रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० रंगनाथ रामायण
सालों से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मैंने बड़ी कीर्त्ति पाई है। तुम्हारे जैसे स्नेही मंत्रियों
के रहते हुए मुझे किसी बात का अभाव नहीं है। पुत्र-हीन होने का एकमात्र दुःख ही
मुझे है। कुल का उद्धार करनेवाले पुत्रों के बिना कोई भी व्यक्ति पुण्य और स्वर्गलोक
की प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए मेरे भी पुत्र उत्पन्न होने चाहिए। समस्त संसार
मेरी प्रशंसा करे, एतदर्थ मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा और उसके बाद पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करूँगा।
इन यज्ञों के कारण मेरा हित होगा और मैं जरूर पुत्र प्राप्त करूँगा। राजा के यों कहने
पर वे सब बड़े संभ्रमचित्त होकर मन में हर्षित हुए। उन्हें प्रसन्न देखकर राजा मन में
विचारकर बोले—
मैं अनुपम रीति से, बड़े विनय के साथ अश्वमेध यज्ञ करूँगा, जिसकी प्रशंसा देवता
भी करेंगे और पुत्रों के लिए पुत्रकामेष्टि-यज्ञ नेत्र-पर्व रीति (दर्शकों की आँखों को तृप्ति
देनेवाली रीति) से करूँगा। ऐसा कहकर उन्होंने आवश्यक प्रबन्ध करने के लिए सब लोगों
को भेजा। उसी समय अनघ वसिष्ठ आदि मुनि वहाँ आये। (राजा ने) दण्डवत की और
बड़ी श्रद्धा से उन्हें लिवा लाये और उनसे बोले—हे महान् संयमी तथा पुण्यवान् वसिष्ठ !
यथाशीघ्र आप मुझसे श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ करवाइए, जिससे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो।'
इस पर (मुनि बोले)—'तुम्हारे द्वारा संपन्न होनेवाले अश्वमेध यज्ञ का निर्वाह हम करेंगे।
उस श्रेष्ठ यज्ञ की महिमा का वर्णन करना क्या सहज है ? इसके अतिरिक्त पुत्र-कामेष्टि
करने से तुम धन्यात्मा पुत्रों को प्राप्त करोगे।' यह सुनकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ।
उन्होंने सबको विदा किया और रनवास में पहुँचकर सभी रानियों को यह शुभ संवाद
सुनाया। तब से वे प्रसन्नचित्त रहने लगे। एक दिन अनघ सूत (सुमंत्र) राजा के पास
आकर एकान्त में यों कहने लगे—
६. ऋष्यशृंग का वृत्तांत
सुमंत्र ने कहा—“हे महाराज, इसके पहले आपको संतान-प्राप्ति कैसे होगी, इस
सम्बन्ध में मैंने एक कथा सुनी थी। आप उसे सुनें। अंगराज के पुत्र गुणवान् रोमपाद के
राज्य में न जाने उनके किस अपराध से वर्षा नहीं हुई। अपने राज्य में कहीं भी वर्षा
न होते देख राजा बहुत दुःखी हुए। उन्होंने श्रेष्ठ मुनियों से वर्षा के निमित्त बहुत हवन
करवाये, फिर भी वर्षा नहीं हुई। तब राजा को अत्यंत दुःख से पीड़ित देखकर मुनियों ने
कहा—“हे महीपाल ! हे राजचन्द्र ! इस पृथ्वी पर वर्षा होने के लिए हम शुद्ध मन से आपको
एक उपाय बतायेंगे। हे पर्वत के समान वीर ! परहितनिरत विभांडक के पुत्र पुण्यनिधि
ऋष्यशृंग जन्म से नगर-ग्राम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान न रखने के कारण स्त्रियों के नाम
तक से अनभिज्ञ हैं। वे तपस्वी की वृत्ति में जंगलों में रहते हैं। हे वसुधेश ! उनके यहाँ
आते ही अनावृष्टि-दोष तुरन्त दूर हो जायगा। इसपर राजा अपन मन में सोचने लगे कि
उन मुनिश्रेष्ठ को नगर में कैसे ले आ सकूँगा। उन्होंने बुद्धिमान् मंत्रियों तथा मुनियों को
बुलाकर बड़े प्रसन्न चित्त से पूछा। मुनियों तथा मंत्रियों ने भी बड़ी प्रसन्नता से उपाय
बताये, तो राजा मन ही मन बहुत हर्षित हुए। मुनियों ने कहा—“महाराज, अभी
आप कई (प्रकार के) मिष्टान्न तथा सुन्दर वस्तुएँ देकर वेश्याओं को वन में भेजिए।