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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 508 में से

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पृष्ठ 343

युद्धकांड ३१३
तब धूम्राक्ष ने बड़े उपेक्षा-भाव से उस कपि-सेना पर आक्रमण किया और अपने
प्रताप का प्रदर्शन करते हुए मुद्गरो के प्रहारो से वानरो के सिर विदीर्ण करते हुए, क्रोध
से भाले चलाते हुए, विविध अस्त्रो से भयकर युद्ध करने लगा । उसके भयंकर प्रहारो से
कई वानर-सैनिक रक्त उगलते हुए गिर पड़े । कुछ धैर्य खोकर, उसके प्रहारो से अपने को
बचाकर भागने लगे । यह देखकर हनुमान् ने बड़े क्रोध से एक विशाल पर्वत उस राक्षस
पर फेंका, लेकिन उसने अपनी गदा से उस पर्वत को रोककर अपने को बचा लिया,
किन्तु वह पर्वत उसके रथ पर गिरा और रथ चूर-चूर हो गया । तब पवन-कुमार ने
अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए तरु, शैल तथा पाषाणो के प्रहारो से राक्षसो के सिर
ऐसे चूर-चूर करने लगा, जैसे यम समस्त ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करके चूर-चूर करता हो ।
फिर, वह सिंह-सदृश पराक्रमी हनुमान् एक पर्वत-शृंग को उठाकर धूम्राक्ष की ओर बढ़ा ।
तब उसने 'लो, अब मरो' कहते हुए अपनी गदा हनुमान् के सिर पर चलाई । किन्तु,
हनुमान् ने उस धूम्राक्ष की शक्ति, शौर्य, क्रोध तथा साहस की उपेक्षा करते हुए, भयंकर
गर्जन करके अपने हाथ के उस शैल-शृंग को धूम्राक्ष पर ऐसा फेंका कि उस राक्षस के सिर
के दो टुकड़े हो गये और वह ढेर होकर वही गिर गया । उस समय चारो ओर ऐसी
ध्वनि फैल गई, मानो वज्रपात होने से कई पहाड़ गिर रहे हो । धूम्राक्ष को इस प्रकार
मरे हुए देखकर हतशेष कुटिल राक्षस पवन-पुत्र के प्रताप से भयभीत हो उठे और शीघ्र
ही लंका की ओर भागने लगे । उनके भागते समय पृथ्वी भी काँपने लगी ।
५३. अकंपन का युद्ध
धूम्राक्ष की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण का हृदय क्रोध से जलने लगा । तब
उसने देवताओ को कंपित करने की क्षमता रखनेवाले, दिव्यास्त्र शस्त्रो से संपन्न तथा
दिव्य रथ से विलसित अकंपन नामक राक्षस को, एक बड़ी सेना के साथ वानरो से युद्ध
करने के लिए भेजा । प्रलय-काल के मेघ के समान आकारवाला वह राक्षस अपने आभूषणो
की दीप्ति तथा मणियो की कांति से सूर्य-मंडल के समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्ण-रथ
पर चढ़कर युद्ध के लिए चल पड़ा । उसके रथ की पताका ऐसे फहरने लगी, मानो कह
रही हो कि लो, अब अकंपन युद्ध करने आ गया है । राक्षस-वीरो के भयंकर हुकारो तथा
भेरी, पटह आदिके निनादो के मध्य, अपने साथ असंख्य चतुरंगिणी सेना लिये हुए गगन को
भी भेदनेवाले भयंकर गर्जन करते हुए, उसने वानर-सेना पर आक्रमण किया । दोनो पक्षो
की सेनाएँ आपस में भिड़ गईं और बड़ी भयंकर गति से युद्ध करने लगी । उस घोर
संग्राम के कारण उत्पन्न लाल धूलि सभी दिशाओ तथा आकाश में व्याप्त हो गई और
कपि-सेना तथा असुर-सेना के बीच अंधकार-सा छा गया ।
उस समय कुछ सैनिक तो अपने पक्ष के लोगो को पहचान कर युद्ध करते थे ।
कुछ उनकी बोली तथा चेष्टाओ से उन्हें पराया समझकर युद्ध करते थे और कुछ तो
किसी प्रकार का विचार किये बिना, जो कोई भी सामने पड़ जाता, उससे भयंकर गति से
युद्ध करते जाते थे । वानरो के द्वारा फेंके जानेवाले वृक्ष तथा पर्वत एवं दैत्यो के द्वारा
चलाये जानेवाले भयंकर शस्त्र चारो ओर फैलकर धूलि-रूपी तिमिर समुद्र में जलचरो के
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