रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ रंगनाथ रामायण
क्रूर राक्षसो के देखते-देखते राम के पास पहुँच गया और राघव को प्रणाम किया । युद्ध
की धूलि तथा रक्त से पंकिल गात्रवाले सुग्रीव को राम ने बड़े प्रेम के साथ हृदय से लगाया
और स्निग्ध दृष्टियो से देखते हुए कहा—'इन्द्र को परास्त करनेवाले रावण की
शक्ति की अवहेलना करके, ऐसा साहस करना केवल तुम्हें ही शोभा देता है । उसकी वध
करके विभीषण को लका का राजा बनाने की जो प्रतिज्ञा मैंने की है, उसकी रक्षा करने के लिए तुम उसका
वध किये बिना ही लौट आये, यह तुमने बहुत अच्छा किया । मैं तुम पर प्रसन्न हूँ ।
तुम वालि के अनुज हो, तुम उस रावण को अवश्य मार सकते थे, किन्तु उसके वध का
सेहरा, मेरे सिर पर बाँधने, तथा उसे मारने का श्रेय मुझे देने के लिए तुम उसे जीवित
छोड़कर लौट आये ।' तब सुग्रीव ने कहा-- हे देव, उस द्रोही का वैभव देखकर मैं कैसे
चुप रह सकता था ?' सूर्य-पुत्र के इन वचनो को सुनकर राम हर्षित होकर बोले—
'तारको से विलसित तथा दीप्तिमान् रक्त तथा कृष्ण वर्ण के परिवेषण से घिरे हुए
सूर्यमंडल से ज्वालाएँ निकल रही है, बड़े-बड़े जलद राक्षसो का रूप धारण करके रक्त-
वर्षा कर रहे हैं, ऐसा लगता है कि कदाचित् भूकप होनेवाला है । प्रचण्ड वायु के कारण
शैल-शृंग टूटकर गिर रहे हैं और सूर्य के अभिमुख होकर सियार रो रहे हैं । वार-वार
राक्षस-कुल के नाश-सूचक शकुन दिखाई दे रहे हैं । इधर हमारे पक्ष में अगो के फड़कने आदि
के श्रेष्ठ शुभसूचक शकुन दीख रहे हैं । अत, निस्सन्देह हमारी विजय होगी । अब विलब
करना अनुचित है ।'
इसके पश्चात् रामचन्द्र हनुमान् के कंधे पर बैठकर, जाववान्, अगद, सौमित्र, विभीषण
नल आदि महान् पराक्रमी अनुचरो के साथ उस पर्वत से नीचे उतरे । फिर, अनुपम
पराक्रमी रामचंद्र धनुष धारण करके लका की ओर चले । वानर-श्रेष्ठ, उनको मार्ग वताने
हुए आगे-आगे जा रहे थे और पीछे लक्ष्मण आदि चल रहे थे । वानर-सेना उद्धंड वेग
से उनके पीछे-पीछे एक साथ मिलकर जा रही थी । इस प्रकार, सूर्यवंश-तिलक राघव
घोर राक्षस-समूह से सुरक्षित लका के उत्तर द्वार पर जा पहुँचे । यह समाचार सुनते ही
राक्षस संभ्रमित-से हो गये । अविरल बाहुबली नील, द्विविद, मैन्द आदि वीर वानरो के
साथ, विशाल वानर-सेना को लिये हुए पूर्व के द्वार पर जाकर ठहर गया । गज,
गवाक्ष, गवय तथा बाहुबली के साथ वालिपुत्र ने वड़े उत्साह से दक्षिण के द्वार पर पडाव
डाला । अपना विक्रम प्रदर्शित करते हुए, लका-दहन करनेवाले पवन-पुत्र ने सुषेण को
साथ लेकर पश्चिम के द्वार पर घेरा डाला । सूर्य-पुत्र सुग्रीव छत्तीस करोड़ विश्वास-पात्र
तथा महाबलशाली कपि-वीरो के साथ राम के पश्चिम में ठहर गया । शक्तिशाली
भालुओ के साथ अनुपम वली जाववान् ने राम के पूर्व में पड़ाव डाला ।
तदनंतर राम ने लक्ष्मण तथा विभीषण को देखकर कहा—'इनकी (वानर-नायको
की) सहायता के लिए प्रत्येक द्वार पर एक-एक पद्म दुर्वार बलशाली वानर-वीरो की सेना
भेज दो । अनल, नल, हर तथा सपाति के साथ हम तीनो यहीं से शत्रु-राक्षसो से युद्ध
करेंगे । घोर संग्राम के समय में भी हमें यहाँ का और वहाँ का समाचार मिलते रहना
चाहिए । इसके पश्चात् राम ने वानरो को देखकर आज्ञा दी कि तुममें से किसी को