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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

२६४ रंगनाथ रामायण
क्रूर राक्षसो के देखते-देखते राम के पास पहुँच गया और राघव को प्रणाम किया । युद्ध
की धूलि तथा रक्त से पंकिल गात्रवाले सुग्रीव को राम ने बड़े प्रेम के साथ हृदय से लगाया
और स्निग्ध दृष्टियो से देखते हुए कहा—'इन्द्र को परास्त करनेवाले रावण की
शक्ति की अवहेलना करके, ऐसा साहस करना केवल तुम्हें ही शोभा देता है । उसकी वध
करके विभीषण को लका का राजा बनाने की जो प्रतिज्ञा मैंने की है, उसकी रक्षा करने के लिए तुम उसका
वध किये बिना ही लौट आये, यह तुमने बहुत अच्छा किया । मैं तुम पर प्रसन्न हूँ ।
तुम वालि के अनुज हो, तुम उस रावण को अवश्य मार सकते थे, किन्तु उसके वध का
सेहरा, मेरे सिर पर बाँधने, तथा उसे मारने का श्रेय मुझे देने के लिए तुम उसे जीवित
छोड़कर लौट आये ।' तब सुग्रीव ने कहा-- हे देव, उस द्रोही का वैभव देखकर मैं कैसे
चुप रह सकता था ?' सूर्य-पुत्र के इन वचनो को सुनकर राम हर्षित होकर बोले—
'तारको से विलसित तथा दीप्तिमान् रक्त तथा कृष्ण वर्ण के परिवेषण से घिरे हुए
सूर्यमंडल से ज्वालाएँ निकल रही है, बड़े-बड़े जलद राक्षसो का रूप धारण करके रक्त-
वर्षा कर रहे हैं, ऐसा लगता है कि कदाचित् भूकप होनेवाला है । प्रचण्ड वायु के कारण
शैल-शृंग टूटकर गिर रहे हैं और सूर्य के अभिमुख होकर सियार रो रहे हैं । वार-वार
राक्षस-कुल के नाश-सूचक शकुन दिखाई दे रहे हैं । इधर हमारे पक्ष में अगो के फड़कने आदि
के श्रेष्ठ शुभसूचक शकुन दीख रहे हैं । अत, निस्सन्देह हमारी विजय होगी । अब विलब
करना अनुचित है ।'
इसके पश्चात् रामचन्द्र हनुमान् के कंधे पर बैठकर, जाववान्, अगद, सौमित्र, विभीषण
नल आदि महान् पराक्रमी अनुचरो के साथ उस पर्वत से नीचे उतरे । फिर, अनुपम
पराक्रमी रामचंद्र धनुष धारण करके लका की ओर चले । वानर-श्रेष्ठ, उनको मार्ग वताने
हुए आगे-आगे जा रहे थे और पीछे लक्ष्मण आदि चल रहे थे । वानर-सेना उद्धंड वेग
से उनके पीछे-पीछे एक साथ मिलकर जा रही थी । इस प्रकार, सूर्यवंश-तिलक राघव
घोर राक्षस-समूह से सुरक्षित लका के उत्तर द्वार पर जा पहुँचे । यह समाचार सुनते ही
राक्षस संभ्रमित-से हो गये । अविरल बाहुबली नील, द्विविद, मैन्द आदि वीर वानरो के
साथ, विशाल वानर-सेना को लिये हुए पूर्व के द्वार पर जाकर ठहर गया । गज,
गवाक्ष, गवय तथा बाहुबली के साथ वालिपुत्र ने वड़े उत्साह से दक्षिण के द्वार पर पडाव
डाला । अपना विक्रम प्रदर्शित करते हुए, लका-दहन करनेवाले पवन-पुत्र ने सुषेण को
साथ लेकर पश्चिम के द्वार पर घेरा डाला । सूर्य-पुत्र सुग्रीव छत्तीस करोड़ विश्वास-पात्र
तथा महाबलशाली कपि-वीरो के साथ राम के पश्चिम में ठहर गया । शक्तिशाली
भालुओ के साथ अनुपम वली जाववान् ने राम के पूर्व में पड़ाव डाला ।
तदनंतर राम ने लक्ष्मण तथा विभीषण को देखकर कहा—'इनकी (वानर-नायको
की) सहायता के लिए प्रत्येक द्वार पर एक-एक पद्म दुर्वार बलशाली वानर-वीरो की सेना
भेज दो । अनल, नल, हर तथा सपाति के साथ हम तीनो यहीं से शत्रु-राक्षसो से युद्ध
करेंगे । घोर संग्राम के समय में भी हमें यहाँ का और वहाँ का समाचार मिलते रहना
चाहिए । इसके पश्चात् राम ने वानरो को देखकर आज्ञा दी कि तुममें से किसी को

अपना वानर-रूप छोडकर और कोई भी कपट-रूप धारण नही करना चाहिए । राम की
आज्ञा सिर पर धारण किये हुए सभी वानर लका के चारो ओर बडे वेग से फैल गये ।
पूर्व तथा पश्चिम भागो में विकृत लागूलवाले, विकृत आननवाले, विकृत दाँतोवाले और
विकृत शरीरवाले अनुपम विक्रमी वानर दस योजन तक व्याप्त हो गये और वृक्षो तथा
शैलो की सहायता से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो गये । उनके गर्जन, तर्जन, तथा उनके
हुकार सारी लका में व्याप्त हो ऐसे भय का उत्पादन करने लगे कि दनुज-स्त्रियो के
गर्भ-पात होने लगे । वानर-सेना का यह कोलाहल सुनकर राक्षस-समूह भय से कॉप उठा।
३९ अंगद का दौत्य
अपने मन्त्रियो की सम्मति प्राप्त करने के पश्चात् राम ने अगद को बुलाकर बडे
स्नेह के साथ कहा—'हे अगद तुम हमारा दूत बनकर रावण के पास जाओ और उससे
कहो कि हे रावण, तुमने ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के गर्व के कारण मुनियो तथा देवताओ
को दुख दिया है । राम के समक्ष तुम्हारा कोई वश नही चलेगा । रामचन्द्र तुम पर
आक्रमण करने आये है । जिस शक्ति के मद में आकर तुम सीता को उठा लाये, अब युद्ध
में उस शक्ति का प्रदर्शन करो । राम के बाणो के प्रहार से विचलित हुए बिना, शूर के समान
उनका सामना करो । यदि ऐसा करने में तुम्हें भय हो, तो सीता को लाकर सौंप दो और
सुख से रहो । यही तुम्हारे लिए उचित है । राघव ने कृपा करके विभीषण को लका का
राजा बना दिया । वे अवश्य तुम्हारा संहार करेंगे । उनके संहार करने के पहले ही, अपने
सभी सगे-सबन्धियो को एक बार भली भाँति देख लो, लका की ओर निहारो, अपनी प्रिय
पत्नियो का विचार करो । अपने पुत्र, अनुज तथा सगे-सबन्धियो को युद्ध में मारे जाने से
उन्हें बचाने का उपाय सोचो । इसमें कोई सदेह नही है कि तुम अपने बंधु-मित्रो के साथ
मारे जाओगे, तुममें से एक भी नही बचेगा । मरने के पश्चात् जो कार्य करने के लिए
शेष रह जायेंगे, उन्हें अभी पूरा कर लो । अब यही तुम्हारी स्थिति है ।'
राम के इन वचनो को सुनकर वह श्रेष्ठ वानर, मन-ही-मन हर्षित हो दुष्ट राक्षस-
रूपी वन को भस्म करने के लिए उत्पन्न प्रलय-काल की अग्नि के समान, उस इन्द्र के
शत्रु रावण को मारने के लिए आये हुए मृत्यु-दूत के समान, उड़कर रावण की सभा में
पहुँचा । उसे देखकर राक्षसो ने कहा—'देखो, वह फिर आ गया ।' यो कहते हुए वे
आयुधो से युक्त हो अगद पर आक्रमण करने का उपक्रम करने लगे । तब रावण ने अपना
हाथ उठाकर उनका वर्जन करने हुए कहा—'रुको' । फिर उसने अगद को देखकर कहा—
'कहो, तुम कौन हो ?' अगद ने कहा—'हे रावण, क्या तुम यह नही जानते कि मै
राम का दूत हूँ ।' तब रावण ने कहा—'राम कौन है ?' अगद बोला—'अपने अतुल
पराक्रम से जिसने परशुराम को जीता, वही रणकुशल (व्यक्ति) राम है ।' रावण ने
पूछा—'परशुराम कौन है ?' अगद ने उत्तर दिया—'जिसने उद्धत कार्तवीर्य जैसे वीर को
मारा, वह असमान पराक्रमी परशुराम है ।' तब रावण ने पूछा—'वह कार्तवीर्य कौन है ?'
अगद ने कहा—'क्या तुम नही जानते ? जिसने तुम्हें जीतकर बंदी बनाया था, वही वीर
कार्तवीर्य है ।' फिर, रावण ने पूछा—'तुम किसके पुत्र हो ?' अगद ने उत्तर दिया—

