रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० रंगनाथ रामायण
ऐसा मुनि के कहने पर, उन बातो पर विश्वास न करके राजा ने मुनिनाथ से
विना संकोच कहा—"वह (रावण) चौथा ब्रह्मा है, महान् साहसी है और ब्रह्मा से वर
प्राप्त किये हुए हैं । ऐसे रावण के भेजे हुए वीरो को जीतने में यह (राम) कैसे समर्थ
होगा ? उन (राक्षसो) की शक्ति जाने विना मै आने की वात कही थी । अब आप लौट
जाइए ।"
यो राजा के कहते ही विश्वामित्र (क्रोध से) जलते हुए, रोष-रक्त नेत्रो से देखने लगे ।
उनके गण्डस्थल अत्यधिक वेग से हिलने लगे, सारा शरीर काँपने लगा । वे राजा
को देखकर बोले—"काकुत्स्थ-वशजो की रीति पर विचार किये विना ही ऐसे कुवचन क्यो
कह रहे हो ? (तुमने) मेरे आगमन का कारण वताने के लिए कहा । यह कहा कि मै
आपका कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा । अब तुम मुकर रहे हो । यज्ञ-रक्षा क लिए मैने राम
को भेजने की प्रार्थना की । पर तुम हिम्मत हारकर कहत हो 'नही भेजूंगा ।' हे असत्य-
भाषी, तुम्हारा तो मुँह देखना भी नही चाहिए । इसलिग मै जा रहा हूँ ।"
मुनि के इस प्रकार कहने ही समुद्र सूख गये, पृथ्वी धँस गई, समस्त लोक व्याकुल
हो उठे । दिग्गजो ने घुटने टेक दिये, देवता सहम गये, दिशाएँ सिमट गई । सभी भूत
अवाग हो गये । मुनि के क्रोधावेग की कल्पना करके वसिष्ठ ने दशरथ को देखकर यो कहा-
१७. राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए वसिष्ठ की सम्मति
(वसिष्ठ ने कहा)—"हे राजन्, सूर्यवंशी इस ससार में कभी असत्य भाषण नही
करते । यदि तुम असत्य कहोगे, तो तुम्हारी श्रेष्ठ कीर्ति और तुम्हारे पूर्वजो की कीर्त्ति
नष्ट हो जायगी । देने का वचन कहकर नही दोगे, तो शुद्ध (मन से) किये हुए सभी धर्म
नष्ट हो जायेंगे । 'दशरथ महाराज बडे धर्मात्मा हैं'—ऐसे तुम इस पृथ्वी में विख्यात हो ।
लोकरक्षा के सिवा राजाओ का धर्म और क्या है ? इसलिए, हे राजन्, राम को
माननीय गाधि-पुत्र के साथ जाने दो । ऐसी शका क्यो करते हो कि मेरा पुत्र वालक है,
वह युद्ध में महाबली राक्षसो की वरावरी नही कर सकेगा । कौशिक के रहते किस बात का
भय है ? राजन्, विश्वामित्र का उग्र तप और उनकी शक्ति विचित्र हैं । ये पुण्यात्मा देव,
दानव, गधर्व तथा दैत्यो से भी अधिक दिव्यास्त्रो के प्रयोगो को जानते हैं । कोई भी ऐसा
विषय कही भी नही है, जिसे ये नही जानते हो । हे जननायक, दक्ष (प्रजापति) के जया
तथा सुप्रभा नामक दो पुत्रियाँ थी । उन जया और सुप्रभा के द्वारा भृशाश्व ने राक्षस-वध
के लिए अस्त्र के रूप में पचास पुत्र प्राप्त किये । वे सब (पुत्र) कामरूपी हैं । हे राजन्,
उस भृशाश्व ने (उन सभी अस्त्रशस्त्रो को) इन्हें दे दिया । इसलिए ये मुनि सभी शस्त्रास्त्रो
के ज्ञाता हैं । तुम डरो मत । इन मुनि की शक्ति तुम नही जानते । इनको वचन
देकर क्यो टाल रहे हो ? इनके साथ जाने से राम का हित ही होगा, उनकी जय अवश्य होगी ।
क्या ये (स्वय) राक्षसो को जीत नही सकते थे ? राजन् (तुम्हारे) हित-चिन्तक
के रूप में, तुम्हारे पुत्र उज्ज्वल चरित्रवान् (राम) को शस्त्रास्त्र विद्या में निपुण सिद्ध करने
के उद्देश्य से ही ये यहाँ पधारे हैं । अत यज्ञ की रक्षा के लिए राम को भेजो । इन्हें
(राम को) देने में ही (तुम्हारा) कल्याण होगा ।