रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ रंगनाथ रामायण
इतने में एक वर्ष पूरा हुआ और मधुमास आया। तब राजा ने चिर तपोनिधि
ऋष्यशृंग की अनुमति तथा गुरु की आज्ञा लेकर एक अच्छे मुहूर्त में बड़े उत्साह से शान्ता
तथा ऋष्यशृंग के साथ, यज्ञोपकरणों तथा हवन-कुंड से युक्त, इक्कीस सुन्दर यूपों से
शोभायमान, श्रौतधर्म-क्रियाचार-विहित, मायाप्रवीण, राक्षसों से रहित तथा समस्त पाप-
रहित यज्ञ-शाला में प्रवेश किया।
८. दशरथ का यज्ञ-दीक्षा लेना
यज्ञाश्व के आने ही, यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर, यतिबुद्धि प्राप्त करके, वसिष्ठ आदि
श्रेष्ठ मुनिजनों को ऋत्विकों के रूप में वरण कर, अपनी इच्छा से सवनत्रय को पूरा करके,
विमल यूपकाष्ठों में बँधे हुए जलचर, वनचर, विहग, उरग आदि तीन सौ पशुओं तथा
प्रख्यात यज्ञाश्व का वध करके श्रुतियों में जिन-जिन मंत्रों के साथ, जिन-जिन आहुतियों को
देने की विधि बताई गई है, उन मंत्रों के साथ ऋत्विकों ने उन आहुतियों का हवन
किया। अग्निदेव सप्त-जिह्वाओं से प्रज्वलित हुए। देवता उन आहुतियों से तृप्त हुए।
उस यज्ञ के दिनों में न कोई भूखा रहा, न कोई संतप्त रह गया। सभी मिष्टान्न, वस्त्र
स्वर्ण, मणिभूषण आदि से संतृप्त किये गये।
जब किसी भी विघ्न के बिना यज्ञ समाप्त हुआ, तब ज्योतिष्टोम, विश्वजित् आदि
महान् यज्ञ-क्रियाओं को सांग रूप से पूरा किया और यज्ञ-दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु (यज्ञ-
करानेवाले चार ऋत्विकों में से एक) को (अपने राज्य का) दक्षिण का भाग, होता को
पश्चिम का भाग तथा उद्गाता को उत्तर का भाग दिया। अयोध्या को छोड़ बाक़ी सभी
देशों को (दान में) दे दिया, जिससे ऋत्विक् प्रसन्न होकर कहने लगे—"कब हम आपके
दिये हुए राज्य का शासन करें और कब अपने अनुष्ठान का पालन करें। हम कहाँ और
देश का शासन कहाँ ? हे राजन्, आप हमें इस राज्य का मूल्य दे दें।" तब राजा ने
दस करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ, सोने की चौगुनी चाँदी और एक लाख गायें उन्हें दीं। ऋष्यशृंग
आदि ऋत्विक् उस धन को आपस में बाँटकर संतुष्ट हुए। उस विमल यज्ञ-कर्म में
प्रवृत्त परिचारकों को राजा ने एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं। माँगनेवालों को श्रेष्ठ आभूषण दिये।
जिसने जो कुछ माँगा, राजा ने प्रेम से उसे वह दे दिया। उन्होंने सभी ब्राह्मणों
को भक्ति से प्रणाम किया और क्रमशः उनके आशीर्वाद पाते हुए उन्हें दिव्य वस्त्राभरण
देकर अकलंक चित्त से यज्ञांत स्नान किया। (उधर) ऋष्यशृंग के द्वारा कराये गये पुत्र-
कामेष्टि यज्ञ में आकर क्रमशः अपने-अपने यज्ञ-भाग प्राप्त करनेवाले देवता रावण के सम्बन्ध
में अपने मन में विचार करने लगे।
९. रावण के अत्याचारों के बारे में ब्रह्मा से देवताओं की शिकायत
ब्रह्मा के पास पहुँचकर (देवताओं ने) उनको प्रणाम किया और यों विनती की—
"हे प्रभो ! आपके वर की शक्ति से दशकन्धर, पुण्यात्मा आचार्यों ब्रह्मर्षियों, देवताओं तथा
मुनियों को दुःख दे रहा है। हे कमलासन ! हमारा खयाल है कि आपके वर की प्रचण्ड
शक्ति के कारण ही हम उसको जीत नहीं सकते। वह देवताओं के साथ इन्द्र को भी
पकड़कर उनका अपमान करता है और उन्हें दुःख देता रहता है। (अपने) भुजबल के दर्प से