२६६ रंगनाथ रामायण
'क्या तुम इतने शीघ्र उस इन्द्र-पुत्र वालि को भूल गये, जिसने तुम्हें समुद्र में डुबो दिया था।
मैं उसी वालि का पुत्र हूँ। मेरा नाम अंगद है। हे असुरेश, तुम युद्ध-भूमि में
मेरे बारे में बहुत कुछ जान जाओगे । क्या, तुम उस काकुत्स्थ-वंशज राम को नहीं जानते,
जिन्होंने मोहित होकर उनके पास जानेवाली शूर्पणखा की नाक और कान काटकर उसके
रक्त में भीगे हुए अपने खड्ग को खर तथा दूषण के अंगों के रक्त में धोया था । तुम
क्यों प्रलाप करते हो ? तुम अब जाओगे कहाँ ? बचोगे कैसे ? गर्वांध हो तीनों लोकों को
झुलसानेवाले तुम्हें राम अवश्य मारेंगे । तुम शूर होकर बिना विचलित हुए उनका सामना
करो, यही उचित है । सुनो, अब लंका पर शासन करना तुम्हारे भाग्य में नहीं है । लंका
का राजा अब विभीषण ही है । तुम इतनी विपत्ति क्यों भोगना चाहते हो ? तुम उदार
मन से सीता को रामचन्द्रजी के पास पहुँचा दो और अपने प्राण बचा लो । अपने से
बलवान् राजाओं से संधि कर लेना इस पृथ्वी पर सभी राजाओं का उचित धर्म है ।'
इन बातों को सुनकर रावण ने क्रुद्ध होकर उस महाबली अंगद को पकड़ने की
आज्ञा दी । कुछ बलवान् राक्षस तुरन्त उसे पकड़ने का प्रयत्न करने लगे । अंगद भी अपनी
शक्ति दिखाने के उद्देश्य से अपने-आप उनके हाथों बंदी बन गया और उसके पश्चात्
अपनी समस्त शक्ति के साथ आकाश की ओर उछलकर ऐसा झटका दिया कि दस सहस्र
राक्षस-वीर नीचे गिरकर चूर-चूर हो गये। इससे संतुष्ट न होकर अंगद ने राक्षसों के उस सभा-
मंडप पर ऐसा पद-प्रहार किया कि वज्रपात से गिरनेवाले हिमाचल के शिखर के समान
वह मंडप टुकड़े-टुकड़े होकर गिर गया । रावण ने फिर से राक्षसों को आज्ञा दी कि
छोड़ो मत, अंगद को अवश्य पकड़ लो । तब राक्षसों ने आकाश की ओर उड़कर अंगद
पर परशु, शूल, करवाल, गदा आदि कई आयुधों का प्रहार करके उसे पीड़ित करने लगे ।
तब अंगद ने अपने मुक्कों से उन राक्षसों पर ऐसा प्रहार किया कि उनकी आँतें निकल
आईं और वे पृथ्वी पर गिर पड़े । तब खर के पुत्र सूकर ने अंगद को देखकर कहा—'ठहरो अंगद,
अब तुम कहाँ जा सकते हो ?' इस प्रकार, घोर गर्जन करते हुए उसने अपना धनुष उठाया
और पाँच तेज बाण अंगद के मस्तक पर चलाये और उसकी बाहुओं पर दस बाण चलाये ।
इससे क्रुद्ध होकर अंगद ने उस असुर पर अपनी मुष्टि से ऐसा प्रहार किया कि उसके
सिर के कई टुकड़े हो गये और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । यह देखकर सभी राक्षस
भय से छटपटाने लगे और रावण भी बड़ी चिंता में पड़ गया ।
तारा-पुत्र अंगद शीघ्र राम के पास पहुँचा, और प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा—
'हे देव, आपकी आज्ञा के अनुसार मैंने रावण के पास जाकर उसे सारी बातें समझाईं ।
किन्तु, उसने मेरी बातों की अवहेलना कर दी । हे राजन्, आपने नीति के अनुसार उसे
समझाने की चेष्टा की है, किन्तु वह तो आपके बाणों को अपने प्राणों की आहुति
देना चाहता है । वह मरने का दृढ़ निश्चय किये बैठा है । उसका अंत आसन्न है, इसलिए
हे देव, आप युद्ध में उस दशकंठ का वध कर डालिए । हे अनघ, आप (रावण को मार
कर) देवताओं को प्रसन्न कीजिए ।' इस प्रकार उसने लंका में घटी हुई सभी बातों का
वर्णन करके राम को सुनाया। अंगद की शक्ति का परिचय प्राप्त करके राम भी हर्षित हुए।

युद्धकाण्ड २६७
वहाँ सभी राक्षस रावण को देखकर कहने लगे-- 'हे देव, आप इस प्रकार चुप बैठे
रहेंगे, तो कार्य कैसे चलेगा । वह देखिए, राघव कपि-सेना के साथ लंका को घेरे हुए हैं ।
अब आप अपना प्रताप कब दिखायेंगे ? हमें भेजिए । हम युद्ध में राम-लक्ष्मण को जीतकर
आयेंगे ।'
४०. रावण का अपना वैभव प्रदर्शित करना
इन बातों को बड़े चाव से सुनकर रावण ने सोचा कि मैं अपना वैभव रामचन्द्र
को दिखाऊँगा, जिससे सुग्रीव आदि भयभीत हो जायें । इसके पश्चात् उसने उन सभी
वस्तुओं को मँगाया, जिन्हें उसने अपने भयंकर प्रताप के प्रदर्शन से इन्द्र, धनेन्द्र तथा नागेन्द्र
को जीतकर प्राप्त किया था । उसने उज्ज्वल कांतियुक्त पीतांबर धारण किये, चारों ओर
सौरभ विकीर्ण करनेवाले मृगमद, घनसार आदि सुगंध-मिश्रित मनोज्ञ चंदन का लेप किया,
सरस, मंजुल पारिजात-पुष्प-रचित मालाएँ धारण कीं, पद्मराग आदि बहुरत्न-खचित कंकण,
मुद्रिका, केयूर, भुजाभरण, कंठाभरण आदि धारण किये, अपनी मणियों की प्रभा से
गंडस्थलों को दीप्त करनेवाले कुंडल पहने, सूर्य-मंडल के समान उज्ज्वल तथा अपनी
प्रभा से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करनेवाले मुकुट अपने दसों सिरों पर धारण किये,
इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ऋत, वरुण, मरुत्, कुबेर एवं ईशान का दर्प चूर करके, उन पर प्राप्त
विजय की सूचना देनेवाला तोडर अपने पैर में पहना, धनुष बाण, चक्र, परशु, त्रिशूल,
करवाल, पाश, मुद्गर, चंद्रहास आदि बीस आयुध अपने बीसों हाथों में धारण किये, और
परिचारकों के साथ लेकर उत्तर दिशा के बुर्ज की ओर रवाना हुआ । उसके आप्तजन
शूलों से सज्जित हो उसके चारों ओर चलने लगे । भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत होकर
उसके मंत्री उसके दोनों ओर चल रहे थे । कई हजार राक्षस असंख्य स्वर्ण-टोपों से
विलसित अस्सी हजार धवल-छत्र लिये हुए थे । अस्सी हजार कामिनियाँ शेषनाग के फन के
समान दीखनेवाले सुंदर व्यजन (पंखा) लिये हुए चल रही थीं । चंद्र-किरणों के सदृश
दीखनेवाली अस्सी हजार अप्सराएँ दोनों ओर चन्द्रिका की भाँति उज्ज्वल चामर धीरे-धीरे
झुलाती हुई अपने कंकणों का मृदु शिंजन सुना रही थीं । बंदी-मागधों का समूह देवताओं
पर (दानवों की) विजय का स्फूर्तिदायक स्तुति-पाठ कर रहा था । उसके आगे मंद, मध्यम,
उच्च आदि स्वर-भेदों के साथ चंद्रवदनी स्त्रियाँ गीत गा रही थीं । ऐसी ठाट-बाट से
सज्जित हो रावण दुर्ग के उत्तरी बुर्ज पर अपने वैभव का प्रदर्शन करते हुए मणिमय प्रभा-
समन्वित सिंहासन पर आरूढ होकर ऐसा दीख रहा था, मानो पश्चिम पर्वत पर सूर्य-बिंब
दिखाई पड़ रहा हो । राक्षसों के आतपत्रों ने सूर्य को ढक दिया था, इसलिए चारों ओर
अंधकार फैलने लगा ।
उस समय राम माया-मृग के चर्म पर, इन्द्रनील मणि के समान प्रकाशमान अपनी
देह का वाम भाग टेके हुए, वाम-भुजाग्र को अपने कपोल का आधार बनाकर, सूर्य-बिंब के
समान उज्ज्वल सुग्रीव की जाँघों पर, राजसी ठाठ से, अपना अतुल सौंदर्य को प्रकट करते
हुए लेटे थे और अपने प्रिय-भक्त पवन-पुत्र के जाँघों पर पैर पसारकर आराम कर रहे थे ।
पवन-पुत्र उनके चरण कमलों को धीरे-धीरे दबा रहा था । अंगद उनके दक्षिण-हस्त
३८

की अँगुलियों को दोनो हाथो से दबा रहा था । बंदी-मागधो की तरह उनके चारो ओर
नल-नील तथा जांबवान् आदि प्रमुख सेनापति उनकी स्तुति कर रहे थे—'हे सकल
लोकाराध्यचरण, हे जानकी-हृदयांबुज-षट्चरण, हे दीनार्त्तिहरण, हे स्तवनीयकृपाभरण, हे हर-
वद्य नाम, हे सूर्यकुलाब्धिसोम, हे गत्रुनागक, हे रघुराम आदि ।' तब रामचंद्र पूर्णचन्द्र के
समान शोभायमान होनेवाले अपने मदहास-युक्त तथा अविरल करुणामृत से परिपूर्ण मुख-
मंडल में विलसित धवल अरविंद की सुंदरता को भी परास्त करनेवाले नेत्रो की कांति को,
चारो ओर विकीर्ण करते हुए, अपने ललित कटाक्ष-रूपी चंद्रिका की वृष्टि करते हुए,
अपने दोनो हाथो के समीप बैठे हुए, राक्षसो के भेदो के ज्ञाता विभीषण के साथ अत्यन्त
रहस्यपूर्ण वार्त्तालाप कर रहे थे । उस समय उनका मुँह दक्षिण की ओर था । इसलिए
उन्होने रावण को देखकर कहा—'हे विभीषण वहाँ देखो । उस दुर्ग के उन्नत शिखर पर
कोई सिंहासन पर आसीन है । उस पर त

