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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 508 में से

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पृष्ठ 43

सुनाया । उन्होंने नाना प्रकार से नगर को सजाया और जहाँ-तहाँ दुंदुभि, शंख, आदि का
तुमुल नाद करने लगे । उसी समय राजा ने भी नगर में प्रवेश किया और मंगलवाद्यों के
बजते हुए, विघ्ननाशक (ऋष्यशृंग) को शांता देवी के साथ, बड़ी चतुरता से अयोध्या में लाये ।
राजा ने ऋष्यशृंग को लाकर अन्तःपुर में ठहराया । अर्घ्य-पाद्यादि देकर विधिवत्
उनकी पूजा की और अपने को कृतार्थ मानकर प्रसन्न हुए । उसी समय कौसल्या आदि
रानियों ने राजा की आज्ञा लेकर बड़े हर्ष से शान्ता देवी को श्रेष्ठ भूषण, वस्त्र, माला
आदि देकर बहुविधि से उनका सत्कार किया ।
कुछ दिन के पश्चात् संसार के प्राणियों को आनंदित करने हुए वसन्त ऋतु आई ।
तब राजा बड़े उत्साह से ऋष्यशृंग के पास गये और बड़ी भक्ति से प्रणाम करके विनय
किया—‘हे संयमीप्रवर ! आप मुझसे यज्ञ कराके मेरा उद्धार कीजिए ।’ तब उन्होंने—
‘ऐसा ही हो,’ कहकर रविकुलोत्तम राजा दशरथ से आगे कहा—‘हे राजन्, यज्ञ के लिए
विधिवत् आवश्यक सामग्री शीघ्र मँगवाइए ।’ तब राजा ने योग्य व्यक्तियों को उन सब
वस्तुओं का संचय करने के लिए भेजा और सब सामग्री मँगवाई । (उन्होंने) सुमंत्र को
भेजकर कीर्तिमान् केकयराज, अप्रतिहत तेजस्वी काशिराज, जनक महाराज, अंगराज आदि
पुण्यचरित्र नरेशों को यज्ञ देखने के लिए सविनय आमंत्रित किया । (इसके पश्चात्)
उन्होंने सुमंत्र से कहा—‘तुम शीघ्र जाकर पुण्यवान् वेदवेदांग-पारंगत, गृहस्थ, निपुण एवं
महिमा-समन्वित ब्राह्मणों को तथा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, महात्मा वसिष्ठ तथा वामदेव
आदि (पुरोहितों) को लिवा लाओ ।’
सुमंत्र बड़ी प्रसन्नता से गया और बड़ी श्रद्धा से उन सबको लिवा लाया । (राजा ने)
उन्हें अर्घ्य, पाद्य आदि देकर (उनका स्वागत-सत्कार किया) । वे अपने निर्मल व्रत
की निष्ठा के अनुकूल धर्मसम्मत तथा उचित वचन यों बोले—“हे मुनिश्रेष्ठ, पुत्रहीन होने
से अत्यन्त दुःखी हूँ, पुत्र-प्राप्ति की इच्छा बलवती होने के कारण मित्रों के परामर्श से
अश्वमेध यज्ञ, तथा पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करने के लिए इन ऋष्यशृंगजी
को आमंत्रित किया है । (अब) आपके अनुग्रह का प्रार्थी हूँ ।”
राजा की बातों से प्रसन्न होकर वसिष्ठ आदि तपोधन मुनियों ने कहा—“हे रवि-
कुलोत्तम, लोकहितार्थ पुत्रों को प्राप्त करने की आपकी इच्छा सर्वथा संगत है । अब अश्व
को छोड़िए । इस अश्वमेध से आपके विश्वरक्षक एवं उज्ज्वल पराक्रमी चार पुत्र होंगे ।”
इससे बहुत सन्तुष्ट होकर राजा ने यज्ञ के लिए योग्य जवनाश्व (तेज जानेवाला
घोड़ा) को चुनकर, भुवनपावन मूर्ति की पूजा करके, उस घोड़े के ललाट पर अपना
नामांकित एक पट्ट बाँधकर, एक साल तक उसे अपनी इच्छा से घूमने के लिए
छोड़ दिया । उस अश्व की रक्षा के लिए पराक्रमी सेना तथा सामंत नरेश भी भेजे । उसके
बाद वसिष्ठ आदि मुनियों की अनुमति से अनुपम शिल्पकारों को बुलाकर सरयू नदी की
उत्तर दिशा में वेद-विधि के अनुसार एक यज्ञ-शाला का निर्माण करने के लिए भेजा
और सभी देश के राजाओं तथा उन देशों में निवास करनेवाले विप्र, क्षत्रिय, वैश्य तथा
शूद्रों को भी आमंत्रित किया ।