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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

३९४ रंगनाथ रामायण
समान दीखते थे । राक्षसो तथा वानरो के बड़े उत्साह से युद्ध करते समय, सैनिको के
शरीरो से उमड़नेवाली रक्त-धाराओ के कारण सारी पृथ्वी की धूलि सिंच गई । युद्ध
में वानरो का युद्ध, दुस्सह होते देखकर अकंपन अग्नि के समान क्रुद्ध हुआ । तब धनुष
पर प्रत्यंचा चढ़ाकर बड़े उत्साह से उस महावली ने अपने सारथी से कहा—'वानर-सेना वृक्षो तथा
पर्वतो की सहायता से राक्षस-समूह को नष्ट कर रही है । शीघ्र ही मेरा रथ उनकी ओर ले चलो ।'
उसका सारथी रथ को उसी ओर ले गया । अकंपन ने उस वानर-सेना पर अपने
तीक्ष्ण बाणो की वृष्टि-सी कर दी, तो सभी वानर धैर्य खोकर निश्चेष्ट-से हो गये । तब
हनुमान् ने बड़े साहस के साथ उस राक्षस का सामना किया । तब उसके साथ वानरो ने
भी दानव-सेना पर आक्रमण किया । अकंपन अपनी अद्वितीय वीरता का परिचय देते हुए,
भयंकर गर्जन-रूपी निर्घोष करते हुए, मेरु पर्वत के समान आकारवाले पवन-पुत्र पर प्रलय-
काल के मेघ की भाँति शर-वृष्टि करने लगा । किन्तु हनुमान् ने उनकी उपेक्षा करके अट्टहास
किया और प्रलय-काल के रुद्र के समान अपनी क्रुद्ध दृष्टियो से रौद्र रस उगलते हुए, निर्भय
हो एक विशाल पर्वत को समूल उखाड़कर उसे अकंपन पर ऐसा फेंका, जैसे इन्द्र ने नमुचि
पर वज्र गिरा दिया था; पर उस दानव ने उस पहाड़ को अर्द्ध-चन्द्रास्त्र से चूर-चूर
कर दिया । तब हनुमान् और भी उद्धत हो, अपनी महनीय शक्ति को प्रकट करते हुए
तथा आँखो से स्फुलिंगो को गिराते हुए शीघ्रता से एक दूसरा पर्वत उखाड़कर ले आया
और भयंकर गर्जन करके उसे बड़ी क्रूरता से उस राक्षस पर फेंका । किन्तु, राक्षस ने शीघ्र
ही उस पर्वत के टुकड़े-टुकड़े कर दिये । इस पर मारुति और भी क्रुद्ध हो उठा और बड़े
वेग से एक पर्वताकार वृक्ष को उखाड़ा और अपने पैरो के आघात से पृथ्वी को कँपाते
हुए स्फुलिंगो से युक्त आँखो से उस वृक्ष को घुमाकर अन्य वृक्षो को तोड़ते हुए दैत्य-समूह
पर पिल पड़ा । उसने रथियो को मार डाला, रथो तथा उसके अश्वो को मिट्टी में मिला
दिया, तथा राक्षसो का संहार कर दिया । फिर हाथियो के समूह पर आक्रमण करके,
उनके दाँतो, हड्डियो, उनके कुंभो पर बैठे महावतो, उनके अंकुशो, उनकी घंटियो तथा आभूषणो
आदि को चूर-चूर करके एक पिंड-जैसा बना दिया और कुछ हाथियो को चूर-चूर
करके मिट्टी में मिला दिया । उसके पश्चात् उसने घुड़सवारो के साथ घोड़ो को मार
डाला और पदचर सेना को दल दिया । यम के समान अत्यधिक भयंकर गति से युद्ध
करनेवाले हनुमान् को देखकर अकंपन मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध हुआ । उसने एक साथ
चौदह तीव्र बाणो को चलाकर (हनुमान् के) हाथ में रहनेवाले अश्वकर्ण वृक्ष के टुकड़े-
टुकड़े कर दिये और अत्यंत हर्ष से सिंहनाद किया । हनुमान् के शरीर से रक्त-धाराएँ
छूटने लगी और तब वह पुष्पित अशोक के समान दीखने लगा । फिर, हनुमान् ने सहज ही
एक और वृक्ष को उखाड़ लिया और उससे अकंपन के सिर पर प्रहार किया । उस राक्षस
का सिर विदीर्ण हो गया और उसने एक पर्वत के समान पृथ्वी पर गिरकर अपने प्राण
छोड़ दिये । उसके गिरते ही वानरो के तीक्ष्ण प्रहारो को सहना असंभव जानकर तथा
हनुमान् को समक्ष देखकर सभी राक्षस-वीर भयभीत हो गये और प्राण लेकर लंका की
ओर भाग गये । सभी वानर-वीर हनुमान् के साहस की प्रशंसा करने लगे ।

