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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 326

२६६ रंगनाथ रामायण
'क्या तुम इतने शीघ्र उस इन्द्र-पुत्र वालि को भूल गये, जिसने तुम्हें समुद्र में डुबो दिया था।
मैं उसी वालि का पुत्र हूँ। मेरा नाम अंगद है। हे असुरेश, तुम युद्ध-भूमि में
मेरे बारे में बहुत कुछ जान जाओगे । क्या, तुम उस काकुत्स्थ-वंशज राम को नहीं जानते,
जिन्होंने मोहित होकर उनके पास जानेवाली शूर्पणखा की नाक और कान काटकर उसके
रक्त में भीगे हुए अपने खड्ग को खर तथा दूषण के अंगों के रक्त में धोया था । तुम
क्यों प्रलाप करते हो ? तुम अब जाओगे कहाँ ? बचोगे कैसे ? गर्वांध हो तीनों लोकों को
झुलसानेवाले तुम्हें राम अवश्य मारेंगे । तुम शूर होकर बिना विचलित हुए उनका सामना
करो, यही उचित है । सुनो, अब लंका पर शासन करना तुम्हारे भाग्य में नहीं है । लंका
का राजा अब विभीषण ही है । तुम इतनी विपत्ति क्यों भोगना चाहते हो ? तुम उदार
मन से सीता को रामचन्द्रजी के पास पहुँचा दो और अपने प्राण बचा लो । अपने से
बलवान् राजाओं से संधि कर लेना इस पृथ्वी पर सभी राजाओं का उचित धर्म है ।'
इन बातों को सुनकर रावण ने क्रुद्ध होकर उस महाबली अंगद को पकड़ने की
आज्ञा दी । कुछ बलवान् राक्षस तुरन्त उसे पकड़ने का प्रयत्न करने लगे । अंगद भी अपनी
शक्ति दिखाने के उद्देश्य से अपने-आप उनके हाथों बंदी बन गया और उसके पश्चात्
अपनी समस्त शक्ति के साथ आकाश की ओर उछलकर ऐसा झटका दिया कि दस सहस्र
राक्षस-वीर नीचे गिरकर चूर-चूर हो गये। इससे संतुष्ट न होकर अंगद ने राक्षसों के उस सभा-
मंडप पर ऐसा पद-प्रहार किया कि वज्रपात से गिरनेवाले हिमाचल के शिखर के समान
वह मंडप टुकड़े-टुकड़े होकर गिर गया । रावण ने फिर से राक्षसों को आज्ञा दी कि
छोड़ो मत, अंगद को अवश्य पकड़ लो । तब राक्षसों ने आकाश की ओर उड़कर अंगद
पर परशु, शूल, करवाल, गदा आदि कई आयुधों का प्रहार करके उसे पीड़ित करने लगे ।
तब अंगद ने अपने मुक्कों से उन राक्षसों पर ऐसा प्रहार किया कि उनकी आँतें निकल
आईं और वे पृथ्वी पर गिर पड़े । तब खर के पुत्र सूकर ने अंगद को देखकर कहा—'ठहरो अंगद,
अब तुम कहाँ जा सकते हो ?' इस प्रकार, घोर गर्जन करते हुए उसने अपना धनुष उठाया
और पाँच तेज बाण अंगद के मस्तक पर चलाये और उसकी बाहुओं पर दस बाण चलाये ।
इससे क्रुद्ध होकर अंगद ने उस असुर पर अपनी मुष्टि से ऐसा प्रहार किया कि उसके
सिर के कई टुकड़े हो गये और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । यह देखकर सभी राक्षस
भय से छटपटाने लगे और रावण भी बड़ी चिंता में पड़ गया ।
तारा-पुत्र अंगद शीघ्र राम के पास पहुँचा, और प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा—
'हे देव, आपकी आज्ञा के अनुसार मैंने रावण के पास जाकर उसे सारी बातें समझाईं ।
किन्तु, उसने मेरी बातों की अवहेलना कर दी । हे राजन्, आपने नीति के अनुसार उसे
समझाने की चेष्टा की है, किन्तु वह तो आपके बाणों को अपने प्राणों की आहुति
देना चाहता है । वह मरने का दृढ़ निश्चय किये बैठा है । उसका अंत आसन्न है, इसलिए
हे देव, आप युद्ध में उस दशकंठ का वध कर डालिए । हे अनघ, आप (रावण को मार
कर) देवताओं को प्रसन्न कीजिए ।' इस प्रकार उसने लंका में घटी हुई सभी बातों का
वर्णन करके राम को सुनाया। अंगद की शक्ति का परिचय प्राप्त करके राम भी हर्षित हुए।