युद्धकांड २६६
तथा व्यजनो से रहित हो, केवल दण्डो को अपने हाथो में थामे खडे रहनेवाले उन
असुर-पक्तियो के मध्य रावण सभ्रमित हो, अपना समस्त गर्व खोकर बडी देर तक बैठा रहा,
क्योकि उसे ऐसा लग रहा था, मानो खडे हुए राक्षस उसे ले जाने के लिए आये हुए
यमदूत हो । रघुराम के धनुर्विद्या-कौशल का वार-वार विचार करके उसका सिर
काँपने लगा, और मन-ही-मन वह उनके (राम के) पटुत्व को स्वीकार करने लगा । फिर,
प्रकट रूप से वह रघुराम की प्रशसा करने लगा ।
४२. रावण का राम की धनुर्विद्या की प्रशंसा करना
उसने कहा—'हे श्यामवर्ण रघुराम, हे नयनाभिराम, हे कोदण्ड-दीक्षा-गुरु, हे वीरा-
वतार, हे शर-संधान-कला-निपुण हे श्रेष्ठ चाप के कर्पण में कृपण, हे दृढबाहु, हे विख्यात
मुष्टि-सपन्न, हे विजित शत्रुओ के भाग्य-विधाता, हे विजय-सपन्न, हे श्रेष्ठ मानव-राजकुमार,
हे नव्य-दिव्य-अस्त्र-सपन्न, हे चचल तथा घोर शरो से पूर्ण अक्षय तूणीरधारी, हे वीराग्र-
गण्य, हे विश्वशरण, हे राम भूपाल, तुम्हारे समान इस ससार में और कौन धनुर्धर हो
सकता है ? त्रिपुरो का नाश करने में (निपुण) अकेले एक शिव ही है और वाणो को
चलाने में निपुण तुम एक ही हो ।' इस प्रकार, रावण अपने दसो मुंहो से रामचन्द्र की
प्रशसा करने लगा ।
यह देखकर (उसके) मंत्रियो ने उस दैत्यनाथ से कहा—'हे दैत्य-पुगव, शत्रुता का
विचार किये बिना, कही शत्रु की ऐसी प्रशसा कोई कर सकता है ? यदि आप ऐसी प्रशसा
करेंगे, तो शत्रु तथा मित्र, यह सोचकर कि आप भयभीत हो गये है, आपको उपेक्षा की
दृष्टि से देखेंगे । यह राजनीति नही है।' तब रावण ने हँसकर उनसे कहा—'धनुर्विद्या
की निपुणता, महान् पराक्रम, सौदर्य तथा बाहुबल आदि गुणो में श्रेष्ठ, कोदण्ड-दीक्षा-गुरु,
राम-भूपाल की समता इन तीनो भुवनो में कौन कर सकता है ? हरिहर तथा ब्रह्मा
भी उसकी समता नही कर सकते । क्या, श्रेष्ठ शूरो की महत्ता को स्वीकार नही करनी
चाहिए ?' इस प्रकार, नीति-पूर्ण वचनो को कहने के पश्चात् दनुजेश्वर वहाँ से चला गया।
तब राक्षस-नेताओ ने कटकर गिरे हुए छत्र-चामर आदि को देखकर अत्यत भयविह्वल हो
वहाँ से चले गये और कई प्रकार से राम के पराक्रम तथा शौर्य की प्रशसा करते हुए
कहने लगे—'राघव करुणा-समुद्र है, इसलिए उनके भयकर बाण ने केवल छत्रो को ही
काटा । यदि वे उसी प्रकार और एक बाण चलायें, तो हमारे सिर भी उडने लगेंगे ।'
४३. वानरों का लंका ध्वंस करना
यहाँ पर राघवेन्द्र ने आगे के कार्य के सबध में अच्छी तरह मन-ही-मन विचार
किया और फिर अपने अनुज विभीषण तथा सूर्य-पुत्र आदि आप्त-वर्ग की सम्मति लेकर
शुभ मुहूर्त्त में वानरो को लका पर आक्रमण करने की आज्ञा दी । वानर-सेना उसी क्षण,
भयकर गर्जन करते हुए—'हे देव, हमारा शौर्य देखिए । आपके लिए हम किस प्रकार
प्राण देते है, देखिए ।' यो कहते हुए पर्वतो तथा वृक्षो को कँपाते हुए, करोडो वानरो ने
एक साथ मिलकर लका के दुर्ग को चारो ओर से घेर लिया ।' 'राम की अयत्न जय

होगी'—ऐसा घोष करते हुए, वानर-वीर अपनी महान् शक्ति को प्रकट करते हुए पर्वतों
तथा वृक्षों को जहाँ-तहाँ से जमा करके परिखा को पाटने लगे । उस समय वे ऐसे दीख
रहे थे, मानो वध्य भूमि पर स्थित वधिक हों ।
तब कुमुद दस करोड़ वानरों की सेना लेकर पूर्व द्वार की ओर गया । बाहुबली
शतबली अस्सी करोड़ की सहायक सेना लेकर आनेवाले राक्षसों के आक्रमण को रोकने के
उद्देश्य से दक्षिण के द्वार पर जाकर ठहर गया । सुषेण दस करोड़ सैनिकों को लेकर
पश्चिम के द्वार पर चला गया । राम, लक्ष्मण, विभीषण तथा सुग्रीव उत्तर के द्वार पर ही
रहे । गज, गवय, गंधमादन तथा शरभ, दुर्ग के चारों ओर बार-बार भ्रमण करते हुए
वानरों को दुर्ग पर चढ़ जाने के लिए उत्साहित कर रहे थे । तब वानर उद्धत गति से
एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए, एक दूसरे को धक्का देते हुए, दुर्ग पर ऐसे चढ़ गये कि,
मालूम नहीं होता था कि कौन बुर्ज है, और कौन कंगूरा । फिर, स्तूपों पर चढ़कर
वे भयंकर गर्जन करते हुए, अपनी पूँछों का फंदा बनाकर पत्थरों को किले के भीतर फेंकने लगे ।
फिर बड़े-बड़े वृक्षों को तने से उखाड़कर बड़े वेग से उन्हें अंदर फेंककर किले के
भीतर स्थित घरों को तोड़ने लगे । फिर उन्होंने भीतर के कितने ही भवनों, मंडपों और
कंगूरों को अपने पादाघात से चूर-चूर कर दिया, बड़े-बड़े पहाड़ों को फेंककर दुर्ग को
गिराने और उसके नीचे दबकर मरनेवाले राक्षसों को देखकर हँसने लगे । वानर, राक्षसों
को ललकारते हुए बड़ी-बड़ी शिलाओं को किले के ऊपर फेंककर उसकी ऊँची दीवारों को
गिरा देते । दुर्ग के वहिर्द्वारों, राक्षसों, उनके आयुधों, पताकाओं, ध्वजाओं तथा छत्रों को
गिरते हुए देखकर वानर-वीर दिशाओं को कंपित करनेवाले भयंकर गर्जन करते और
अत्यधिक मात्सर्य से पुन पर्वतों को लाकर दुर्ग पर फेंकने लगते । उनके कठोर प्रहारों के
कारण लंकापुर की ऊँची अट्टालिकाएँ गिरने लगीं, वीथियाँ नष्ट होने लगीं, दीवारें गिरने
लगीं, ऊँचे सौध टूटकर गिरने लगे, घर चूर-चूर होने लगे, और असंख्य मंदिर नष्ट-भ्रष्ट
हो गये । सारा दृश्य राक्षसों के नाश की सूचना देनेवाले अपशकुन के समान बड़ा भयावह
दीख पड़ता था ।

४४. राक्षसों तथा वानरों का भीषण संग्राम

तब भयभीत हो राक्षस कहने लगे—'हमने ऐसा उत्पात कभी नहीं देखा ।' फिर,
वे विकट अट्टहास करते हुए, भयंकर गर्जन करने लगे । उसके पश्चात् सभी राक्षस एक
साथ एकत्रित हो, बड़े क्रोध से वानरों पर शूल फेंके, खड्ग चलाये, और गदाओं से प्रहार किये ।
वे वानरों के समूह में घुस गये और उनपर प्रहार करने, परशुओं से उन्हें मारने
और भाले चुभोकर उन्हें परिखाओं में गिराने लगे । फिर बड़ी-बड़ी शिला-यंत्रों के द्वारा
गोले फेंककर दुर्ग की दीवारों के ऊपर चढ़नेवाले वानरों को आगे बढ़ने से रोकते तथा
भयंकर गर्जन करते । उनके गर्जनों की ध्वनि तथा कपियों के विकट गर्जनों की ध्वनियों
के कारण पृथ्वी तथा सभी दिशाएँ कंपित हो गईं । व्याकुल होकर दिग्गज चिंघाड़ने लगे ।
भय से कंपित होने से पृथ्वी में दरारें पड़ गईं । अदहन के समान समुद्र का पानी खौलने
लगा । सारा संसार तप्त हो गया और भूत भयभीत हो गये । कुल-पर्वत गोलियों के समान

