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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 508 में से

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पृष्ठ 334

कोई कह रहा था 'छोडो मत, मारो', तो कोई कहता था, 'सिर काट लो, सिर काट लो ।
कोई पूछ रहा था--'कहाँ है ?' तो कोई कहता था--'यहाँ आने दो, यहाँ ।' इस प्रकार,
की विविध ध्वनियो के साथ हुकार तथा अट्टहास की ध्वनि करते हुए जब राक्षस तथा
वानर युद्ध करने लगे, तब सारा आकाश धूलि से व्याप्त हो गया । क्रमश अधकार वढ
जाने मे राक्षस-सैनिक भ्रम से अपने ही पक्ष के लोगो पर अस्त्र चलाकर मार डालते थे ।
वानर भी अत्यधिक क्रोध से उन पापी राक्षसो से जूझकर रथियो को मार डालते थे,
सारथियो को चीर डालते थे, रथ के अश्वो को नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे और रथो को
ऊपर उठाकर पृथ्वी पर ऐसे पटकते थे कि उनके टुकडे-टुकडे हो जाते थे । फिर, वे गजो
पर बैठे योद्धाओ का गर्व तोड़कर, मत्त गजो को पैरो से पकड़कर उन्हें ऊपर उठाकर, नीचे
पटककर मार डालते । तितर-वितर होकर दौडनेवाले अश्वो को पकड़कर ऊपर उठाते,
और उन्हें वेग से घुमाकर नीचे ऐसे पटक देते थे कि खून बहने लगता । पदचर-सैनिको
को ऐसा मारते कि उनकी रीढें, वक्ष, पसलियाँ, भुजाएँ, मुँह, दाँत, सिर तथा भेजा
छिन्न-भिन्न होकर चारो ओर बिखर जाते । रथो के सतत सचलन से उत्पन्न तथा अश्वो
के खुरो से उठी हुई धूलि आकाश की ओर इस प्रकार उड रही थी, मानो राक्षसो के
मन की कालिमा चारो ओर व्याप्त हो गई हो । धूलि के अधकार से मिलकर आकाश
भर में व्याप्त होने से वह रात्रि राक्षसो तथा वानरो के प्राणो को हरनेवाली प्रलय-काल
की रात्रि के समान दीख रही थी ।
अपने लिए रात्रि अनुकूल होने से सभी राक्षसो ने अपने गर्जनो से त्रिकूटाचल को
गुजायमान करते हुए युद्ध-सन्नद्ध होकर एक साथ राम को घेर लिया और उन पर बाण-
वृष्टि करने लगे । तब राम ने अग्नि-बाण चलाकर अधकार को दूर कर दिया और अपने
साथ युद्ध करनेवाले महोदर, महापार्श्व, सारण, शुक, वज्रदत तथा महाकाय पर वडे वेग
से बाण चलाये । उनसे पीडित हो वे छहों भय-त्रस्त राक्षस भाग खड़े हुए । बचे हुए
अन्य राक्षस-सैनिक राम के तीव्र शरो मे नष्ट हो गये ।
४६. इन्द्रजीत का माया-युद्ध
अगद के हाथो ने फेंके हुए गिरि-शृग के कठोर प्रहार से रथ, सारथी तथा अश्वो
को खोकर इंद्रजीत शीघ्र यज्ञ-शाला की ओर गया । राक्षस आवश्यक हवन-सामग्री ले
आये । तब उसने, रक्तवर्ण के अधोवस्त्र, उत्तरीय तथा शिरोवस्त्र तथा पुष्प-मालाएँ पहनी ।
फिर, उसने अग्नि के योग्य परिस्तरण (होमकुड के चारो ओर रखे जानेवाले कुश) के
रूप में भाले, भयंकर शस्त्र तथा शर रखे और क्रमशः काले वकरे के कठ के रक्त तथा
ताल की समिधाओ से होम करने लगा । तब अग्नि, बिना धुआँ छोडे विजय की सूचना
देनेवाली अपनी चचल शिखाओ को व्याप्त करते हुए जलने लगी और इंद्रजीत से प्रस्तुत
आहुतियां को ग्रहण किया । इस प्रकार, इन्द्रजीत ने अत्यत भक्ति से यथाविधि हवन पूरा
किया और अग्निदेव से चार घोडो तथा विविध शस्त्रास्त्रो से युक्त एक स्वर्ण-रथ प्राप्त किया ।
इसके पश्चात् वह उस रथ पर आरूढ होकर, ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले
अपने भयंकर गर्जनो से इन्द्रादि देवताओ को भयभीत करते हुए राक्षस-सेनाओ के पास