रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबालकाण्ड ६
४. कुश-लव का रामायण-गान
कोसल-देश में सरयू नदी के किनारे, पृथिवी के ऊरु-भाग के समान अयोध्या नगर
सुशोभित था। वह बारह योजन लंबा, पाँच योजन चौड़ा था और शिल्प-निपुण मय द्वारा
निर्मित था। वह शत्रु-राजाओ की आँखो में खटकनेवाला नगर सूर्यवंशी राजाओ की राज-
धानी था। वह रत्नमय गोपुर, मणिमय तोरण, मणिमय कुट्टिम (फर्श), गवाक्ष, क्रीडा-
गृह, कृत्रक शैल (बनावटी पर्वत), पटह-नाद (नगाडे की आवाज), विशालकाय हाथी,
उत्तम घोडे, नाना प्रकार के रथ-समूह, सेना, स्वच्छ सौध, बाजार, कमनीय उपवन, सरोवर,
तालाब, बावडी ऊख के खेत, धान के खेत, गहरी खाई तथा महलों से भरा हुआ संसार-
भर में विख्यात था। उस नगर में दशरथ नामक राजा राज्य करते थे, जो धनुर्विद्या में
निपुण, साम, दाम, भेद आदि चार उपायो के ज्ञाता, (भगवान् के ऐश्वर्य आदि) षड्गुणों के
आगार, (इच्छा, ज्ञान एव क्रिया) शक्तित्रय-संधानकर्त्ता, धर्मनिरत, कृताध्वर (जिसने
यज्ञ किया है), श्रीसपन्न, धर्मशास्त्र, पुराणादि के ज्ञाता, अजनंदन, बाल्यावस्था से, नियमानुकूल
प्रजा का पालन करते रहनेवाले परमपवित्र व्यक्ति, इन्द्र के निमित्त शंबरासुर का गर्व भंग
कर इंद्र से मंदार-पुष्पों को प्राप्त करनेवाले, इन्दुमती के पुत्र और सूर्यवंश में श्रेष्ठ राजा थे ।
वे तेज, कांति, त्याग, चातुर्य, उदारता, साहस, आदि सद्गुणो के भाडार थे ।
वे उदित होते हुए सूर्य की भाँति अपने उग्र तेज से सप्त द्वीपो को दीप्त करते हुए शासन
करते थे। उस नरनाथ के तीन सौ पचास रानियाँ थीं, जिनमें विशेष कर अचल शील-
वाली कौसल्या, कुचकुभ-निर्जित परिधानवाली कैकेयी, पुण्यशीला सुमित्रा त्रयी विद्याओ
के समान थीं। इस पृथिवी पर उनके हितैषी पुरोहित वसिष्ठ आदि पुण्य संयमी थे। पुण्यात्मा
धृष्टि, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, जयंत, नीतिवेत्ता अशोक, धीमान् मंत्री सुमंत्र आदि
उनके आठ सचिव थे। सभी सचिव परस्पर मित्र और स्वामिकार्य में विचक्षण और चतुर थे।
वे परम मर्मों के उद्घाटन में निपुण थे और विचार-पूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे।
समस्त कार्यों को सँभालनेवाले ऐसे आठ मंत्रियो से युक्त राजा दशरथ अष्टाक्षर और अष्ट-
भुजाओ से समन्वित नारायण की तरह सुशोभित थे। उनके राज्य में निर्बल, चुगलखोर,
रोगी, दरिद्र, व्यभिचारी, अनाचारी, पापी, क्रूर, नीच, जड, मूर्ख, मद, एक भी व्यक्ति नहीं था।
सारी प्रजा मणि-कुडल आदि से अलकृत, धर्मपरायण, कुलाचार-निरत, सकलशास्त्र-
पारंगत तथा विष्णु-भक्त थीं। इस प्रकार बडी कुशलता से राज्य का पालन करते और
राज्य-सुख भोगते हुए राजा दशरथ एक दिन अपने मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे।
५. पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने के लिए दशरथ का मंत्रियों से परामर्श
राजा दशरथ अपनी निस्संतान अवस्था का तथा अपनी ढलती आयु का विचार
करते हुए बहुत दुःखी हुए। उन्होंने अपने सभी श्रेष्ठ मंत्रियो को बुला भेजा और उन्हें
उचित आसन पर बैठने का आदेश देकर स्वयं भी आसन पर बैठ गये। और, उनसे इस
प्रकार कहने लगे- "मैंने बहुत दान दिये, अनेक धर्म-कार्य किये, कई यज्ञ किये और बहुत