उछल-उछलकर गिरने लगे । शेषनाग विष उगलने लगा, कूर्म और पर्वत एक दूसरे मे
टकरा गये ।
तब रावण ने (कपि-सेना से) घिरी हुई भयंकर राक्षस-सेना को अपने पास बुलाया
और उसे उत्साहित करते हुए कहने लगा—'कपि-सेना का पीछा करके उसे किले के बाहर
भगा दो ।' तुरंत दुर्ग के चारो द्वारो से राक्षस-सेना इस प्रकार बाहर निकली, जैसे प्रलय-
काल में रुद्र के मुख से ज्वालाएँ निकलती है । उस समय, भेरी, डका, पटह, शंख, तुरही
आदि वाद्यो के भयंकर निनादो, घोडो की हिनहिनाहट, बलिष्ठ हाथियो की चिंघाड, रथो
के चक्रो की ध्वनि तथा मन को विचलित करनेवाले सैनिको के सिंहनादो के कारण समस्त
ब्रह्माण्ड कंपित होने लगा और सभी देवता भयभीत हो गये ।
वानर-सेना तुरंत राक्षस-सेना से भिड गई । द्वंद्व-युद्ध होने लगा । इन्द्रजीत ने
अगद पर गदा का ऐसा घोर प्रहार किया, जैसे इन्द्र ने दुर्वार गति से अपने वज्रायुध को
कुल-पर्वत पर चलाया था । अगद ने भी इन्द्रजीत की समता करनेवाला अपना युद्ध-कौशल
प्रकट करते हुए एक विशाल पर्वत-शृंग को उठाकर फेंका और इन्द्रजीत के रथ, सारथी
तथा रथ के अश्वो को चूर-चूर कर दिया । प्रजघ ने दुर्वार गति से सपाति पर तीन अस्त्र
चलाये । उसके आघात को बचाकर सपाति ने अश्वकर्ण वृक्ष को उस पर फेंका । अतिकाय ने
विनत तथा रभ नामक वानरो को घेरकर उन पर शरवृष्टि की । किन्तु उन दोनो ने
बडे-बडे पर्वतो को फेंककर उसकी सेना का ध्वस कर दिया । महोदर ने सुपेण को घेरकर
उसके विशाल वक्ष तथा प्रशस्त ललाट पर क्रमश पाँच तथा तीन वाण चलाये । तब सिंह-
गर्जन करते हुए उसने एक बडा पहाड उठाकर उस पर ऐसा फेंका कि महोदर का रथ
अश्व तथा सारथी के साथ चूर-चूर हो गया । जाववान् ने एक विशाल वृक्ष घुमाकर
मकराक्ष पर फेंका, किन्तु उसने उसको बीच में ही काटकर, जाववान् के ललाट, वक्ष तथा
कंधो पर कई वाण मारे । इससे क्रुद्ध होकर जाववान् ने उस पर एक विशाल पर्वत फेंका ।
देखते-देखते मकराक्ष का रथ सारथी तथा अश्वो के साथ नष्ट-भ्रष्ट हो गया । विद्युज्जिह्व ने
शतबली को घेर लिया और उसके वक्ष पर शरवृष्टि की, किन्तु शतवली ने अत्यत
वेग से उस पर एक बडा वृक्ष फेंका । गज को कई राक्षसो का सहार करते हुए देखकर
प्रमद ने क्रोध से उस बली वानर के वक्ष पर अपना शूल चलाया । तब गज ने एक साल-
वृक्ष से उस राक्षस पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस वही ढेर हो गया । (उसे मरते
देख) सभी वानरो ने हर्षनाद किया । कुम्भकर्ण का ज्येष्ठ पुत्र कुंभ नामक वीर वानरो को
पकड-पकडकर निगलने लगा, तो उसे देखकर धूम्र ने एक वृक्ष से मारा । क्रूर देवांतक ने
गवाक्ष के विशाल वक्ष पर पाँच शर चलाकर उसे अत्यंत पीडित किया, तो उसने बडे
वेग से एक साल-वृक्ष उस पर फेंका । तब उस राक्षस ने सात वाणो से उस वृक्ष के खड-
खड कर दिये और गवाक्ष पर नौ अस्त्र चलाये । तब गवाक्ष ने एक पहाड उस राक्षस पर
फेंकते हुए कहा—'लो, इसे सँभालो ।' मारण ने ऋषभ पर एक मूसल चलाया, तो ऋषभ ने
उसके वक्ष पर एक बडा वृक्ष फेंका । इससे उसके धनुष-बाण टूट गये और वह मूच्छित हो गया ।
पहाड जैसे हाथी पर आसीन हो जब त्रिशिर ने गन्ध के सिर पर तोमर चलाया,

३०२ रंगनाथ रामायण
तब उसने क्रोध में आकर उस राक्षस पर सप्त-पर्ण वृक्ष का ऐसा प्रहार किया, जैसे इन्द्र ने
कुल-पर्वत पर (वज्र से) प्रहार किया था और उस राक्षस के हाथी को गिरा दिया ।
नरांतक ने द्रुत गति से पनस पर तीव्र बाणों की वर्षा की, तो पनस ने भी अपनी भयंकर
शक्ति प्रकट करते हुए उस पर वृक्षों की वर्षा कर दी। अकंपन ने एक बड़े लट्ठ से कुमुद
पर प्रहार किया, तो कुमुद ने झुककर उस प्रहार से अपने को बचा लिया और उस अकंपन पर
मुष्टि का ऐसा प्रहार किया कि अकंपन मूच्छित हो गया । जब धूम्राक्ष ने क्रुद्ध होकर केसरी
पर बाणों की घोर वर्षा की, तब उसने धूम्राक्ष पर पर्वतों की वर्षा की और उसे गिरा दिया।
महापार्श्व ने बड़े रोष से महाबाहुबली गंधमादन पर आक्रमण किया, तो उसने पर्वतों, वृक्षों
तथा अपने दाँतों के प्रयोग से उस राक्षस को पीड़ित किया । शुक ने वेगदर्शी के वक्ष पर
अस्त्र चलाये, तो वेगदर्शी ने अपने दुर्वार विक्रम से उसके रथ को अपने पैरो से कुचलकर
चूर-चूर कर दिया । जब तपन ने नल का सामना किया, तब नले ने अपना शरीर इतना
बढ़ाया कि देखनेवाले संभ्रमित हो गये और फिर विशाल पर्वत को उस राक्षस पर फेंका ।
तपन ने नल पर तेज बाण चलाये, तो नल ने एक ताल-वृक्ष से उस पर प्रहार किया ।
जंबुमाली ने अपनी गुरुतर शक्ति से हनुमान् पर घोर प्रहार किया, तो हनुमान् क्रुद्ध हो
उसके रथ पर कूदा और जंबुमाली के सिर पर अपनी हथेली का ऐसा प्रहार किया कि
उसका सिर फूट गया । मित्रघ्न ने विभीषण पर शरवृष्टि की, तो विभीषण के शरीर से
रक्त के फौव्वारे छूटने लगे । तब उग्र क्रोध से विभीषण ने उस पर गदा चलाई, तो
मित्रघ्न मूच्छित होकर गिर पड़ा । प्रहस्त नामक राक्षस को वानरों को पकड़कर निगलते
देख सुग्रीव की आँखें क्रोध से लाल हो गईं । उसने तुरंत एक सप्त-पर्ण वृक्ष से उस पर
प्रहार किया और उसे गिरा दिया । वज्रमुष्टि नामक राक्षस पर मैन्द ने अपनी मुष्टि से
प्रहार किया, तो वह राक्षस पृथ्वी पर ऐसा गिरा, मानो लंका का बुर्ज ही गिर पड़ा हो ।
अशनिप्रभू नामक राक्षस को द्विविद ने एक पर्वत के प्रहार से ऐसा गिरा दिया कि स्वर्ग
के देवता हर्ष-ध्वनियाँ करने लगे । विशाल बाहुबली निकुंभ ने अपने प्रताप का प्रदर्शन
करते हुए अपने दिव्य अस्त्रों से नील को ऐसा ढक लिया, जैसे काले-काले मेघ सूर्य को
आच्छादित कर लेते हैं । तब नील ने इसकी उपेक्षा करते हुए सहज ही निकुंभ के रथ के
चक्र को निकालकर उसे बड़े वेग से ऐसे चलाया कि सारथी का सिर भूमि पर लोटने लगा
और निकुंभ स्वयं भयाक्रांत होकर देखता रह गया । विरूपाक्ष सौमित्र पर शर-वृष्टि करने
लगा, तो सौमित्र ने उसकी उपेक्षा करके एक ऐसा बाण उस राक्षस पर चलाया कि उसकी
शक्ति जाती रही और वह मूच्छित हो पृथ्वी पर लुढ़क गया । उस समय सप्तघ्न, रश्मिकेतु,
अग्निकेतु तथा कोपाग्निकेतु नामक चार भयंकर प्रतापी राक्षस बार-बार गर्जन तथा धनुष
का घोर टंकार करते हुए उमड़कर आनेवाले मेघों के समान शर-वृष्टि करने लगे । तब
सूर्य-वंश-तिलक राम ने सहज ही चार बाणों से उन चारों राक्षसों के सिर उड़ा दिये ।
४५. युद्ध-भूमि का वर्णन
इस प्रकार घोर द्वंद्व-युद्ध के अविराम गति से चलते रहने से, सारी युद्ध-भूमि में
टूटे हुए असंख्य धनुष, खंडित शर, चूर-चूर हुई गदाएँ, खंडित करवाले, टूटे हुए भाले तथा

मुद्गर, धूलि के समान बने हुए परिघ तथा खड्ग, खड-खड बने हुए चक्र तथा शूल, चूर्ण
के समान बने हुए लट्ठ, खंडित रथ-चक्र, छटपटाते हुए अश्व, गिरकर मिट्टी चाटनेवाले
सारथी, सभी दिशाओ में बिखरकर पडे हुए आभूषण, टूटकर गिरे हुए रत्न, कटे हुए हाथ
तथा मरकर गिरे हुए असुर भयोत्पादक ढंग से स्थान-स्थान पर पड़े हुए दिखाई दे रहे थे ।
वह युद्ध-क्षेत्र राम के वशीभूत उस क्षुब्ध-समुद्र की समता करता था, जिसका गर्व
राम ने अपने दुर्दमनीय शरो के प्रहार से भग्न कर दिया था और फलस्वरूप उसके
समस्त जल के सूख जाने से जल में निवास करनेवाले वृहदाकार मीन, मकर तथा उरग
छटपटाने लगे थे । उस युद्ध-भूमि में घड इस प्रकार हिल रहे थे, मानो कह रहे हो कि
जो रावण गर्वांध होकर सीता को ले आया है, उसकी धड पर सिर कैसे रह सकेगा ?
(कट-कटकर मरे हुए लोगो की) मज्जा रूपी कीचड, केश-समूह-रूपी सैंवार, खोपडी-रूपी
सीप, खंडित होकर गिरे हुए शिला-

