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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 508 में से

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पृष्ठ 41

बालकांड ११
वे प्रौढ कामिनियाँ सीधे वहाँ जाकर, अच्छी तरह उस मुनि के दर्शन करेंगी, उनकी महिमा
देखेंगी, उन्हें मिष्टान्न देंगी और बडे प्रेम से उनके मन को विचलित करेंगी । वे कामिनियाँ
अपनी विलास-चेष्टाओ से उनके मन को रसार्द्र बना देंगी और अपने मोहक रूप की माया
का प्रभाव डालकर यहाँ वापस आयेंगी । तब वे भी उनके पीछे-पीछे यहाँ आयेंगे ।
यो कहकर सभी मुनि चले गये । उस दिन रात्रि को राजा बहुत प्रसन्नचित्त रहे ।
सवेरे उठते ही राजा ने मुनियो का स्मरण करते हुए बडी अनुरक्ति के साथ अनुपम यौवन-
रूप-सपन्न, कामदेव के मोहन मत्र के सदृश सुन्दर तथा चतुर वेश्याओ को वन में भेजा ।
वे युवतियाँ उस मुनि के वन में गईं और उनके आश्रम के पास जा पहुँचीं । उन्होने अपनी
नाट्य-कला तथा सगीत-कला का परिचय मुनि को दिया । वे पुण्यनिधि यह न जान सके
कि वे स्त्रियाँ है, और मगीत आदि का रसास्वादन न कर सकने के कारण सोचने लगे कि
ये इस वन में रहनेवाली मदगामिनी कोई अनोखी मृगी है । एक दिन वे रमणियाँ उनके
पास पहुँच गईं । उन्होने कामिनियो को अच्छी तरह देखा, उनके कुचो का नाम पूछा, कुचो
पर डोलनेवाले हारो का उद्देश्य पूछा और कहने लगे—“मेरे सिर पर तो एक ही शृग है,
लेकिन आपके उर पर दो शृग निकल आये हैं । आपके ये वल्कल वस्त्र बडे ही कोमल हैं ।
ये अनुपम दल्कल किस पेड से प्राप्त होते है ? आपके जटाजूट मेरी जटाओ के
समान नही है, वे चमक रहे है । आपके शरीर पर मली हुई राख सुगध दे रही है ।
आपके ये वेद-नाद श्रुतिमधुर है । मैने इस वन में ऐसा दृश्य अबतक नही देखा है,
न सुना है । कही मुनियो की भी ऐसी वेष-भूषा होती है ? आप कहाँ के मुनि है ?”
उस महान् व्यक्ति को अपने जाल में फँसते देख उन स्त्रियो ने हँसते हुए कहा—
“हे मुनि, कर्ण-मधुर साम-गान करते हुए, उसके अनुसार शुद्ध रीति से पदन्यास करके
दिखाना हम जानती है । इस पृथ्वी पर हमारा कौशल जानना आपके लिए कहाँ सभव है ?”
इस तरह अपनी वचन-चातुरी से उस मुनिनाथ को भुलावा देकर उन सुदरियो ने
पूछा:-‘आप कौन है ? किनके पुत्र है ? क्यो इस वन में रहते है, बताइए ।' तब उन्होने
कहा—“मै शुद्ध कीर्त्तिमान्, पुण्यात्मा विभाडक का पुत्र हूँ । मेरा नाम ऋष्यशृग है । तप
में महान् निष्ठा रखते हुए तपस्या करने के लिए ही मै यहाँ रहता हूँ । मेरे पिताजी
भागीरथी में स्नान करने की इच्छा से योगिपुगवो के साथ गये हुए है । वे अन्य देशो में
न जाकर बडी तपस्याएँ करने हुए अमल तथा भक्तियुक्त चित्त से यही पर रहते हैं ।
आप लोगो के यहाँ आने से मै पापरहित हुआ, कृतार्थ हुआ । अपने पिताजी की कृपा से
बहुन अधिक तपश्चर्या में लीन मैं भी यही रहता हूँ । इन वनो में आप जैसे नागर लोगो
को, देखकर मुझे आश्चर्य हुआ । क्या अब हम सब आश्रम में चलें ? ”
यो कहकर उन मुनियो को (उन वार-वनिताओ को) अपने आश्रम में ले जाकर
ऋष्यशृग ने उनका आदर-सत्कार किया । उन युवतियो ने प्रसन्नता मे उन मुनि का आतिथ्य
ग्रहण करने के बाद कहा—‘हे मुनिवर, यह लीजिए, हम अपने वन मे श्रेष्ठ फल लाये हैं ।'
यो कहकर उन्होने स्वादिष्ट एव मनोहर लड्डू, पूडी और तरह-तरह के स्वादिष्ट
मिष्टान्न उन्हें दिये । मुनि उन्हें खाते जाते थे और बीच-बीच में उनके स्वाद की प्रशसा