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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 508 में से

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पृष्ठ 339

युद्धकांड ३०९
अनेक राक्षसो का संहार किया । यह अगद, यह सुषेण, ये धीमान् द्विविद, मैन्द, ये गवय,
गवाक्ष, गज, ये शक्तिशाली नील, संपाति, केसरी आदि अन्य वानरो ने मेरे लिए महान्
कार्य किये । आज हम पर जो विधि का प्रबल आघात हुआ है, उसे टालना किसी के लिए
संभव नही है । लक्ष्मण ने युद्ध-भूमि में बहुत-से राक्षसो का तृणवत् संहार किया, पर
इस समय शत्रु के तीव्र वाणो से बँधकर, आँखें बंद किये हुए धूलि में लोट रहा है ।
श्रेष्ठ शय्या पर सोनेवाला आज युद्ध-भूमि में, शर-शय्या पर पड़ा हुआ है । विशाल
रविकुल-रूपी समुद्र की ज्वार को शांत करके लक्ष्मण-रूपी कुमुदप्रिय ( चंद्र )
अस्त हो गया है ।"
४९. विभीषण तथा ऋंगद का वानरों को धैर्य देना
इस प्रकार, राम को विलाप करते हुए देखकर सभी वानर शोक-समुद्र में डूब गये
उसी समय मेघनाद फिर से युद्ध करने के लिए आ पहुँचा । अंजन-शैल के सदृश आकार-
वाले उसे देखकर सभी वानर सुध-बुध खोकर संभ्रमित हो रहे । तब विभीषण हाथ में
गदा लिये वानर-सेना के मध्य में घूमते हुए उनको धैर्य देने लगा । फिर उसने रवि-पुत्र
सुग्रीव को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, इस प्रकार तुम शोक क्यो कर रहे हो ? यह युद्ध
का समय है । यह समय शोक में डूबे रहने का नही है ? दुर्निवार तरंगो से पूर्ण समुद्र
के मध्य फँसी हुई नाव के समान हमारी सेना कर्णधार-रहित हो गई है । अब हमारा
कर्त्तव्य है कि हम युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जायँ ।'
इसे सुनकर अगद ने कहा—'तुम्हारा कथन सर्वथा उत्तम है । नाग-पाशो से बँधे
हुए राजकुमार, पृथ्वी पर गिरे हुए है और क्षतो से अविरत बहनेवाली रक्त-धारा के
कारण मूर्च्छित-से पड़े है । तुम लोग इनकी रक्षा सावधानी से करते रहो । उदयाद्रि पर
सूर्य का आगमन होने से पहले, मैं समस्त राक्षसो को जीतकर जानकी को यहाँ ले आऊँगा।
हनुमान् आदि वानरो के साथ जाकर, लंका के दुर्ग के द्वार, दीवार, तोरण आदि को अपनी
मुष्टियो के प्रहार से चूर-चूर कर दूँगा । बंधु-बांधवो के साथ दशकंधर को भस्म
कर दूँगा । समस्त भूत-समूह आज मेरा पराक्रम, मेरा बाहुबल और राम के प्रति मेरी भक्ति
देखेंगे । रघुनाथ का कार्य करने के लिए, चंदन तथा केयूर से अलंकृत मेरी भुजाएँ बड़े
दर्प के साथ फड़क रही है । रावण को जीतकर विभीषण को इस लंका के सिंहासन पर
प्रतिष्ठित करूँगा, ताकि रघुवीर प्रसन्न हो, अन्यथा मैं युद्ध में उस राक्षस के हाथो से
मरकर लक्ष्मण के चरण-चिह्नों का अनुसरण करूँगा ।'
तब सुग्रीव ने अगद को देखकर कहा—'हे पुत्र, तुम अब इन दाशरथियो को शीघ्र
किष्किंधा ले जाओ । मैं इन्द्रजीत तथा रावण को समस्त राक्षसो के साथ मारकर रघुराम
की पत्नी को शीघ्र वहाँ ले आऊँगा ।' सुग्रीव को तथा रामचन्द्र को देखकर सभी वानर
भयभीत हो शोक-समुद्र में डूब गये । तब सुषेण ने सबको देखकर कहा—'हे वानर-
वीरो, इस नाग-पाश से मुक्त होने का मैं एक उपाय जानता हूँ । पूर्वकाल में देवताओ और
असुरो के बीच भीषण संग्राम में सभी देवता इसी प्रकार नाग-पाशों से बँध गये थे । तब
देवताओ ने दिव्य औषधियो से, इन बंधनो से मुक्ति प्राप्त की । वे सभी औषधियाँ क्षीर-