कोई कह रहा था 'छोडो मत, मारो', तो कोई कहता था, 'सिर काट लो, सिर काट लो ।
कोई पूछ रहा था--'कहाँ है ?' तो कोई कहता था--'यहाँ आने दो, यहाँ ।' इस प्रकार,
की विविध ध्वनियो के साथ हुकार तथा अट्टहास की ध्वनि करते हुए जब राक्षस तथा
वानर युद्ध करने लगे, तब सारा आकाश धूलि से व्याप्त हो गया । क्रमश अधकार वढ
जाने मे राक्षस-सैनिक भ्रम से अपने ही पक्ष के लोगो पर अस्त्र चलाकर मार डालते थे ।
वानर भी अत्यधिक क्रोध से उन पापी राक्षसो से जूझकर रथियो को मार डालते थे,
सारथियो को चीर डालते थे, रथ के अश्वो को नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे और रथो को
ऊपर उठाकर पृथ्वी पर ऐसे पटकते थे कि उनके टुकडे-टुकडे हो जाते थे । फिर, वे गजो
पर बैठे योद्धाओ का गर्व तोड़कर, मत्त गजो को पैरो से पकड़कर उन्हें ऊपर उठाकर, नीचे
पटककर मार डालते । तितर-वितर होकर दौडनेवाले अश्वो को पकड़कर ऊपर उठाते,
और उन्हें वेग से घुमाकर नीचे ऐसे पटक देते थे कि खून बहने लगता । पदचर-सैनिको
को ऐसा मारते कि उनकी रीढें, वक्ष, पसलियाँ, भुजाएँ, मुँह, दाँत, सिर तथा भेजा
छिन्न-भिन्न होकर चारो ओर बिखर जाते । रथो के सतत सचलन से उत्पन्न तथा अश्वो
के खुरो से उठी हुई धूलि आकाश की ओर इस प्रकार उड रही थी, मानो राक्षसो के
मन की कालिमा चारो ओर व्याप्त हो गई हो । धूलि के अधकार से मिलकर आकाश
भर में व्याप्त होने से वह रात्रि राक्षसो तथा वानरो के प्राणो को हरनेवाली प्रलय-काल
की रात्रि के समान दीख रही थी ।
अपने लिए रात्रि अनुकूल होने से सभी राक्षसो ने अपने गर्जनो से त्रिकूटाचल को
गुजायमान करते हुए युद्ध-सन्नद्ध होकर एक साथ राम को घेर लिया और उन पर बाण-
वृष्टि करने लगे । तब राम ने अग्नि-बाण चलाकर अधकार को दूर कर दिया और अपने
साथ युद्ध करनेवाले महोदर, महापार्श्व, सारण, शुक, वज्रदत तथा महाकाय पर वडे वेग
से बाण चलाये । उनसे पीडित हो वे छहों भय-त्रस्त राक्षस भाग खड़े हुए । बचे हुए
अन्य राक्षस-सैनिक राम के तीव्र शरो मे नष्ट हो गये ।
४६. इन्द्रजीत का माया-युद्ध
अगद के हाथो ने फेंके हुए गिरि-शृग के कठोर प्रहार से रथ, सारथी तथा अश्वो
को खोकर इंद्रजीत शीघ्र यज्ञ-शाला की ओर गया । राक्षस आवश्यक हवन-सामग्री ले
आये । तब उसने, रक्तवर्ण के अधोवस्त्र, उत्तरीय तथा शिरोवस्त्र तथा पुष्प-मालाएँ पहनी ।
फिर, उसने अग्नि के योग्य परिस्तरण (होमकुड के चारो ओर रखे जानेवाले कुश) के
रूप में भाले, भयंकर शस्त्र तथा शर रखे और क्रमशः काले वकरे के कठ के रक्त तथा
ताल की समिधाओ से होम करने लगा । तब अग्नि, बिना धुआँ छोडे विजय की सूचना
देनेवाली अपनी चचल शिखाओ को व्याप्त करते हुए जलने लगी और इंद्रजीत से प्रस्तुत
आहुतियां को ग्रहण किया । इस प्रकार, इन्द्रजीत ने अत्यत भक्ति से यथाविधि हवन पूरा
किया और अग्निदेव से चार घोडो तथा विविध शस्त्रास्त्रो से युक्त एक स्वर्ण-रथ प्राप्त किया ।
इसके पश्चात् वह उस रथ पर आरूढ होकर, ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले
अपने भयंकर गर्जनो से इन्द्रादि देवताओ को भयभीत करते हुए राक्षस-सेनाओ के पास

आया और अदृश्य होकर, आकाश से ही, राम-लक्ष्मण पर घोर अस्त्रो की वर्षा करने लगा ।
राम तथा लक्ष्मण ने भी असख्य शर आकाश की ओर चलाये, किन्तु उनमें मे एक भी
इन्द्रजीत को नही लगा । वह राक्षस आकाश में अदृश्य रहकर वडे गर्व से सभी दिशाओ
में घूमते हुए श्रेष्ठ वानर-वीरो का सहज ही नाश करने लगा । सूर्य-किरणो के समान
आकाश से आनेवाले उसके क्रूर अस्त्र, वानरो तथा रामचन्द्र को दिखाई पडते थे, किन्तु
उसके रथ की ध्वनि, घोडो के खुरो की ध्वनि, धनुष का टकार, सारथी की बातें, कोडे
की ध्वनि, रथिक (इद्रजीत) का गर्जन तथा उसका रूप, रथ तथा उसकी ध्वजाएँ कही
भी दिखाई नही देती थी । यह विचित्र युद्ध उस कपि-सेना को ऐसा लग रहा था, मानो
वालि का सहार करनेवाले राम पर क्रुद्ध होकर इन्द्र अपने पुत्र के वध का प्रतिशोध लेने
के उद्देश्य से भयकर बाणो की वर्षा कर रहा हो । कपि-सैनिको के अगो को खडित होते
हुए देखकर रामचन्द्र से लक्ष्मण बोले-- 'हे देव, आकाश में छिपकर युद्ध करनेवाले इस
राक्षस के

३०६ रंगनाथ रामायण

ओर से उसके घर आते थे । यह देखकर इन्द्रजीत ने उन दोनों सूर्यवंशियों को नागपाश
से ऐसे बाँध दिया, मानो कह रहा हो कि सर्प के साथ रहना तुम्हारे लिए पहले से ही
सहज रहा है, अब भी उनके साथ ही रहो । राम-लक्ष्मण ने भी (इन्द्रजीत को प्राप्त)
ब्रह्मा के वर का सम्मान करने का निश्चय किया और वे आदिनारायण के वंशज, उस
राक्षस-राजकुमार के द्वारा प्रयुक्त नाग-पाश से बँध गये । 'ये आज राम का रूप धारण
किये हुए हैं, किन्तु विचार कर देखा जाय, तो इन्हीं ने वामन का रूप धारण करके तीन
पग भूमि माँगी थी और कृतघ्न हो बलि को बाँधा था । भला उसका फल, मनुष्य का जन्म
लेने के पश्चात् मिले बिना कैसे रहेगा'—इस प्रकार के लोक-कथन के अनुकूल ही रामचन्द्र
अपने द्वारा उत्पन्न माया से आप बँध गये ।
माया के बंधनों में बँधे हुए राम सुध-बुध सोये-से पड़े रहे । यह देखकर देवता
दिग्भ्रांत हुए और वानर खिन्न हुए । तब दुःखी सुग्रीव को देखकर विभीषण ने कहा—
'हे सुग्रीव, ऐसे क्यों दुःखी हो रहे हो ? चाहे कैसा भी व्यक्ति क्यों न हो, उसके जीवन में
विपत्तियाँ तो आती ही हैं । यदि सूर्यवंशज नाग-पाश से बँधे हुए हैं, तो क्या हुआ ?' यों
कहकर उसने अपनी माया की दृष्टि से रावण के पुत्र को आकाश-वीथी में देखा और जल
को अभिमंत्रित करके उससे राम-लक्ष्मण की आँखों को पोंछकर, उन्हें मेघनाद को दिखाया ।
उसके बाद सुग्रीव ने तुरन्त एक विशाल पर्वत को उखाड़कर इंद्रजीत पर फेंका, किन्तु उसने उसे बीच
में ही खंड-खंड कर दिया और तीव्र शर-वृष्टि से सुग्रीव को ऐसे त्रस्त एवं व्याकुल कर
दिया कि सुग्रीव को समर में पीठ दिखानी पड़ी । जो राक्षस सुग्रीव के प्रताप से भयभीत थे,
वे इसे देखकर बहुत हर्षित हुए । इंद्रजीत इस विजय से अत्यधिक मोद-मग्न हो, अपने
सैनिकों के साथ लंका में वापस चला गया और रावण से कहने लगा—'मैंने सर्प-बाणों से
कपियों का नाश किया और इक्ष्वाकु-वंशजों को व्याकुल कर दिया है ।'
अपने पुत्र की वीरता पर मन-ही-मन हर्षित होते हुए रावण ने शीघ्र ही त्रिजटा
को बुलाकर कहा—'राम को प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास अपने मन में धारण किये रहने
में भूमिसुता मेरा तिरस्कार कर रही है । आज इन्द्रजीत के हाथों में राम की जो दुर्गति
हुई है, उसे सीता को दिखाओ । सीता को शीघ्र पुष्पक-विमान पर बैठाकर ले जाओ और
राम की दशा दिखा लाओ, जिससे वह राम की आशा छोड़कर मुझे स्वीकार करे ।'
४७. नाग-पाशबद्ध दाशरथियों को देख सीता का दुःखी होना
रावण की आज्ञा मानकर त्रिजटा दानवियों के साथ सीता को पुष्पक-विमान पर
बैठाकर ले आई और युद्ध-क्षेत्र में गिरे हुए वानरों तथा राम-लक्ष्मणों को दिखाया । वह
कमल-लोचनी उनकी दशा देखकर अत्यंत दुःखी होकर अविरत अश्रुधारा बहाती हुई विलाप
करने लगी। वे कहने लगी—"हाय राम, आपकी धनुर्विद्या कहाँ लुप्त हो गई ? आपमें ही स्थित हरि
तथा हर आदि देवों को भी भयभीत करनेवाली आपकी बाण-शक्ति आज कैसे नष्ट
हो गई ? इस संसार में आप ही अकेले परशुराम की भी उपेक्षा करने की शक्ति रखते हैं।
सभी मुनि तथा नाग, आपकी सहायता के लिए सतत तत्पर रहते हैं । हाय, ऐसे
नाग आज आपको बाँधनेवाले पाश बन गये हैं ! सामुद्रिकों ने मुझे देखकर कहा था कि

