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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 508 में से

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पृष्ठ 52

(उसके) अंगों से प्लावित यह आश्रम-भूमि तब से अंगदेश कहलाने लगी१ । इस आश्रम
भूमि में कठिन तपस्या करनेवाले पुण्यात्मा कृतार्थ हो जाते हैं ।”
इस तरह विश्वामित्र ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया । रघुवीर तथा मुनि वहाँ ठहरकर
स्नानादि अनुष्ठान पूरा करके संतुष्ट हुए । उस स्थान के आश्रमवासी मुनीश्वरों ने दिव्य
दृष्टि से यह बात जान ली । वे रमणीय रूपवाले राम-लक्ष्मण तथा अमित तपोघनी
कौशिक को अपने आश्रम में लिवा ले गये और अत्यन्त उत्साह से अर्घ्य, पाद्यादि देकर
उनका सत्कार किया । पुण्य-कथाओं के कथन से वह रात्रि पुण्यरात्रि हो गई । दूसरे
दिन जब वे पुण्य संयमी उस नदी में नित्य कर्मों से निवृत्त हो चुके, तब विश्वामित्र ने
कहा—'हमें इस नदी का पार उतारने के लिए यह नाविक समर्थ है । यह नाव सूर्य-
वंशजों के लिए लायक है ।' यह सुनकर राम-लक्ष्मण ने उन मुनियों को प्रणाम किया ।
मुनियों ने उनको विदा किया । तब वे विश्वामित्र के साथ नाव पर चढ़कर सरयू नदी
पार करने लगे । जब नाव बीच धार में पहुँची, तब (रामने) आश्चर्य के साथ हाथ जोड़-
कर पूछा—'यह कैसी ध्वनि आकाश तक गूँज रही है । कृपा करके बताइए ।'
मुनि ने कहा—"कैलास पर्वत के मानसरोवर में जन्म लेकर, समृद्ध साकेतनगरी
को चारों ओर से घेरने के बाद गंगा नदी में मिलनेवाली सरयू नदी की लहरों का यह
घोष है । इस पर (राम-लक्ष्मण) ने बड़ी श्रद्धा से उसे प्रणाम किया । उन पुण्यात्माओं ने
नदी को पार किया और हाथी, सूअर, भैंसा, हिरण, शरभ, अजगर, बाघ, रीछ, सिंह से
भरे हुए जंगल में प्रवेश किया । तब राघव ने कहा—"हे मुनीश्वर, खदिर (कत्या),
तिन्दुक, पूग, खजूर, निम्ब, बदरी, वट, अशोक, पाटलि आदि तरुओं तथा बहुकंटक एवं
लता-परिवेष्टित वृक्षों से युक्त, यह निर्जन वन किसका आश्रम है ? कृपया बताइए ।”
तब विश्वामित्र श्रीराम से सारा वृत्तान्त यों कहने लगे—'प्राचीन काल में इन्द्र वृत्रासुर
का वध करने से मल-कलुष-प्राप्त तथा मलिनांग हुआ । तब देवता तथा मुनि इन्द्र को पाप-
मुक्त करने के लिए यहाँ ले आये और पुण्यसलिल तथा पवित्र मंत्रों से पुण्याभिसेचन
किया । इससे उसके शरीर पर लगे मल-कलुष दोनों यहाँ के प्रदेशों में झर गये और
इन्द्र शुद्ध हो गया । इसलिए इन्द्र ने इन प्रदेशों को, मल युक्त होने से 'मलद' तथा क्लेश-
कलित होने से 'करूप' तथा 'पापघ्न' नाम दिये । वृत्रासुर के वध से लगे हुए पाप की
मुक्ति इस प्रदेश में होने से इन्द्र ने इन नगरों को धन-धान्य-वैभव से समृद्ध रहने का वर
दिया । हे रघुराम, एक बात और सुनो ।
२०. विश्वामित्र का श्रीरामचन्द्र को ताड़का का वृत्तान्त सुनाना
“इस पृथ्वी पर ताड़का नाम की एक राक्षसी, एक हजार हाथियों का बल रखती हुई,
बड़े साहस के साथ, इन दोनों प्रदेशों में प्रवेश कर स्वेच्छा से लोगों को तंग करती हैं ।”
इसपर राघव ने पूछा—'उस स्त्री को किसने इतनी शक्ति दी ? यह दुष्टबुद्धि
किसकी लड़की है ? यह पापिन क्यों इन दो प्रदेशों को पीड़ा पहुँचा रही है ? कृपया बताइए ।'
१ वाल्मीकि और कालिदास ने भी अनंगाश्रम का वर्णन किया है, पर वह अंग-
देश में नहीं था । वह तो सरयू नदी के किनारे था । अंग-देश तो वर्त्तमान भागलपुर
और मुंगेर जिले माने गये हैं, जिसमें सरयू नदी नहीं है ।—सम्पादक