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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 508 में से

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पृष्ठ 49

मुनि द्वार पर आये है।' तब दशरथ अपने बधु-वर्ग तथा वसिष्ठ मुनि के साथ बडी
प्रसन्नता से, परमेष्ठी की अगवानी के लिए जानेवाले इन्द्र की तरह, उनका स्वागत करने गये ।
उनकी अमित शक्ति को जानते हुए उनको लिवा लाये और अर्घ्य, पाद्यादि देकर
उनकी उचित रीति से पूजा की । तब मुनि ने पूछा—'(हे राजन्) तुम्हारी प्रजा कुशल
से तो है, हे पूजनीय व्रती वसिष्ठ, आप कुशल से हैं न ? हे मुनियो, आप कुशल से
हैं ?' (तब राजा ने कहा)—'हमें किसी बात का अभाव नही है । हम धन्य हैं । हे
परम मुनींद्र, आप हमारा गृह पवित्र करने की इच्छा से यहाँ पधारे । इस कृपा से मैं
समस्त लोको में प्रख्यात हुआ और सभी राजाओ में आदरणीय हुआ । आप अपने आगमन
का कारण कहें । आपका जो भी कार्य होगा, मैं उसे सम्पन्न करूँगा ।
१६. यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भेजने के लिए राजा से विश्वामित्र की प्रार्थना
तब विश्वामित्र ने राजा को देखकर कहा—'हे राजन्, दसरात्रि-पर्यंत यज्ञ करने
की इच्छा से मैं ( यज्ञ ) करने लगा, तो भयंकर आकारवाले राक्षस हमारी यज्ञशाला में
लगातार रक्त-मास की वर्षा करते हुए प्रबल विघ्न डालने लगे । यज्ञ करते समय हमें
क्रोध नही करना चाहिए, इसलिए तुम्हारे पुत्र महाबली श्रीराम को यज्ञ-रक्षणार्थ ले जाने के
लिए आया हूँ । वे क्रूर राक्षस उनके सिवा अन्य किसी से नही मारे जायेंगे । उनकी
(राम की) महत्ता में जानता हूँ, (और) ब्रह्मा के पुत्र ये वसिष्ठ भी जानते हैं । हे
अनघ ! 'राम बालक हैं' ऐसा विचार मत करो । 'वे मेरे पुत्र हैं', ऐमा लोभ छोड दो ।
वे स्वयं यज्ञ-कर्त्ता, यज्ञ-मूर्त्ति तथा यज्ञ-भोक्ता हैं । उन्हें लोकाराध्य मानकर भेजो । में
उन्हें अतुल्य शस्त्रास्त्र दूँगा । उनसे ही हमारे यज्ञ की रक्षा होगी ।"
मुनि के ऐसा कहते ही राजा मूर्च्छित हो गये । बडी देर के बाद उनकी मूर्च्छा दूर
हुई । वे फीके पड गये और दीन तथा दुखी होकर गद्गद-कंठ से विश्वामित्र की विनती
करते हुए बोले—"राम अभी बालक हैं, वह बच्चा है । वह युद्ध-कला नही जानता । वह
पन्द्रह साल का ही है । हिलती हुई शिखावाला है (अभी उसमें दृढता नही आई है ) ।
अपने तथा शत्रुओ के बल का विचार करने की क्षमता उसमें नही है । हाय ! आप दया-
मय होते हुए ऐसे बच्चे को क्यो माँगते हैं ? राक्षस तो कई दिव्य शस्त्रास्त्र रखनेवाले हैं ।
वे युद्ध-कला में निपुण होते हैं । वे विपुल बाहुबलवाले हैं । उनके साथ लडने की
योग्यता राम में कहाँ है ? कहाँ वे और कहाँ यह ? हे श्रेष्ठ मुनीश्वर, साठ हजार साल
तक पृथ्वी का शासन करने पश्चात् असमय वृद्धावस्था में मैने इसे प्राप्त किया है । मैं
इसे भेज नही सकता। यज्ञ रक्षा की चिन्ता आपको क्यो है ? आप जाइए, मैं आज ही सेना के साथ
आपके पीछे-पीछे चला आऊँगा । हे मुनिनाथ, आपके यज्ञ में बाधा डालनेवाले राक्षसो की
शक्ति कितनी है ? वे कौन है ? उनके नाम क्या हैं ? यह राघव उन्हें कैसे जीत सकेगा ?"
तब विश्वामित्र ने राजा से कहा—"पुलस्त्य ब्रह्मा का पोता, विश्रवसु का पुत्र,
अखिल लोक का कंटक, पापी रावण के आदेश से बल प्राप्त करके घमण्ड से भरे
मारीच तथा सुबाहु नामक (राक्षस) उग्र रूप धारण कर यज्ञ में विघ्न डालते हैं । राम
के सिवा अन्य कोई भी रणभूमि में उनका सामना नही कर सकेगा ।"