युद्धकांड ३०७
तुम्हारे शरीर में सब प्रकार के शुभ चिह्न हैं, तुम्हारे चरणतलो में रेखाएँ तथा कमल हैं;
इसलिए पति के साथ तुम्हारा राजतिलक होगा, तुम्हें योग्य पुत्र उत्पन्न होंगे और तुम
चिरसुहागिन रहोगी। हे सूर्यवंशतिलक, उनकी सभी बातें आज मिथ्या हो गईं ।
उन्होने मुझे देखकर यह भी कहा था कि 'तुम्हारे (सीता के) चिकुर भ्रमर-समूह के
समान नीले तथा सुदर हैं, कटि क्षीण है, एक दूसरे से मिलनेवाली टेढ़ी भौहें हैं, बिजली
की-सी कांति से युक्त दाँत हैं, विकृतिहीन स्थूल तथा वर्तुलाकार जाँघें हैं, हाथ, ललाट,
नेत्र, मुँह तथा चरण सुंदर लक्षणो से समन्वित हैं, कांतियुक्त तथा स्निग्ध नखो से युक्त
सुदर अगुलियाँ हैं, वर्तुलाकार, विवर्द्धित तथा सूक्ष्म अग्रभाग से युक्त दो कुच हैं, स्निग्ध
एव विशाल वक्ष तथा पार्श्वभाग हैं, नाभि गंभीर तथा सुदर है तथा तुम्हारा शरीर दिव्य
तथा कमनीय काति से समन्वित है, अत तुम्हारे समान भाग्यशालिनी कोई नही है।' हे राजन्,
मेरा वह भाग्य आज ऐसा फूट गया है ? आर्यो की यह उक्ति कि ऐसे षोडश लक्षणो से
सम्पन्न रमणी अत्यत भाग्यशालिनी होगी, आज मिथ्या सावित हुई । हे राजन्, यह सब
मेरे दुर्भाग्य का फल है। आर्यों का कथन है कि जिस कन्या के, लाल कमल की-सी सुंदर
हथेलियाँ हो, पल्लव के समान अरुण कान्तिवाले चरण हो, क्षीण कटि हो, मदहास से
युक्त मुख-कमल हो, वह चिर सौभाग्यवती होती है। यह कथन भी झूठ ही साबित हुआ ।
हे राजन्, मेरी साधना का यही परिणाम हुआ । मुझे चुराकर ले आनेवाले भयकर राक्षस
की खोज करके मेरा पता आपने जान लिया, समुद्र को बाँधकर कपि-सेना के साथ इस
पार चले भी आये, पर हाय, एक 'गोपद' में आप डूब गये ! हे राजन्, भयंकर याम्य शर,
वरुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना आप भूल तो नही गये ? कोई भी
शत्रु, आपके दृष्टि-पथ में पड़ जाने मात्र से वह प्राणो से हाथ धो बैठता था, अब आपकी
ऐसी दशा हो गई है ! दैव-योग से ही ऐसा हुआ है, अन्यथा किसकी शक्ति है कि आपका
सामना करे । यदि मेघनाद अपनी माया के बल से युद्ध में आपको ऐसे भयकर पाशो से
बाँध सका, तो स्पष्ट है कि विधि-विधान का अतिक्रमण करना किसी के लिए संभव नही है।
हे नाथ, हे वीर, हे रामचन्द्र, मै अपने लिए नही रोती, आपके लिए नही रोती, आपके
लिए अपने प्राण त्यागनेवाले काकुत्स्थ-वशज लक्ष्मण के लिए भी मै दुःखी नहीं होती, मेरे
दुःख को देख द्रवीभूत हृदय से शोक करनेवाली अपनी माँ के लिए भी दुःखी नही होती,
किन्तु सतत केवल आपका ही ध्यान अपने मन में धारण किये रहनेवाली माता कौसल्या
के लिए विलाप करती हूँ । कब चौदह वर्ष समाप्त होगे, कब राम अयोध्या में आयेंगे-
ऐसी प्रतीक्षा करनेवाली आपकी माता की आशाएँ आज मिट्टी में मिल गईं ।"
इस प्रकार, विलाप करनेवाली जानकी को सांत्वना देते हुए अत्यन्त दयार्द्र चित्त से
त्रिजटा सीता से बोली- 'हे कमल-लोचनी, राम पर कोई विपत्ति आ नहीं सकती । आप
क्यो इस प्रकार शोक कर रही है ? यदि वानर-सेना ऐसी निर्वल है, तो ये इतना बड़ा
कार्य-भार उठाते ही कैसे ? वहाँ देखिए, वानर, बड़ी सावधानी से आपके प्रभु की रक्षा
वंगे कर रहे हैं ? हे भूपुत्री, आप निश्चित रहिए । यदि ऐसा नही होता (यदि राम पर
कोई विपत्ति आनेवाली है), तो वह पुष्पक-विमान पृथ्वी पर गिरे बिना कैसे रहता ?

३०८ रंगनाथ रामायण
(क्योकि, इसका गुण है कि यह विधवाओ का वाहन नही बनता), इसलिए आप राम के
लिए विलाप मत कीजिए । मेरी बात का विश्वास कीजिए । हे कमलमुखी, सूर्य-वंश-तिलक
राम अवश्य ही लंकेश्वर का वध करके लंका पर विजय प्राप्त करेंगे और आपको ग्रहण
करेंगे । हे कल्याणी, अब दुख मत कीजिए । मेरी बातो का विश्वास कीजिए ।' तब
सीता ने सोचा कि कदाचित् माया-सिर के समान यह भी कोई माया होगी और त्रिजटा
की बातो पर विश्वास करके शांत हुई । इसके पश्चात् त्रिजटा ने उन्हें अशोक-वन में पहुँचा
दिया ।
४८. लक्ष्मण के लिए राम का विलाप करना
यहाँ मनुवंशतिलक राम की चेतना लौट आई । पार्श्व में पड़े हुए अपने अनुज को
देखकर उमड़ते हुए शोक से वे कहने लगे—“हे सुग्रीव, मेरे अनुज की ओर देखो, उसकी
कैसी दुर्गति हुई है । हम सीता को खो बैठे । उसे रावण के कारागार से मुक्त नही कर
सके । अब मुझे इसे भी खोना पड रहा है । सौमित्र को खोने के पश्चात् अब मुझे सीता
की ही क्या आवश्यकता है ? अब मेरा जीवित रहना भी किस काम का ? यत्न करूँ,
तो सीता के समान दूसरी पत्नी को मै कदाचित् प्राप्त कर सकूँगा । पृथ्वी पर पत्नियां
मिल सकती हैं, पुत्र प्राप्त हो सकते है, बंधु-बांधव मिल सकते है; किन्तु सहोदर भाई
नही मिल सकता । मै इसे केवल भाई समझकर दुःखी नही होता । यह महाबली सतत
मेरी सेवा में तत्पर रहता है । यह कौसल्या तथा सुमित्रा, इन दोनो की एक समान भक्ति
करता है । सुमित्रा, इससे भी बढकर मुझसे स्नेह करती हैं । ऐसी पुत्र-वत्सला, माता
सुमित्रा को आज मेरे कारण दुख भोगना पड़ रहा है । यदि मै अयोध्या जाऊँ, तो भ्रातृ-
वत्सल भरत तथा शत्रुघ्न पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ हैं ? वे क्यो नही आये ? तो मै अपने
भाइयो से क्या कहूँगा ? मुझे वन से अकेले आते हुए देखकर माताएँ पूछेंगी कि, हे पुत्र,
सौमित्र क्यो नही आया है ? हमारा मन व्याकुल हो रहा है । तो मै उनका क्या प्रत्युत्तर
दे सकूँगा ? मैं कौन-सा मुँह लेकर उनको आश्वासन दूँगा । इस शरीर के साथ मै वहाँ
जाऊँगा भी कैसे ? भले ही हिमाचल फट जाय, सूर्य पृथ्वी पर गिर पडे, पानी स्थिर रह
जाय, समुद्र सूख जाय, हवा की गति बंद हो जाय, अग्नि शीतल हो जाय, लक्ष्मण कभी
मेरी आज्ञा का उल्लघन नही करता । कभी इसने मुझसे अप्रिय बातें नही की । इसका
चित्त मुझ पर एक निष्ठा से केन्द्रित है । इसकी समता करनेवाला भाई और कहाँ मिल
सकता है । यही मेरा प्राण है, और यही मेरा बंधु है । इसे छोड़कर मै अकेले नही रह
सकता । यह जहाँ जायगा, मै भी वही जाऊँगा । यही मेरा संसार है । मै अन्य कोई
संसार नही चाहता । उस दिन सौमित्र मेरे साथ आया था, आज मै सौमित्र के साथ
जाऊँगा । हे पराक्रमी सुग्रीव, तुमने मेरे हित के लिए बहुत-से कार्य किये हैं । अब तुम वालि-
पुत्र को लेकर वानर-सेना के साथ किष्किंधा को लौट जाओ । लक्ष्मण के साथ मेरे चले
जाने के पश्चात्, रावण तुम्हें तंग करेगा । जयशील सौमित्र के बिना, मेरी विजय का भी
वही मूल्य होगा, जो अंधे के लिए चंद्रोदय का मूल्य होता है । मेरे प्रति श्रद्धा रखने के
कारण वायु-पुत्र ने कई अद्भुत कार्य किये हैं, उसने समुद्र लाँघकर जानकी को देखा और

