रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०८ रंगनाथ रामायण
(क्योकि, इसका गुण है कि यह विधवाओ का वाहन नही बनता), इसलिए आप राम के
लिए विलाप मत कीजिए । मेरी बात का विश्वास कीजिए । हे कमलमुखी, सूर्य-वंश-तिलक
राम अवश्य ही लंकेश्वर का वध करके लंका पर विजय प्राप्त करेंगे और आपको ग्रहण
करेंगे । हे कल्याणी, अब दुख मत कीजिए । मेरी बातो का विश्वास कीजिए ।' तब
सीता ने सोचा कि कदाचित् माया-सिर के समान यह भी कोई माया होगी और त्रिजटा
की बातो पर विश्वास करके शांत हुई । इसके पश्चात् त्रिजटा ने उन्हें अशोक-वन में पहुँचा
दिया ।
४८. लक्ष्मण के लिए राम का विलाप करना
यहाँ मनुवंशतिलक राम की चेतना लौट आई । पार्श्व में पड़े हुए अपने अनुज को
देखकर उमड़ते हुए शोक से वे कहने लगे—“हे सुग्रीव, मेरे अनुज की ओर देखो, उसकी
कैसी दुर्गति हुई है । हम सीता को खो बैठे । उसे रावण के कारागार से मुक्त नही कर
सके । अब मुझे इसे भी खोना पड रहा है । सौमित्र को खोने के पश्चात् अब मुझे सीता
की ही क्या आवश्यकता है ? अब मेरा जीवित रहना भी किस काम का ? यत्न करूँ,
तो सीता के समान दूसरी पत्नी को मै कदाचित् प्राप्त कर सकूँगा । पृथ्वी पर पत्नियां
मिल सकती हैं, पुत्र प्राप्त हो सकते है, बंधु-बांधव मिल सकते है; किन्तु सहोदर भाई
नही मिल सकता । मै इसे केवल भाई समझकर दुःखी नही होता । यह महाबली सतत
मेरी सेवा में तत्पर रहता है । यह कौसल्या तथा सुमित्रा, इन दोनो की एक समान भक्ति
करता है । सुमित्रा, इससे भी बढकर मुझसे स्नेह करती हैं । ऐसी पुत्र-वत्सला, माता
सुमित्रा को आज मेरे कारण दुख भोगना पड़ रहा है । यदि मै अयोध्या जाऊँ, तो भ्रातृ-
वत्सल भरत तथा शत्रुघ्न पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ हैं ? वे क्यो नही आये ? तो मै अपने
भाइयो से क्या कहूँगा ? मुझे वन से अकेले आते हुए देखकर माताएँ पूछेंगी कि, हे पुत्र,
सौमित्र क्यो नही आया है ? हमारा मन व्याकुल हो रहा है । तो मै उनका क्या प्रत्युत्तर
दे सकूँगा ? मैं कौन-सा मुँह लेकर उनको आश्वासन दूँगा । इस शरीर के साथ मै वहाँ
जाऊँगा भी कैसे ? भले ही हिमाचल फट जाय, सूर्य पृथ्वी पर गिर पडे, पानी स्थिर रह
जाय, समुद्र सूख जाय, हवा की गति बंद हो जाय, अग्नि शीतल हो जाय, लक्ष्मण कभी
मेरी आज्ञा का उल्लघन नही करता । कभी इसने मुझसे अप्रिय बातें नही की । इसका
चित्त मुझ पर एक निष्ठा से केन्द्रित है । इसकी समता करनेवाला भाई और कहाँ मिल
सकता है । यही मेरा प्राण है, और यही मेरा बंधु है । इसे छोड़कर मै अकेले नही रह
सकता । यह जहाँ जायगा, मै भी वही जाऊँगा । यही मेरा संसार है । मै अन्य कोई
संसार नही चाहता । उस दिन सौमित्र मेरे साथ आया था, आज मै सौमित्र के साथ
जाऊँगा । हे पराक्रमी सुग्रीव, तुमने मेरे हित के लिए बहुत-से कार्य किये हैं । अब तुम वालि-
पुत्र को लेकर वानर-सेना के साथ किष्किंधा को लौट जाओ । लक्ष्मण के साथ मेरे चले
जाने के पश्चात्, रावण तुम्हें तंग करेगा । जयशील सौमित्र के बिना, मेरी विजय का भी
वही मूल्य होगा, जो अंधे के लिए चंद्रोदय का मूल्य होता है । मेरे प्रति श्रद्धा रखने के
कारण वायु-पुत्र ने कई अद्भुत कार्य किये हैं, उसने समुद्र लाँघकर जानकी को देखा और