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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 508 में से

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पृष्ठ 325

अपना वानर-रूप छोडकर और कोई भी कपट-रूप धारण नही करना चाहिए । राम की
आज्ञा सिर पर धारण किये हुए सभी वानर लका के चारो ओर बडे वेग से फैल गये ।
पूर्व तथा पश्चिम भागो में विकृत लागूलवाले, विकृत आननवाले, विकृत दाँतोवाले और
विकृत शरीरवाले अनुपम विक्रमी वानर दस योजन तक व्याप्त हो गये और वृक्षो तथा
शैलो की सहायता से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो गये । उनके गर्जन, तर्जन, तथा उनके
हुकार सारी लका में व्याप्त हो ऐसे भय का उत्पादन करने लगे कि दनुज-स्त्रियो के
गर्भ-पात होने लगे । वानर-सेना का यह कोलाहल सुनकर राक्षस-समूह भय से कॉप उठा।
३९ अंगद का दौत्य
अपने मन्त्रियो की सम्मति प्राप्त करने के पश्चात् राम ने अगद को बुलाकर बडे
स्नेह के साथ कहा—'हे अगद तुम हमारा दूत बनकर रावण के पास जाओ और उससे
कहो कि हे रावण, तुमने ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के गर्व के कारण मुनियो तथा देवताओ
को दुख दिया है । राम के समक्ष तुम्हारा कोई वश नही चलेगा । रामचन्द्र तुम पर
आक्रमण करने आये है । जिस शक्ति के मद में आकर तुम सीता को उठा लाये, अब युद्ध
में उस शक्ति का प्रदर्शन करो । राम के बाणो के प्रहार से विचलित हुए बिना, शूर के समान
उनका सामना करो । यदि ऐसा करने में तुम्हें भय हो, तो सीता को लाकर सौंप दो और
सुख से रहो । यही तुम्हारे लिए उचित है । राघव ने कृपा करके विभीषण को लका का
राजा बना दिया । वे अवश्य तुम्हारा संहार करेंगे । उनके संहार करने के पहले ही, अपने
सभी सगे-सबन्धियो को एक बार भली भाँति देख लो, लका की ओर निहारो, अपनी प्रिय
पत्नियो का विचार करो । अपने पुत्र, अनुज तथा सगे-सबन्धियो को युद्ध में मारे जाने से
उन्हें बचाने का उपाय सोचो । इसमें कोई सदेह नही है कि तुम अपने बंधु-मित्रो के साथ
मारे जाओगे, तुममें से एक भी नही बचेगा । मरने के पश्चात् जो कार्य करने के लिए
शेष रह जायेंगे, उन्हें अभी पूरा कर लो । अब यही तुम्हारी स्थिति है ।'
राम के इन वचनो को सुनकर वह श्रेष्ठ वानर, मन-ही-मन हर्षित हो दुष्ट राक्षस-
रूपी वन को भस्म करने के लिए उत्पन्न प्रलय-काल की अग्नि के समान, उस इन्द्र के
शत्रु रावण को मारने के लिए आये हुए मृत्यु-दूत के समान, उड़कर रावण की सभा में
पहुँचा । उसे देखकर राक्षसो ने कहा—'देखो, वह फिर आ गया ।' यो कहते हुए वे
आयुधो से युक्त हो अगद पर आक्रमण करने का उपक्रम करने लगे । तब रावण ने अपना
हाथ उठाकर उनका वर्जन करने हुए कहा—'रुको' । फिर उसने अगद को देखकर कहा—
'कहो, तुम कौन हो ?' अगद ने कहा—'हे रावण, क्या तुम यह नही जानते कि मै
राम का दूत हूँ ।' तब रावण ने कहा—'राम कौन है ?' अगद बोला—'अपने अतुल
पराक्रम से जिसने परशुराम को जीता, वही रणकुशल (व्यक्ति) राम है ।' रावण ने
पूछा—'परशुराम कौन है ?' अगद ने उत्तर दिया—'जिसने उद्धत कार्तवीर्य जैसे वीर को
मारा, वह असमान पराक्रमी परशुराम है ।' तब रावण ने पूछा—'वह कार्तवीर्य कौन है ?'
अगद ने कहा—'क्या तुम नही जानते ? जिसने तुम्हें जीतकर बंदी बनाया था, वही वीर
कार्तवीर्य है ।' फिर, रावण ने पूछा—'तुम किसके पुत्र हो ?' अगद ने उत्तर दिया—