रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३०६ रंगनाथ रामायण
ओर से उसके घर आते थे । यह देखकर इन्द्रजीत ने उन दोनों सूर्यवंशियों को नागपाश
से ऐसे बाँध दिया, मानो कह रहा हो कि सर्प के साथ रहना तुम्हारे लिए पहले से ही
सहज रहा है, अब भी उनके साथ ही रहो । राम-लक्ष्मण ने भी (इन्द्रजीत को प्राप्त)
ब्रह्मा के वर का सम्मान करने का निश्चय किया और वे आदिनारायण के वंशज, उस
राक्षस-राजकुमार के द्वारा प्रयुक्त नाग-पाश से बँध गये । 'ये आज राम का रूप धारण
किये हुए हैं, किन्तु विचार कर देखा जाय, तो इन्हीं ने वामन का रूप धारण करके तीन
पग भूमि माँगी थी और कृतघ्न हो बलि को बाँधा था । भला उसका फल, मनुष्य का जन्म
लेने के पश्चात् मिले बिना कैसे रहेगा'—इस प्रकार के लोक-कथन के अनुकूल ही रामचन्द्र
अपने द्वारा उत्पन्न माया से आप बँध गये ।
माया के बंधनों में बँधे हुए राम सुध-बुध सोये-से पड़े रहे । यह देखकर देवता
दिग्भ्रांत हुए और वानर खिन्न हुए । तब दुःखी सुग्रीव को देखकर विभीषण ने कहा—
'हे सुग्रीव, ऐसे क्यों दुःखी हो रहे हो ? चाहे कैसा भी व्यक्ति क्यों न हो, उसके जीवन में
विपत्तियाँ तो आती ही हैं । यदि सूर्यवंशज नाग-पाश से बँधे हुए हैं, तो क्या हुआ ?' यों
कहकर उसने अपनी माया की दृष्टि से रावण के पुत्र को आकाश-वीथी में देखा और जल
को अभिमंत्रित करके उससे राम-लक्ष्मण की आँखों को पोंछकर, उन्हें मेघनाद को दिखाया ।
उसके बाद सुग्रीव ने तुरन्त एक विशाल पर्वत को उखाड़कर इंद्रजीत पर फेंका, किन्तु उसने उसे बीच
में ही खंड-खंड कर दिया और तीव्र शर-वृष्टि से सुग्रीव को ऐसे त्रस्त एवं व्याकुल कर
दिया कि सुग्रीव को समर में पीठ दिखानी पड़ी । जो राक्षस सुग्रीव के प्रताप से भयभीत थे,
वे इसे देखकर बहुत हर्षित हुए । इंद्रजीत इस विजय से अत्यधिक मोद-मग्न हो, अपने
सैनिकों के साथ लंका में वापस चला गया और रावण से कहने लगा—'मैंने सर्प-बाणों से
कपियों का नाश किया और इक्ष्वाकु-वंशजों को व्याकुल कर दिया है ।'
अपने पुत्र की वीरता पर मन-ही-मन हर्षित होते हुए रावण ने शीघ्र ही त्रिजटा
को बुलाकर कहा—'राम को प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास अपने मन में धारण किये रहने
में भूमिसुता मेरा तिरस्कार कर रही है । आज इन्द्रजीत के हाथों में राम की जो दुर्गति
हुई है, उसे सीता को दिखाओ । सीता को शीघ्र पुष्पक-विमान पर बैठाकर ले जाओ और
राम की दशा दिखा लाओ, जिससे वह राम की आशा छोड़कर मुझे स्वीकार करे ।'
४७. नाग-पाशबद्ध दाशरथियों को देख सीता का दुःखी होना
रावण की आज्ञा मानकर त्रिजटा दानवियों के साथ सीता को पुष्पक-विमान पर
बैठाकर ले आई और युद्ध-क्षेत्र में गिरे हुए वानरों तथा राम-लक्ष्मणों को दिखाया । वह
कमल-लोचनी उनकी दशा देखकर अत्यंत दुःखी होकर अविरत अश्रुधारा बहाती हुई विलाप
करने लगी। वे कहने लगी—"हाय राम, आपकी धनुर्विद्या कहाँ लुप्त हो गई ? आपमें ही स्थित हरि
तथा हर आदि देवों को भी भयभीत करनेवाली आपकी बाण-शक्ति आज कैसे नष्ट
हो गई ? इस संसार में आप ही अकेले परशुराम की भी उपेक्षा करने की शक्ति रखते हैं।
सभी मुनि तथा नाग, आपकी सहायता के लिए सतत तत्पर रहते हैं । हाय, ऐसे
नाग आज आपको बाँधनेवाले पाश बन गये हैं ! सामुद्रिकों ने मुझे देखकर कहा था कि