रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड २६६
तथा व्यजनो से रहित हो, केवल दण्डो को अपने हाथो में थामे खडे रहनेवाले उन
असुर-पक्तियो के मध्य रावण सभ्रमित हो, अपना समस्त गर्व खोकर बडी देर तक बैठा रहा,
क्योकि उसे ऐसा लग रहा था, मानो खडे हुए राक्षस उसे ले जाने के लिए आये हुए
यमदूत हो । रघुराम के धनुर्विद्या-कौशल का वार-वार विचार करके उसका सिर
काँपने लगा, और मन-ही-मन वह उनके (राम के) पटुत्व को स्वीकार करने लगा । फिर,
प्रकट रूप से वह रघुराम की प्रशसा करने लगा ।
४२. रावण का राम की धनुर्विद्या की प्रशंसा करना
उसने कहा—'हे श्यामवर्ण रघुराम, हे नयनाभिराम, हे कोदण्ड-दीक्षा-गुरु, हे वीरा-
वतार, हे शर-संधान-कला-निपुण हे श्रेष्ठ चाप के कर्पण में कृपण, हे दृढबाहु, हे विख्यात
मुष्टि-सपन्न, हे विजित शत्रुओ के भाग्य-विधाता, हे विजय-सपन्न, हे श्रेष्ठ मानव-राजकुमार,
हे नव्य-दिव्य-अस्त्र-सपन्न, हे चचल तथा घोर शरो से पूर्ण अक्षय तूणीरधारी, हे वीराग्र-
गण्य, हे विश्वशरण, हे राम भूपाल, तुम्हारे समान इस ससार में और कौन धनुर्धर हो
सकता है ? त्रिपुरो का नाश करने में (निपुण) अकेले एक शिव ही है और वाणो को
चलाने में निपुण तुम एक ही हो ।' इस प्रकार, रावण अपने दसो मुंहो से रामचन्द्र की
प्रशसा करने लगा ।
यह देखकर (उसके) मंत्रियो ने उस दैत्यनाथ से कहा—'हे दैत्य-पुगव, शत्रुता का
विचार किये बिना, कही शत्रु की ऐसी प्रशसा कोई कर सकता है ? यदि आप ऐसी प्रशसा
करेंगे, तो शत्रु तथा मित्र, यह सोचकर कि आप भयभीत हो गये है, आपको उपेक्षा की
दृष्टि से देखेंगे । यह राजनीति नही है।' तब रावण ने हँसकर उनसे कहा—'धनुर्विद्या
की निपुणता, महान् पराक्रम, सौदर्य तथा बाहुबल आदि गुणो में श्रेष्ठ, कोदण्ड-दीक्षा-गुरु,
राम-भूपाल की समता इन तीनो भुवनो में कौन कर सकता है ? हरिहर तथा ब्रह्मा
भी उसकी समता नही कर सकते । क्या, श्रेष्ठ शूरो की महत्ता को स्वीकार नही करनी
चाहिए ?' इस प्रकार, नीति-पूर्ण वचनो को कहने के पश्चात् दनुजेश्वर वहाँ से चला गया।
तब राक्षस-नेताओ ने कटकर गिरे हुए छत्र-चामर आदि को देखकर अत्यत भयविह्वल हो
वहाँ से चले गये और कई प्रकार से राम के पराक्रम तथा शौर्य की प्रशसा करते हुए
कहने लगे—'राघव करुणा-समुद्र है, इसलिए उनके भयकर बाण ने केवल छत्रो को ही
काटा । यदि वे उसी प्रकार और एक बाण चलायें, तो हमारे सिर भी उडने लगेंगे ।'
४३. वानरों का लंका ध्वंस करना
यहाँ पर राघवेन्द्र ने आगे के कार्य के सबध में अच्छी तरह मन-ही-मन विचार
किया और फिर अपने अनुज विभीषण तथा सूर्य-पुत्र आदि आप्त-वर्ग की सम्मति लेकर
शुभ मुहूर्त्त में वानरो को लका पर आक्रमण करने की आज्ञा दी । वानर-सेना उसी क्षण,
भयकर गर्जन करते हुए—'हे देव, हमारा शौर्य देखिए । आपके लिए हम किस प्रकार
प्राण देते है, देखिए ।' यो कहते हुए पर्वतो तथा वृक्षो को कँपाते हुए, करोडो वानरो ने
एक साथ मिलकर लका के दुर्ग को चारो ओर से घेर लिया ।' 'राम की अयत्न जय