइयाँ चुनकर,
गेंद तथा डडा लिये फुर्ती से खेल रहे थे । उसी समय कैकेयी की दासी मथरा वेग से
वहाँ आई और कौतुक से गेंद को रोक लिया । इस पर राम ने वडे क्रोध से डडे से
उसपर प्रहार किया, जिससे तुरन्त उसकी टाँग टूट गई । (इसके पश्चात् भी) श्रीराम
को अधिक उत्साह से खेलते हुए देखकर उनपर क्रुद्ध हो, लँगडी टाँग से वह कैकेयी के
महल में गई और सारा वृत्तान्त कह सुनाया । कैकेयी ने तुरन्त यह समाचार दशरथ को
सुनाया । सारी बातें जानकर राजा ने वसिष्ठजी को अयोध्या में बुलवाकर उन्हें भक्ति से
प्रणाम किया और कहा—'हे श्रेष्ठ मुनिचन्द्र, आप इन बालको को वेदादि समस्त विद्याएँ
सिखायें ।' यह कहकर राजा ने वालको को वसिष्ठ को सौंप दिया । उस मुनीश्वर ने भी
वैसा ही किया । राजकुमारो ने उस सयमी मुनि की कृपा से हाथी-घोडे की सवारी, रथ-
सचालन आदि की क्रियाएँ सीख लीं । समस्त वेदो, शास्त्रो और शस्त्रास्त्रो के प्रयोग भी
सीख लिये । उनमें श्रीराम तो विष्णुदेव ही थे । इसलिए अपार शौर्य, विवेक तथा सद्-
गुणो में सबसे श्रेष्ठ थे ।
१५. विश्वामित्र का आगमन
(राजा) अपने पुत्रो के विवाह की बात सोच रहे थे कि (एक दिन) विश्वामित्र
मुनि आ पहुँचे । द्वारपाल ने आकर महाराज दशरथ से निवेदन किया—'देव, विश्वामित्र