रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 327, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकाण्ड २६७
वहाँ सभी राक्षस रावण को देखकर कहने लगे-- 'हे देव, आप इस प्रकार चुप बैठे
रहेंगे, तो कार्य कैसे चलेगा । वह देखिए, राघव कपि-सेना के साथ लंका को घेरे हुए हैं ।
अब आप अपना प्रताप कब दिखायेंगे ? हमें भेजिए । हम युद्ध में राम-लक्ष्मण को जीतकर
आयेंगे ।'
४०. रावण का अपना वैभव प्रदर्शित करना
इन बातों को बड़े चाव से सुनकर रावण ने सोचा कि मैं अपना वैभव रामचन्द्र
को दिखाऊँगा, जिससे सुग्रीव आदि भयभीत हो जायें । इसके पश्चात् उसने उन सभी
वस्तुओं को मँगाया, जिन्हें उसने अपने भयंकर प्रताप के प्रदर्शन से इन्द्र, धनेन्द्र तथा नागेन्द्र
को जीतकर प्राप्त किया था । उसने उज्ज्वल कांतियुक्त पीतांबर धारण किये, चारों ओर
सौरभ विकीर्ण करनेवाले मृगमद, घनसार आदि सुगंध-मिश्रित मनोज्ञ चंदन का लेप किया,
सरस, मंजुल पारिजात-पुष्प-रचित मालाएँ धारण कीं, पद्मराग आदि बहुरत्न-खचित कंकण,
मुद्रिका, केयूर, भुजाभरण, कंठाभरण आदि धारण किये, अपनी मणियों की प्रभा से
गंडस्थलों को दीप्त करनेवाले कुंडल पहने, सूर्य-मंडल के समान उज्ज्वल तथा अपनी
प्रभा से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करनेवाले मुकुट अपने दसों सिरों पर धारण किये,
इन्द्र, अग्नि, यम, नैर्ऋत, वरुण, मरुत्, कुबेर एवं ईशान का दर्प चूर करके, उन पर प्राप्त
विजय की सूचना देनेवाला तोडर अपने पैर में पहना, धनुष बाण, चक्र, परशु, त्रिशूल,
करवाल, पाश, मुद्गर, चंद्रहास आदि बीस आयुध अपने बीसों हाथों में धारण किये, और
परिचारकों के साथ लेकर उत्तर दिशा के बुर्ज की ओर रवाना हुआ । उसके आप्तजन
शूलों से सज्जित हो उसके चारों ओर चलने लगे । भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत होकर
उसके मंत्री उसके दोनों ओर चल रहे थे । कई हजार राक्षस असंख्य स्वर्ण-टोपों से
विलसित अस्सी हजार धवल-छत्र लिये हुए थे । अस्सी हजार कामिनियाँ शेषनाग के फन के
समान दीखनेवाले सुंदर व्यजन (पंखा) लिये हुए चल रही थीं । चंद्र-किरणों के सदृश
दीखनेवाली अस्सी हजार अप्सराएँ दोनों ओर चन्द्रिका की भाँति उज्ज्वल चामर धीरे-धीरे
झुलाती हुई अपने कंकणों का मृदु शिंजन सुना रही थीं । बंदी-मागधों का समूह देवताओं
पर (दानवों की) विजय का स्फूर्तिदायक स्तुति-पाठ कर रहा था । उसके आगे मंद, मध्यम,
उच्च आदि स्वर-भेदों के साथ चंद्रवदनी स्त्रियाँ गीत गा रही थीं । ऐसी ठाट-बाट से
सज्जित हो रावण दुर्ग के उत्तरी बुर्ज पर अपने वैभव का प्रदर्शन करते हुए मणिमय प्रभा-
समन्वित सिंहासन पर आरूढ होकर ऐसा दीख रहा था, मानो पश्चिम पर्वत पर सूर्य-बिंब
दिखाई पड़ रहा हो । राक्षसों के आतपत्रों ने सूर्य को ढक दिया था, इसलिए चारों ओर
अंधकार फैलने लगा ।
उस समय राम माया-मृग के चर्म पर, इन्द्रनील मणि के समान प्रकाशमान अपनी
देह का वाम भाग टेके हुए, वाम-भुजाग्र को अपने कपोल का आधार बनाकर, सूर्य-बिंब के
समान उज्ज्वल सुग्रीव की जाँघों पर, राजसी ठाठ से, अपना अतुल सौंदर्य को प्रकट करते
हुए लेटे थे और अपने प्रिय-भक्त पवन-पुत्र के जाँघों पर पैर पसारकर आराम कर रहे थे ।
पवन-पुत्र उनके चरण कमलों को धीरे-धीरे दबा रहा था । अंगद उनके दक्षिण-हस्त
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