युद्धकांड ३०९
अनेक राक्षसो का संहार किया । यह अगद, यह सुषेण, ये धीमान् द्विविद, मैन्द, ये गवय,
गवाक्ष, गज, ये शक्तिशाली नील, संपाति, केसरी आदि अन्य वानरो ने मेरे लिए महान्
कार्य किये । आज हम पर जो विधि का प्रबल आघात हुआ है, उसे टालना किसी के लिए
संभव नही है । लक्ष्मण ने युद्ध-भूमि में बहुत-से राक्षसो का तृणवत् संहार किया, पर
इस समय शत्रु के तीव्र वाणो से बँधकर, आँखें बंद किये हुए धूलि में लोट रहा है ।
श्रेष्ठ शय्या पर सोनेवाला आज युद्ध-भूमि में, शर-शय्या पर पड़ा हुआ है । विशाल
रविकुल-रूपी समुद्र की ज्वार को शांत करके लक्ष्मण-रूपी कुमुदप्रिय ( चंद्र )
अस्त हो गया है ।"
४९. विभीषण तथा ऋंगद का वानरों को धैर्य देना
इस प्रकार, राम को विलाप करते हुए देखकर सभी वानर शोक-समुद्र में डूब गये
उसी समय मेघनाद फिर से युद्ध करने के लिए आ पहुँचा । अंजन-शैल के सदृश आकार-
वाले उसे देखकर सभी वानर सुध-बुध खोकर संभ्रमित हो रहे । तब विभीषण हाथ में
गदा लिये वानर-सेना के मध्य में घूमते हुए उनको धैर्य देने लगा । फिर उसने रवि-पुत्र
सुग्रीव को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, इस प्रकार तुम शोक क्यो कर रहे हो ? यह युद्ध
का समय है । यह समय शोक में डूबे रहने का नही है ? दुर्निवार तरंगो से पूर्ण समुद्र
के मध्य फँसी हुई नाव के समान हमारी सेना कर्णधार-रहित हो गई है । अब हमारा
कर्त्तव्य है कि हम युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जायँ ।'
इसे सुनकर अगद ने कहा—'तुम्हारा कथन सर्वथा उत्तम है । नाग-पाशो से बँधे
हुए राजकुमार, पृथ्वी पर गिरे हुए है और क्षतो से अविरत बहनेवाली रक्त-धारा के
कारण मूर्च्छित-से पड़े है । तुम लोग इनकी रक्षा सावधानी से करते रहो । उदयाद्रि पर
सूर्य का आगमन होने से पहले, मैं समस्त राक्षसो को जीतकर जानकी को यहाँ ले आऊँगा।
हनुमान् आदि वानरो के साथ जाकर, लंका के दुर्ग के द्वार, दीवार, तोरण आदि को अपनी
मुष्टियो के प्रहार से चूर-चूर कर दूँगा । बंधु-बांधवो के साथ दशकंधर को भस्म
कर दूँगा । समस्त भूत-समूह आज मेरा पराक्रम, मेरा बाहुबल और राम के प्रति मेरी भक्ति
देखेंगे । रघुनाथ का कार्य करने के लिए, चंदन तथा केयूर से अलंकृत मेरी भुजाएँ बड़े
दर्प के साथ फड़क रही है । रावण को जीतकर विभीषण को इस लंका के सिंहासन पर
प्रतिष्ठित करूँगा, ताकि रघुवीर प्रसन्न हो, अन्यथा मैं युद्ध में उस राक्षस के हाथो से
मरकर लक्ष्मण के चरण-चिह्नों का अनुसरण करूँगा ।'
तब सुग्रीव ने अगद को देखकर कहा—'हे पुत्र, तुम अब इन दाशरथियो को शीघ्र
किष्किंधा ले जाओ । मैं इन्द्रजीत तथा रावण को समस्त राक्षसो के साथ मारकर रघुराम
की पत्नी को शीघ्र वहाँ ले आऊँगा ।' सुग्रीव को तथा रामचन्द्र को देखकर सभी वानर
भयभीत हो शोक-समुद्र में डूब गये । तब सुषेण ने सबको देखकर कहा—'हे वानर-
वीरो, इस नाग-पाश से मुक्त होने का मैं एक उपाय जानता हूँ । पूर्वकाल में देवताओ और
असुरो के बीच भीषण संग्राम में सभी देवता इसी प्रकार नाग-पाशों से बँध गये थे । तब
देवताओ ने दिव्य औषधियो से, इन बंधनो से मुक्ति प्राप्त की । वे सभी औषधियाँ क्षीर-

३१० रंगनाथ रामायण
सागर के उस पार द्रोण पर्वत पर मिलती है। हनुमान् को भेजो, तो वह अवश्य उन
औषधियों को ले आयेगा । तुम लोग दुख मत करो ।
५०. नारद का आगमन
उस समय परम योगीन्द्र, पर-तत्त्व-वेत्ता, परम पावन मूर्त्ति तथा परम-वैष्णव नारद
मुनि वहाँ आये । सहस्र सूर्य-सदृश कांति से युक्त उनकी देह पर कृष्ण-मृग-चर्म था ।
उन पर उनका पिंगल वर्ण जटा-समूह ऐसा शोभायमान था, जैसे काले-काले बादलों पर
बिजली हो । उनके ललाट पर ऊर्ध्व-पुण्ड्र था और वे कौपीन-विलसित दण्ड धारण किये
हुए थे । उनकी वीणा से रमणीय नारायण-मंत्र का अनुरणन हो रहा था । उन्होंने अपने
साथी योगीन्द्र-समूह को आकाश में ठहरा दिया और स्वयं बड़े हर्ष से राम के निकट
पहुँचकर बड़े आदर के साथ हाथ जोड़कर उनकी प्रदक्षिणा की और अत्यंत भक्ति के साथ
निवेदन किया—"हे देव, ब्रह्मादि देवताओ ने, क्षीर-सागर में शयन करनेवाले आपके
समक्ष पहुँचकर रावण आदि राक्षसों के सबंध में निवेदन किया, तो उन पर
कृपा करके, उनकी रक्षा करने के निमित्त आप दशरथ के पुत्र होकर जन्मे । अत, आपका
इस प्रकार दुःखी होना उचित नहीं है । आपके नाम-मात्र का स्मरण करने से अज्ञान दूर
हो जाता है । तब आपको अज्ञान छू भी कैसे सकता है ? आप स्वयं विचार करके देखें।
आप स्वयं नारायण हैं, पूर्णज्ञान-निधि हैं, चारु-कौस्तुभ-रत्न विलसित वक्षवाले हैं, सतत
लक्ष्मी के निवास-योग्य विशाल अंगों से विलसित हैं, आदिदेव हैं, सर्वांतर्यामी हैं, वेद-
वेद्य हैं, विश्व-रूप हैं, स्मरण करनेवाले योगीश्वरों के ध्यान में दिखाई पड़नेवाले
सच्चिदानन्द-रूप हैं । यह पृथ्वी ही आपका चरण है, आकाश ही मस्तक है, ब्रह्मा आपका
ललाट है, सूर्य-चन्द्र नेत्र हैं, पवन ही आपका श्वास है, अग्नि ही आपका मुँह है, सरस्वती
जिह्वा है, वेद-राशि आपका दंत-समूह है, गायत्री ही शिखा है, प्रणव ही हृदय है, दिशाएँ
ही कान हैं, महनीय धर्म ही मन है, असंख्य विजयों से संपन्न देवता ही आपकी बाहुएँ हैं;
ब्राह्मण-समूह ही आपका उदर है, मित्र तथा वरुण आपकी जाँघें हैं, अश्विनी-देवता
आपके जानु हैं, और समस्त विश्व आपका रोम-समूह है । हे पृथ्वी-नाथ, वह देखिए, सभी
देवता, किन्नर, यक्ष, गंधर्व आदि आपकी विजय की अभिलाषा करते हुए आकाश में
खड़े हैं । आप अपना भ्रम छोड़ दीजिए, निष्कंटक धीमान् बन जाइए और शीघ्र राक्षसों
का संहार कीजिए । कदाचित् आप संसार को यह दिखाना चाहते हैं कि मानव मोहवश
इच्छा-रूपी पाश में बँध जाय, तो वह इसी प्रकार संसार-सागर को पार नहीं कर सकता ।
अन्यथा हे श्रीराम, आप कैसे नाग-पाशों से बँधने लगे ? आप आदिदेव हैं । आप अपने
निज रूप का स्मरण कीजिए । आपका वाहन तथा आपके पताके का चिह्न गरुड़ यहाँ
आयेगा । उनके आने ही ये सभी नाग-पाश खुल जायेंगे ।” इतना कहकर नारद आशीर्वाद
देकर क्षीर-सागर को चले गये ।
५१. राघवौं का नाग-पाश से मुक्त होना
नारद के वचनों को सुनकर राघव ने अपने आदिदेव होने की बात का विचार
किया और गरुड का स्मरण किया । उनके स्मरण करते ही गरुड़ क्षीर-सागर के उत्तर