युद्धकांड ३१५

५४. महाकाय का युद्ध

शत्रुओ के हाथ में अकंपन को मरा हुआ जानकर दशकंठ बहुत खिन्न हुआ और
उसने महाकाय को बुलाकर कहा- 'अपने शौर्य को प्रकट करते हुए नरो तथा वानरो का
सहार करो।' तब वह पराक्रमी शीघ्र युद्ध की सज्जा से सज्जित हो, रमणीय मयूर-ध्वजा
से अलंकृत, मणियो की प्रभा से विलसित शस्त्रास्त्रो से परिपूर्ण तथा पिशाच-मुखवाले गधे
जुते हुए रथ पर बैठकर, दक्षिण द्वार से बडे वेग के साथ निकला। उसके साथ ही विविध
शस्त्रास्त्रो से युक्त उसकी सेना, भेरी, डका तथा तुरहियो का गभीर शब्द करती हुई चलने लगी।
उस समय उनपर हड्डियो की वर्षा हुई, बिजलियाँ गिरी, छत्र तथा ध्वजाएँ टूटकर
गिर पडी । किन्तु, महाकाय इन अपशकुनो की उपेक्षा करते हुए आगे बढा और बडी क्रूरता
से वानर-सेना पर आक्रमण किया। तब वानर भी उन पर तरु-शैल-समूह की वर्षा करने
हुए उनसे भिड गये ।
दानव उस वानर-सेना पर अपना पराक्रम दिखाने लगे । उन्होने अत्यत चंचल गति
से कपि-सेना के मध्य रथ चलाये, गज-समूह को वानर-सेना से टकरा दिया, अश्वो को
उनके ऊपर चलाया और पदाति-सेना उनपर टूट पडी । फिर, उन्होने वानर-सैनिको को
अपने करवालो से काटते हुए गदा के प्रहारो से उन्हें व्याकुल करते हुए, भालो से बेधते
हुए, शूलो से चीरते हुए, लाठियो से पीटते हुए, वरछियो से भोकते हुए, शरवृष्टि करते
हुए, चक्रो को चलाते हुए, परशुओ से काटते हुए अत्यत क्रोध के साथ अपने मुद्गरो के
प्रहार से वानरो को दण्ड देने लगे । इधर वानर भी उन वीर राक्षसो पर शैल-वृक्षो की
वर्षा करने लगे । उस घोर युद्ध के कारण धूलि उडकर रवि-मडल तक व्याप्त हो गई।
उस धूलि के कारण अविरत युद्ध करनेवाली दोनो पक्षो की सेनाएँ एक दूसरे को नहीं
देख पाती थी । भयकर राक्षस लगातार अपने ऊपर गिरनेवाले तरु-शैलो को लक्ष्य करके
असख्य बाण चलाकर आकाश को ढक देते थे । वानर-वीर राक्षसो के चलाये हुए शस्त्र,
वाण तथा लाठियो को अपनी ओर आते देखकर उनको लक्ष्य करके, पर्वतो तथा वृक्षो को
फेंकते थे । युद्ध-भूमि में उडनेवाली धूलि उनके कर्णपुटो में भी भर गई थी और उनको
इसका पता नहीं चलता था कि कौन राक्षस है, और कौन वानर है । जो कोई उनके
समक्ष पड जाता था, वे उस पर प्रहार करके उसको मार डालते थे । दनुजो के शरीर से
बहनेवाले रक्त, नदियो के समान बहकर धूलि को भिगो देता था । धूलि-जनित अंधकार
को व्याप्त रहने पर भी दानवो को अपने दीप्त तेज से युद्ध करते देखकर, देवता भी आश्चर्य-
चकित हो गये । तब दैत्यो के प्रताप से नष्ट-भ्रष्ट हो वानर भयभीत हो गये और युद्ध-
भूमि से भागने लगे ।
उन्हें भागते हुए देखकर अगद ने कहा- 'हे कपियो, मेरे रहने हुए तुम ऐसे क्यो
भागे जा रहे हो ?' इस प्रकार के उत्साहपूर्ण वचनो से अगद ने उनको धैर्य देकर फिर
उन्हें युद्ध में प्रवृत्त किया । वह स्वय एक महापर्वत को उठाकर राक्षस-सेना पर आक्रमण
करने लगा । उसके पीछे भयंकर गर्जन करते हुए वानर-वीर भी चल पड़े । अगद ने क्रुद्ध
होकर पर्वतो तथा वृक्षो को राक्षसो की सेना पर फेंका । वह बायें हाथ से राक्षसो को

