रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 342, कुल 508 में से
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रंगनाथ रामायण
५२. धूम्राक्ष का युद्ध
इस प्रकार कहने के पश्चात् उसने एक मत्त गज के हुंकार की भाँति लंबी साँस
छोड़ी और धूम्राक्ष को आज्ञा दी कि तुम एक विशाल सेना लेकर शीघ्र राम-लक्ष्मण पर
आक्रमण करो । तब दैत्यपति को प्रणाम करके धूम्राक्ष युद्ध के लिए चल पड़ा । उसकी
सेना भी चारो ओर से चली । भेडियो तथा सिंहो के मुखवाले फुर्तीले घोडो से युक्त
उसका रथ, कर्ण-पुटो को विदीर्ण करनेवाली तथा दिशाओ को कंपित करनेवाली भयंकर
ध्वनि करता हुआ तथा अपनी अनुपम दीप्ति फैलाता हुआ निकल पड़ा । भेरी, शख, डका,
आदि विविध वाद्यो का निनाद करते हुए युद्ध के लिए आनेवाले धूम्राक्ष को कई दुःशकुन
दिखाई दिये । तब रथ के आगे जानेवाले राक्षस भयंकर गर्जन करके भयभीत हो निश्चेष्ट-
से हो गये । इस पर भी बिना रुके बड़ी तत्परता दिखाते हुए धूम्राक्ष ने समुद्र के समान
विशाल वानर-सेना पर आक्रमण किया । असुर तथा वानर आकाश का स्पर्श करनेवाले
निनाद करते हुए आपस में जूझ गये । दानव खड्ग फेंकते थे, तो वानर उन पर वृक्षो का
प्रहार करते थे । राक्षस भाले भोकते थे, तो वानर मुष्टियो से आघात करते थे । राक्षस
हठ करके (वानरो पर) घोड़े दौड़ाते थे, तो वानर उन घोड़ो को अपने नखो से चीर
डालते थे । दानव उन पर रथ चलाते थे, तो वानर उनको चूर-चूर कर देते थे । दानव
मत्त गजो को उनसे टकराते थे, तो वानर क्रोध से उन्हें पृथ्वी पर पटक देते थे ।
इस प्रकार, दोनो पक्षो के योद्धाओ में भयंकर युद्ध होने लगा । वानर-वीर यम के
सदृश भयंकर आकार धारण करके असुरो को पैरो से कुचलकर, हाथियो को पृथ्वी पर
रगड़कर मार डालते थे और उन्ही (मृत) हाथियो को असुरो पर फेंककर उनका दर्प-दलन
कर देते थे । फिर, रथो के कूबर पकड़कर उन्हें (रथो को) आकाश में तेजी से घुमाकर
पृथ्वी पर पटक देते थे और उन्ही टूटे हुए रथो को उठाकर राक्षसो पर फेंककर उनको
पृथ्वी पर गिरा देते थे । फिर, वानर घोड़ो के पैरो को पकड़कर ऊपर उठाते और उन्हें
पृथ्वी पर पटककर मार डालते, और उन्ही मरे हुए घोड़ो को राक्षसो पर फेंककर उन्हें
मार डालते थे । शत्रु के पदचर सैनिको पर पद-प्रहार करके उनकी पसलियो को चूर-चूर
करके मार डालते थे और उनके शवो को राक्षस-सेना पर फेंककर उन्हें नीचे गिरा देते थे ।
वे राक्षस-सेना में घुस जाते और अपने भयंकर दाँतो से राक्षस-समूह को काटकर
उन्हें तितर-बितर कर देते, उनके अस्त्रो को तोड देते, कुहनियो से उनके मुखो पर प्रहार
करते, नीचे गिराते और उनके गले घोट देते । फिर, उनके पैरो को दबाकर अपने टखनो
से ऐसा प्रहार करते कि उनकी पसलियाँ चूर-चूर हो जाती । फिर, वे कुछ राक्षसो के
कंठ में अपनी पूँछो को फंदे की तरह डाल देते और उन्हें इस प्रकार कस देते कि बेचारे
राक्षमो की पुतलियाँ घूम जाती और वे जहाँ के तहाँ ढेर हो जाते । इस प्रकार, सारी
युद्ध-भूमि राक्षसो के शवो से ऐसी पट गई कि पता नहीं लगता था कि यह सिर है, यह
आँख हैं, यह मुँह हैं, यह कान है, यह नाक है, यह क्या है, ये हाथ है, यह शरीर है,
यह कमर है, यह जाँघ हैं, यह घुटना है और यह पैर है । मज्जा, मास, भेजा, रक्त,
आँतें, हड्डियाँ, चर्म तथा खोपड़ियो के तो ढेर ही लग गये थे ।