युद्धकांड ३११
तट पर से आकाश की ओर उछला । जिस वेग से वह उछला, उस वेग के कारण पृथ्वी
के नीचे रहनेवाला आदिशेष चौंक पड़ा । उसके पखों से उत्पन्न अत्यधिक वायु मे आकाश
आलोदित-सा हो गया और नक्षत्र गिरने लगे । पखों की फडफडाहट के कारण उत्पन्न
ध्वनि से समस्त लोक भयाक्रात-से हो गये और समस्त आकाश धूलि से व्याप्त हो गया ;
उसकी तीव्र गति के कारण शैल-श्रृंग लुढकने लगे और समुद्र आलोडित होने लगा । वह
दस सहस्र सूर्यों की सयुक्त प्रभा के समान दीप्त हो रहा था और प्रभा-समन्वित पक्षो से
युक्त मेरु पर्वत के समान दीख रहा था । इस प्रकार, आकाश-मार्ग से आनेवाले गरुड
को देखकर राम-लक्ष्मण को आबद्ध किये हुए सभी नाग उन्हें छोड़कर चले गये । यथार्थ
तो यह है कि जो कोई उस गरुड का स्मरण करता है, वह सभी प्रकार के वधनों से
मुक्त हो जाता है । फिर, राम स्वय भी यदि चाहते, तो वे अपने वधनों को काट देने में समर्थ थे ।
सुग्रीव आदि वानर आश्चर्य-चकित हो देखते रहे । गरुड ने राम की परिक्रमा की
और राम-ल

३१२
रंगनाथ रामायण

५२. धूम्राक्ष का युद्ध

इस प्रकार कहने के पश्चात् उसने एक मत्त गज के हुंकार की भाँति लंबी साँस
छोड़ी और धूम्राक्ष को आज्ञा दी कि तुम एक विशाल सेना लेकर शीघ्र राम-लक्ष्मण पर
आक्रमण करो । तब दैत्यपति को प्रणाम करके धूम्राक्ष युद्ध के लिए चल पड़ा । उसकी
सेना भी चारो ओर से चली । भेडियो तथा सिंहो के मुखवाले फुर्तीले घोडो से युक्त
उसका रथ, कर्ण-पुटो को विदीर्ण करनेवाली तथा दिशाओ को कंपित करनेवाली भयंकर
ध्वनि करता हुआ तथा अपनी अनुपम दीप्ति फैलाता हुआ निकल पड़ा । भेरी, शख, डका,
आदि विविध वाद्यो का निनाद करते हुए युद्ध के लिए आनेवाले धूम्राक्ष को कई दुःशकुन
दिखाई दिये । तब रथ के आगे जानेवाले राक्षस भयंकर गर्जन करके भयभीत हो निश्चेष्ट-
से हो गये । इस पर भी बिना रुके बड़ी तत्परता दिखाते हुए धूम्राक्ष ने समुद्र के समान
विशाल वानर-सेना पर आक्रमण किया । असुर तथा वानर आकाश का स्पर्श करनेवाले
निनाद करते हुए आपस में जूझ गये । दानव खड्ग फेंकते थे, तो वानर उन पर वृक्षो का
प्रहार करते थे । राक्षस भाले भोकते थे, तो वानर मुष्टियो से आघात करते थे । राक्षस
हठ करके (वानरो पर) घोड़े दौड़ाते थे, तो वानर उन घोड़ो को अपने नखो से चीर
डालते थे । दानव उन पर रथ चलाते थे, तो वानर उनको चूर-चूर कर देते थे । दानव
मत्त गजो को उनसे टकराते थे, तो वानर क्रोध से उन्हें पृथ्वी पर पटक देते थे ।
इस प्रकार, दोनो पक्षो के योद्धाओ में भयंकर युद्ध होने लगा । वानर-वीर यम के
सदृश भयंकर आकार धारण करके असुरो को पैरो से कुचलकर, हाथियो को पृथ्वी पर
रगड़कर मार डालते थे और उन्ही (मृत) हाथियो को असुरो पर फेंककर उनका दर्प-दलन
कर देते थे । फिर, रथो के कूबर पकड़कर उन्हें (रथो को) आकाश में तेजी से घुमाकर
पृथ्वी पर पटक देते थे और उन्ही टूटे हुए रथो को उठाकर राक्षसो पर फेंककर उनको
पृथ्वी पर गिरा देते थे । फिर, वानर घोड़ो के पैरो को पकड़कर ऊपर उठाते और उन्हें
पृथ्वी पर पटककर मार डालते, और उन्ही मरे हुए घोड़ो को राक्षसो पर फेंककर उन्हें
मार डालते थे । शत्रु के पदचर सैनिको पर पद-प्रहार करके उनकी पसलियो को चूर-चूर
करके मार डालते थे और उनके शवो को राक्षस-सेना पर फेंककर उन्हें नीचे गिरा देते थे ।
वे राक्षस-सेना में घुस जाते और अपने भयंकर दाँतो से राक्षस-समूह को काटकर
उन्हें तितर-बितर कर देते, उनके अस्त्रो को तोड देते, कुहनियो से उनके मुखो पर प्रहार
करते, नीचे गिराते और उनके गले घोट देते । फिर, उनके पैरो को दबाकर अपने टखनो
से ऐसा प्रहार करते कि उनकी पसलियाँ चूर-चूर हो जाती । फिर, वे कुछ राक्षसो के
कंठ में अपनी पूँछो को फंदे की तरह डाल देते और उन्हें इस प्रकार कस देते कि बेचारे
राक्षमो की पुतलियाँ घूम जाती और वे जहाँ के तहाँ ढेर हो जाते । इस प्रकार, सारी
युद्ध-भूमि राक्षसो के शवो से ऐसी पट गई कि पता नहीं लगता था कि यह सिर है, यह
आँख हैं, यह मुँह हैं, यह कान है, यह नाक है, यह क्या है, ये हाथ है, यह शरीर है,
यह कमर है, यह जाँघ हैं, यह घुटना है और यह पैर है । मज्जा, मास, भेजा, रक्त,
आँतें, हड्डियाँ, चर्म तथा खोपड़ियो के तो ढेर ही लग गये थे ।

युद्धकांड ३१३
तब धूम्राक्ष ने बड़े उपेक्षा-भाव से उस कपि-सेना पर आक्रमण किया और अपने
प्रताप का प्रदर्शन करते हुए मुद्गरो के प्रहारो से वानरो के सिर विदीर्ण करते हुए, क्रोध
से भाले चलाते हुए, विविध अस्त्रो से भयकर युद्ध करने लगा । उसके भयंकर प्रहारो से
कई वानर-सैनिक रक्त उगलते हुए गिर पड़े । कुछ धैर्य खोकर, उसके प्रहारो से अपने को
बचाकर भागने लगे । यह देखकर हनुमान् ने बड़े क्रोध से एक विशाल पर्वत उस राक्षस
पर फेंका, लेकिन उसने अपनी गदा से उस पर्वत को रोककर अपने को बचा लिया,
किन्तु वह पर्वत उसके रथ पर गिरा और रथ चूर-चूर हो गया । तब पवन-कुमार ने
अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए तरु, शैल तथा पाषाणो के प्रहारो से राक्षसो के सिर
ऐसे चूर-चूर करने लगा, जैसे यम समस्त ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करके चूर-चूर करता हो ।
फिर, वह सिंह-सदृश पराक्रमी हनुमान् एक पर्वत-शृंग को उठाकर धूम्राक्ष की ओर बढ़ा ।
तब उसने 'लो, अब मरो' कहते हुए अपनी गदा हनुमान् के सिर पर चलाई । किन्तु,
हनुमान् ने उस धूम्राक्ष की शक्ति, शौर्य, क्रोध तथा साहस की उपेक्षा करते हुए, भयंकर
गर्जन करके अपने हाथ के उस शैल-शृंग को धूम्राक्ष पर ऐसा फेंका कि उस राक्षस के सिर
के दो टुकड़े हो गये और वह ढेर होकर वही गिर गया । उस समय चारो ओर ऐसी
ध्वनि फैल गई, मानो वज्रपात होने से कई पहाड़ गिर रहे हो । धूम्राक्ष को इस प्रकार
मरे हुए देखकर हतशेष कुटिल राक्षस पवन-पुत्र के प्रताप से भयभीत हो उठे और शीघ्र
ही लंका की ओर भागने लगे । उनके भागते समय पृथ्वी भी काँपने लगी ।
५३. अकंपन का युद्ध
धूम्राक्ष की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण का हृदय क्रोध से जलने लगा । तब
उसने देवताओ को कंपित करने की क्षमता रखनेवाले, दिव्यास्त्र शस्त्रो से संपन्न तथा
दिव्य रथ से विलसित अकंपन नामक राक्षस को, एक बड़ी सेना के साथ वानरो से युद्ध
करने के लिए भेजा । प्रलय-काल के मेघ के समान आकारवाला वह राक्षस अपने आभूषणो
की दीप्ति तथा मणियो की कांति से सूर्य-मंडल के समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्ण-रथ
पर चढ़कर युद्ध के लिए चल पड़ा । उसके रथ की पताका ऐसे फहरने लगी, मानो कह
रही हो कि लो, अब अकंपन युद्ध करने आ गया है । राक्षस-वीरो के भयंकर हुकारो तथा
भेरी, पटह आदिके निनादो के मध्य, अपने साथ असंख्य चतुरंगिणी सेना लिये हुए गगन को
भी भेदनेवाले भयंकर गर्जन करते हुए, उसने वानर-सेना पर आक्रमण किया । दोनो पक्षो
की सेनाएँ आपस में भिड़ गईं और बड़ी भयंकर गति से युद्ध करने लगी । उस घोर
संग्राम के कारण उत्पन्न लाल धूलि सभी दिशाओ तथा आकाश में व्याप्त हो गई और
कपि-सेना तथा असुर-सेना के बीच अंधकार-सा छा गया ।
उस समय कुछ सैनिक तो अपने पक्ष के लोगो को पहचान कर युद्ध करते थे ।
कुछ उनकी बोली तथा चेष्टाओ से उन्हें पराया समझकर युद्ध करते थे और कुछ तो
किसी प्रकार का विचार किये बिना, जो कोई भी सामने पड़ जाता, उससे भयंकर गति से
युद्ध करते जाते थे । वानरो के द्वारा फेंके जानेवाले वृक्ष तथा पर्वत एवं दैत्यो के द्वारा
चलाये जानेवाले भयंकर शस्त्र चारो ओर फैलकर धूलि-रूपी तिमिर समुद्र में जलचरो के
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