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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 508 में से

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पृष्ठ 47

बालकांड ९७
ओप्त वपु, दावाग्नि-तुल्य विक्रमी, आकार तथा शक्ति में पर्वत की समानता करनेवाले,
बड़े साहसी, कामरूपी, समुद्रो को भी पार करनेवाले, पहाड़ो को भी उखाड़ फेंकनेवाले,
नख और दाँतो में अमित शक्ति रखनेवाले, अलौकिक शक्तिवाली तथा पृथ्वी को भी चीर
डालनेवाली क्षमता रखनेवाले थे । ऐसे होने पर भी, आश्चर्य ! उनमें कुछ लोग सुग्रीव
की, कुछ हनुमान् की, कुछ नील की, और कुछ मेदकुमुद की सेवा करते थे । वे सर्वत्र
सिद्ध होते हुए अपना शौर्य प्रकट करते हुए, मलय, दर्दुर, गंधमादन, तथा विंध्य पर्वत एव
काननो और बहुत-से जल-नद-नदी प्रान्तो में बड़े आनन्द के साथ विचरण करते थे ।
उस महिमायुक्त पायस के प्रभाव से राजा की कुलवधुओ ने गर्भ धारण किया ।
गर्भधारण के समय से (उनकी) क्षीण कटियाँ पुष्ट होने लगी । अमृतमय भोजन की रुचि
लगातार कम होने लगी । सुन्दर देह की कान्ति पाँडु रंग धारण करने लगी, मानो ये
सभी रावण की साम्राज्य-लक्ष्मी की नाक में कालिख लगानेवाले चिह्न हो । उनके कुचाग्र
(इस प्रकार) काले होने लगे, मानो अनपत्यता-दोष (शरीर से) बाहर निकल रहा हो ।
कपोल पतले हो गये । दोहद (मचली आदि) दीखने लगे । नाभियाँ उभरने लगी,
त्रिवलियो की रेखाएँ मिट गई और (अनेक प्रकार की चीजो को पाने की) इच्छाएँ उत्पन्न
होने लगी । धीरे-धीरे नौ महीने पूरे हुए ।
१३. श्रीराम आदि का जन्म
प्रशंसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, बुधवार, पुनर्वसु नक्षत्र
में मध्याह्न के समय ग्रह-पंचको के उच्च स्थिति में रहते समय, गुरु और चन्द्र का योग
रहते हुए, ललित कर्क लग्न में, सर्वलोकाधार, जगदेकवीर, इंद्रादि देवताओ से स्तुत्य, दिव्य
लक्षणो से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, आर्त्त-त्राण-परायण, भव्य, चिदानन्द, परम कल्याण-
मूर्त्ति, देवताओ के रक्षक, दीनात्तिर्हरण, गुणो से अलंकृत, महान् कीर्त्तिवान्, शेषशायी, श्रीपति,
हृषीकेश, उस कमल-गर्भ (विष्णु) के अद्धांश के रूप में, काकुत्स्थवणी श्रीराम कौसल्या
के गर्भ से उत्पन्न हुए । जिस प्रकार अदिति ने इन्द्र को और प्राच्य-मती ने चन्द्र को जन्म
दिया था, वैसे ही पुण्य-नक्षत्र युक्त मीन लग्न में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया । स्तुत्य
आश्लेषा नक्षत्र-युक्त कर्क लग्न में कमलदललोचनी सुमित्रा ने समान-चरित्रवाले लक्ष्मण
तथा शत्रुघ्न को जन्म दिया । देव-दुंदुभियो से सारा आकाश गूंजने लगा, देवस्त्रियाँ नृत्य
करने लगी, पुष्पो की अत्यधिक वृष्टि होने लगी, ब्रह्मादि देवता परितुष्ट हुए, अयोध्या में
छोटे-बड़े सभी निवासी उत्सव मनाने लगे ।
तब दशरथ ने पुण्यात्मा वसिष्ठ को बुलाकर (बालको का) जातकर्म आदि करवाया।
फिर, पुत्र-जन्मोत्सव ऐसा मनाया कि देवताओ तथा पुरजनो का नेत्रोत्सव हो गया । जात-
शौच समाप्त होने के पश्चात् एक पुण्य दिन को राजा ने उन वंशोद्धारक पुत्रो का नाम-
करण-संस्कार करने की प्रार्थना वसिष्ठ से की । उन्होने अपने मन में विचार करके कहा
कि 'रम्', अर्थात् 'क्रीडा' नामक धातु से 'रमयति' अर्थ देनेवाला 'राम' नाम से कौसल्या-
सुत अभिहित होगा । कैकेयी का पुत्र महान् बलशाली, सुकुमार शरीरवाला तथा सुकीर्त्ति-
वान् है, इसलिए वह भरत के नाम से विख्यात होगा । विचार करके देखने से सुमित्रा के
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