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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 508 में से

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पृष्ठ 330

होगी'—ऐसा घोष करते हुए, वानर-वीर अपनी महान् शक्ति को प्रकट करते हुए पर्वतों
तथा वृक्षों को जहाँ-तहाँ से जमा करके परिखा को पाटने लगे । उस समय वे ऐसे दीख
रहे थे, मानो वध्य भूमि पर स्थित वधिक हों ।
तब कुमुद दस करोड़ वानरों की सेना लेकर पूर्व द्वार की ओर गया । बाहुबली
शतबली अस्सी करोड़ की सहायक सेना लेकर आनेवाले राक्षसों के आक्रमण को रोकने के
उद्देश्य से दक्षिण के द्वार पर जाकर ठहर गया । सुषेण दस करोड़ सैनिकों को लेकर
पश्चिम के द्वार पर चला गया । राम, लक्ष्मण, विभीषण तथा सुग्रीव उत्तर के द्वार पर ही
रहे । गज, गवय, गंधमादन तथा शरभ, दुर्ग के चारों ओर बार-बार भ्रमण करते हुए
वानरों को दुर्ग पर चढ़ जाने के लिए उत्साहित कर रहे थे । तब वानर उद्धत गति से
एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए, एक दूसरे को धक्का देते हुए, दुर्ग पर ऐसे चढ़ गये कि,
मालूम नहीं होता था कि कौन बुर्ज है, और कौन कंगूरा । फिर, स्तूपों पर चढ़कर
वे भयंकर गर्जन करते हुए, अपनी पूँछों का फंदा बनाकर पत्थरों को किले के भीतर फेंकने लगे ।
फिर बड़े-बड़े वृक्षों को तने से उखाड़कर बड़े वेग से उन्हें अंदर फेंककर किले के
भीतर स्थित घरों को तोड़ने लगे । फिर उन्होंने भीतर के कितने ही भवनों, मंडपों और
कंगूरों को अपने पादाघात से चूर-चूर कर दिया, बड़े-बड़े पहाड़ों को फेंककर दुर्ग को
गिराने और उसके नीचे दबकर मरनेवाले राक्षसों को देखकर हँसने लगे । वानर, राक्षसों
को ललकारते हुए बड़ी-बड़ी शिलाओं को किले के ऊपर फेंककर उसकी ऊँची दीवारों को
गिरा देते । दुर्ग के वहिर्द्वारों, राक्षसों, उनके आयुधों, पताकाओं, ध्वजाओं तथा छत्रों को
गिरते हुए देखकर वानर-वीर दिशाओं को कंपित करनेवाले भयंकर गर्जन करते और
अत्यधिक मात्सर्य से पुन पर्वतों को लाकर दुर्ग पर फेंकने लगते । उनके कठोर प्रहारों के
कारण लंकापुर की ऊँची अट्टालिकाएँ गिरने लगीं, वीथियाँ नष्ट होने लगीं, दीवारें गिरने
लगीं, ऊँचे सौध टूटकर गिरने लगे, घर चूर-चूर होने लगे, और असंख्य मंदिर नष्ट-भ्रष्ट
हो गये । सारा दृश्य राक्षसों के नाश की सूचना देनेवाले अपशकुन के समान बड़ा भयावह
दीख पड़ता था ।

४४. राक्षसों तथा वानरों का भीषण संग्राम

तब भयभीत हो राक्षस कहने लगे—'हमने ऐसा उत्पात कभी नहीं देखा ।' फिर,
वे विकट अट्टहास करते हुए, भयंकर गर्जन करने लगे । उसके पश्चात् सभी राक्षस एक
साथ एकत्रित हो, बड़े क्रोध से वानरों पर शूल फेंके, खड्ग चलाये, और गदाओं से प्रहार किये ।
वे वानरों के समूह में घुस गये और उनपर प्रहार करने, परशुओं से उन्हें मारने
और भाले चुभोकर उन्हें परिखाओं में गिराने लगे । फिर बड़ी-बड़ी शिला-यंत्रों के द्वारा
गोले फेंककर दुर्ग की दीवारों के ऊपर चढ़नेवाले वानरों को आगे बढ़ने से रोकते तथा
भयंकर गर्जन करते । उनके गर्जनों की ध्वनि तथा कपियों के विकट गर्जनों की ध्वनियों
के कारण पृथ्वी तथा सभी दिशाएँ कंपित हो गईं । व्याकुल होकर दिग्गज चिंघाड़ने लगे ।
भय से कंपित होने से पृथ्वी में दरारें पड़ गईं । अदहन के समान समुद्र का पानी खौलने
लगा । सारा संसार तप्त हो गया और भूत भयभीत हो गये । कुल-पर्वत गोलियों के समान