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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 332

३०२ रंगनाथ रामायण
तब उसने क्रोध में आकर उस राक्षस पर सप्त-पर्ण वृक्ष का ऐसा प्रहार किया, जैसे इन्द्र ने
कुल-पर्वत पर (वज्र से) प्रहार किया था और उस राक्षस के हाथी को गिरा दिया ।
नरांतक ने द्रुत गति से पनस पर तीव्र बाणों की वर्षा की, तो पनस ने भी अपनी भयंकर
शक्ति प्रकट करते हुए उस पर वृक्षों की वर्षा कर दी। अकंपन ने एक बड़े लट्ठ से कुमुद
पर प्रहार किया, तो कुमुद ने झुककर उस प्रहार से अपने को बचा लिया और उस अकंपन पर
मुष्टि का ऐसा प्रहार किया कि अकंपन मूच्छित हो गया । जब धूम्राक्ष ने क्रुद्ध होकर केसरी
पर बाणों की घोर वर्षा की, तब उसने धूम्राक्ष पर पर्वतों की वर्षा की और उसे गिरा दिया।
महापार्श्व ने बड़े रोष से महाबाहुबली गंधमादन पर आक्रमण किया, तो उसने पर्वतों, वृक्षों
तथा अपने दाँतों के प्रयोग से उस राक्षस को पीड़ित किया । शुक ने वेगदर्शी के वक्ष पर
अस्त्र चलाये, तो वेगदर्शी ने अपने दुर्वार विक्रम से उसके रथ को अपने पैरो से कुचलकर
चूर-चूर कर दिया । जब तपन ने नल का सामना किया, तब नले ने अपना शरीर इतना
बढ़ाया कि देखनेवाले संभ्रमित हो गये और फिर विशाल पर्वत को उस राक्षस पर फेंका ।
तपन ने नल पर तेज बाण चलाये, तो नल ने एक ताल-वृक्ष से उस पर प्रहार किया ।
जंबुमाली ने अपनी गुरुतर शक्ति से हनुमान् पर घोर प्रहार किया, तो हनुमान् क्रुद्ध हो
उसके रथ पर कूदा और जंबुमाली के सिर पर अपनी हथेली का ऐसा प्रहार किया कि
उसका सिर फूट गया । मित्रघ्न ने विभीषण पर शरवृष्टि की, तो विभीषण के शरीर से
रक्त के फौव्वारे छूटने लगे । तब उग्र क्रोध से विभीषण ने उस पर गदा चलाई, तो
मित्रघ्न मूच्छित होकर गिर पड़ा । प्रहस्त नामक राक्षस को वानरों को पकड़कर निगलते
देख सुग्रीव की आँखें क्रोध से लाल हो गईं । उसने तुरंत एक सप्त-पर्ण वृक्ष से उस पर
प्रहार किया और उसे गिरा दिया । वज्रमुष्टि नामक राक्षस पर मैन्द ने अपनी मुष्टि से
प्रहार किया, तो वह राक्षस पृथ्वी पर ऐसा गिरा, मानो लंका का बुर्ज ही गिर पड़ा हो ।
अशनिप्रभू नामक राक्षस को द्विविद ने एक पर्वत के प्रहार से ऐसा गिरा दिया कि स्वर्ग
के देवता हर्ष-ध्वनियाँ करने लगे । विशाल बाहुबली निकुंभ ने अपने प्रताप का प्रदर्शन
करते हुए अपने दिव्य अस्त्रों से नील को ऐसा ढक लिया, जैसे काले-काले मेघ सूर्य को
आच्छादित कर लेते हैं । तब नील ने इसकी उपेक्षा करते हुए सहज ही निकुंभ के रथ के
चक्र को निकालकर उसे बड़े वेग से ऐसे चलाया कि सारथी का सिर भूमि पर लोटने लगा
और निकुंभ स्वयं भयाक्रांत होकर देखता रह गया । विरूपाक्ष सौमित्र पर शर-वृष्टि करने
लगा, तो सौमित्र ने उसकी उपेक्षा करके एक ऐसा बाण उस राक्षस पर चलाया कि उसकी
शक्ति जाती रही और वह मूच्छित हो पृथ्वी पर लुढ़क गया । उस समय सप्तघ्न, रश्मिकेतु,
अग्निकेतु तथा कोपाग्निकेतु नामक चार भयंकर प्रतापी राक्षस बार-बार गर्जन तथा धनुष
का घोर टंकार करते हुए उमड़कर आनेवाले मेघों के समान शर-वृष्टि करने लगे । तब
सूर्य-वंश-तिलक राम ने सहज ही चार बाणों से उन चारों राक्षसों के सिर उड़ा दिये ।
४५. युद्ध-भूमि का वर्णन
इस प्रकार घोर द्वंद्व-युद्ध के अविराम गति से चलते रहने से, सारी युद्ध-भूमि में
टूटे हुए असंख्य धनुष, खंडित शर, चूर-चूर हुई गदाएँ, खंडित करवाले, टूटे हुए भाले तथा