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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 508 में से

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पृष्ठ 340

३१० रंगनाथ रामायण
सागर के उस पार द्रोण पर्वत पर मिलती है। हनुमान् को भेजो, तो वह अवश्य उन
औषधियों को ले आयेगा । तुम लोग दुख मत करो ।
५०. नारद का आगमन
उस समय परम योगीन्द्र, पर-तत्त्व-वेत्ता, परम पावन मूर्त्ति तथा परम-वैष्णव नारद
मुनि वहाँ आये । सहस्र सूर्य-सदृश कांति से युक्त उनकी देह पर कृष्ण-मृग-चर्म था ।
उन पर उनका पिंगल वर्ण जटा-समूह ऐसा शोभायमान था, जैसे काले-काले बादलों पर
बिजली हो । उनके ललाट पर ऊर्ध्व-पुण्ड्र था और वे कौपीन-विलसित दण्ड धारण किये
हुए थे । उनकी वीणा से रमणीय नारायण-मंत्र का अनुरणन हो रहा था । उन्होंने अपने
साथी योगीन्द्र-समूह को आकाश में ठहरा दिया और स्वयं बड़े हर्ष से राम के निकट
पहुँचकर बड़े आदर के साथ हाथ जोड़कर उनकी प्रदक्षिणा की और अत्यंत भक्ति के साथ
निवेदन किया—"हे देव, ब्रह्मादि देवताओ ने, क्षीर-सागर में शयन करनेवाले आपके
समक्ष पहुँचकर रावण आदि राक्षसों के सबंध में निवेदन किया, तो उन पर
कृपा करके, उनकी रक्षा करने के निमित्त आप दशरथ के पुत्र होकर जन्मे । अत, आपका
इस प्रकार दुःखी होना उचित नहीं है । आपके नाम-मात्र का स्मरण करने से अज्ञान दूर
हो जाता है । तब आपको अज्ञान छू भी कैसे सकता है ? आप स्वयं विचार करके देखें।
आप स्वयं नारायण हैं, पूर्णज्ञान-निधि हैं, चारु-कौस्तुभ-रत्न विलसित वक्षवाले हैं, सतत
लक्ष्मी के निवास-योग्य विशाल अंगों से विलसित हैं, आदिदेव हैं, सर्वांतर्यामी हैं, वेद-
वेद्य हैं, विश्व-रूप हैं, स्मरण करनेवाले योगीश्वरों के ध्यान में दिखाई पड़नेवाले
सच्चिदानन्द-रूप हैं । यह पृथ्वी ही आपका चरण है, आकाश ही मस्तक है, ब्रह्मा आपका
ललाट है, सूर्य-चन्द्र नेत्र हैं, पवन ही आपका श्वास है, अग्नि ही आपका मुँह है, सरस्वती
जिह्वा है, वेद-राशि आपका दंत-समूह है, गायत्री ही शिखा है, प्रणव ही हृदय है, दिशाएँ
ही कान हैं, महनीय धर्म ही मन है, असंख्य विजयों से संपन्न देवता ही आपकी बाहुएँ हैं;
ब्राह्मण-समूह ही आपका उदर है, मित्र तथा वरुण आपकी जाँघें हैं, अश्विनी-देवता
आपके जानु हैं, और समस्त विश्व आपका रोम-समूह है । हे पृथ्वी-नाथ, वह देखिए, सभी
देवता, किन्नर, यक्ष, गंधर्व आदि आपकी विजय की अभिलाषा करते हुए आकाश में
खड़े हैं । आप अपना भ्रम छोड़ दीजिए, निष्कंटक धीमान् बन जाइए और शीघ्र राक्षसों
का संहार कीजिए । कदाचित् आप संसार को यह दिखाना चाहते हैं कि मानव मोहवश
इच्छा-रूपी पाश में बँध जाय, तो वह इसी प्रकार संसार-सागर को पार नहीं कर सकता ।
अन्यथा हे श्रीराम, आप कैसे नाग-पाशों से बँधने लगे ? आप आदिदेव हैं । आप अपने
निज रूप का स्मरण कीजिए । आपका वाहन तथा आपके पताके का चिह्न गरुड़ यहाँ
आयेगा । उनके आने ही ये सभी नाग-पाश खुल जायेंगे ।” इतना कहकर नारद आशीर्वाद
देकर क्षीर-सागर को चले गये ।
५१. राघवौं का नाग-पाश से मुक्त होना
नारद के वचनों को सुनकर राघव ने अपने आदिदेव होने की बात का विचार
किया और गरुड का स्मरण किया । उनके स्मरण करते ही गरुड़ क्षीर-सागर के उत्तर