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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 508 में से

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पृष्ठ 42

१२ रंगनाथ रामायण
करते जाते थे । उन युवतियो की ओर देखकर बार-बार मिठाई माँगते, परवश-से होकर
हाथ फैलाते और कहते—'हे मुनिवर, मैं ने अब तक ऐसे फल कभी नहीं देखे । आपका
ही तप श्रेष्ठ तप है ।'
यह सुनकर उन युवतियो ने मुस्कुराते हुए अपनी तनुलताओ को उनके शरीर से
छुलाकर, अपने सौरभमय उच्छ्वासो से उनके धैर्य को डिगाने हुए हौले-हौले अपने
मुख-कमलो को उनके मुख से सटाया और मीठे वचन, हाव भाव, मधुर संगीत तथा मादक
दृष्टियो से उन्हें मोहित कर उनके हृदय को रसार्द्र करते हुए, अपने कुचो से कसकर
आलिंगन पाश में उन्हें परवश बनाया और फिर कहने लगी—'हे अनघ, अब हमें आज्ञा
दें कि अपने आश्रम को वापस जायँ ।' यो कहते हुए विभाडक के आगमन के भय से
पीडितं वे वहाँ मे रवाना हो गईं और उस वन के निकट ही रहने लगी । उन कमल-
लोचन रमणियो के जाने के पश्चात्, ऋष्यश्रृंग ने यह सोचते हुए कि न जाने वे फिर कब
लौट आयेंगी, सारी रात जागकर ही व्यतीत कर दी और दूसरे दिन वे उस जगह पर जा
पहुँचे, जहाँ पहले दिन उन्होने उन रमणियो को देखा था ।
७. वेश्याओं के साथ ऋष्यशृंग का रोमपाद के घर आना
पायलो का झकार करती हुई, राजहंसो की गति से वे युवतियाँ मुनि के पास आईं
और प्रफुल्ल वदन हो चारो ओर से उन्हें घेरकर कहने लगी—'हे मुनिवर, आप हमारे
वन में पधारें ।' जब उन्होने स्वीकार कर लिया, तब वे उस श्रेष्ठ मुनि के चित्त कोद्रवित
करनेवाली बातें करते हुए, अपने उपायो तथा हाव-भावो से उनको मोह-मुग्ध कर लिया
और उन्हें अग-देश में इस प्रकार ले आई, जैसे शिकारी पक्षी किसी नये शिकार को पकड-
कर ले जाते समय विस्तृत पथ के भय से उसे बचाने के लिए अपने हस्तपल्लव-रूपी
पालकी में (चंगुल में) ले जाता है । उस ऋष्यशृंग के आने ही अग-राज्य में घोर वर्षा
होने लगी और सस्य बढने लगे । राजा सकल सौभाग्य से युक्त हो सतुष्ट हुए । उन्होने
बडी भक्ति मे उस मुनि की पूजा की और अपनी पुत्री शान्ता का विवाह उनके साथ
कर दिया । वे मुनि उसी राजा के यहाँ रहते हैं । यदि दशरथ उस मुनि को अपने यहाँ
ले आकर उनसे पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करायें, तो वे (दशरथ) चार बहुश्रुत तथा महान् पुत्र
तथा समृद्धि प्राप्त करेंगे । इस प्रकार मुझमे पहले सनत्कुमार ने कहा था । इसलिए आप
उस ऋष्यशृंग मे भक्तियुक्त प्रार्थना कर उन्हें यहाँ ले आयें ।"
इस प्रकार कहकर सूत चले गये । उनके जाने के वाट मन में हर्ष तथा भक्ति
का अनुभव करते हुए चतुर दशरथ उस राजा रोमपाद के यहाँ गये और मुनिश्रेष्ठ ऋष्यशृंग
को प्रणाम करके कहा—'हे पवित्र आत्मा मुनिराज, आप मेरी विनती सुनें । मैं अपने, मन
में पुत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर आपके यहाँ आया हूँ । आप मुझे अपनाइए ।' राजा ने
उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस प्रकार उनकी स्तुति की और उनसे यज्ञ का ऋत्विक्
बनने की प्रार्थना की । फिर अनुपम पालकी में उन्हें बिठाकर अयोध्या के लिए
रवाना हुए । उन्होने दूतो के द्वारा अपने नगरनिवासियो को यह आदेश भेज दिया कि नगर
इन्द्रपुरी के समान सुन्दर सजाकर रखा जाय । दूतो ने नगरनिवासियो को यह आदेश