३१६ रंगनाथ रामायण
नीचे गिराकर उन पर मुष्टियों से प्रहार करता, हाथों से पीटता, कुहनियों से उनके मुँह
पर प्रहार करके फोड़ देता और उनके शस्त्रास्त्रों को चूर-चूर कर देता । अंगद के सामने
क्रूर राक्षस टिक न सके । वे विवश हो चारों दिशाओं में भागने लगे ।
५५. अंगद के द्वारा महाकाय का संहार
इस प्रकार, भागनेवाले राक्षसों को मतिमान् रुधिराशन, वज्रनाभ, कालदंष्ट्र, काल-
कल्प, वपाक्ष, शतमाय, धूम्र तथा दुर्धर नामक महाकाय के प्रख्यात मंत्रियों ने रोका, और
अपने समस्त पराक्रम को प्रकट करते हुए वानर-सेना को पीड़ित करने लगे । यह देखकर
पनस, मेघपुष्पक, गवाक्ष, ऋषभ, गज, क्रोधन, शतवली तथा तार नामक श्रेष्ठ वानर उन
राक्षस-वीरों के सम्मुख आकर युद्ध करने लगे । उस समय रुधिराशन ने क्रोधोन्मत्त हो
गवाक्ष पर असंख्य बाण चलाये, तो गवाक्ष ने बड़े वेग से वृक्ष तथा पर्वतों को उस पर
फेंका; पर रुधिराशन ने उन्हें बीच में ही चूर-चूर कर दिया और गवा

युद्धकांड ३९७
उस राक्षस के जबड़े पर ऐसा घूसा मारा कि वह राक्षस छटपटाकर गिर पड़ा, उसके दाँत
टूट गये और रक्त उगलते हुए वह मर गया। सभी राक्षस आश्चर्य-चकित हो गये ।
इसके पश्चात् वपाश नामक राक्षस ने कपियो पर आक्रमण किया और उनको
जर्जरित करने लगा । तब गज ने उस पर ऐसी बाण-वृष्टि की कि सारा आकाश बाणो से
आच्छादित हो गया । किन्तु, वपाश ने उन सब बाणो को बीच में ही काट डाला और
गज का वध करने के लिए अग्नि-सम सात बाण उस पर चलाये और इससे सन्तुष्ट न होकर
फिर उस पर पच्चीस बाण चलाये और उसके पश्चात् एक सौ ऐसे बाण चलाये, जो उसके
शरीर को पार कर गये । उन बाणो से गज अत्यधिक पीडित हुआ और वपाश के रथ
को चूर-चूर करते हुए उस पर आक्रमण किया और गरुड पक्षी जिस प्रकार किसी कंगूरे
को नीचे गिरा देता है, वैसे ही उसका सिर धड से नीचे गिरा दिया । इस पर क्रुद्ध
होकर धूम्र तथा दुर्धर नामक राक्षसो ने भयंकर अस्त्रो के प्रयोग से वानरो को पीडित करते
हुए उनके पैर उखाड दिये। तब क्रोधन तथा मेघपुष्प नामक वीर वानरो ने उनके रथो
पर कूदकर अपने करतलो से उनके मस्तक पर प्रहार किया और युद्ध करके उन्हें मार डाला ।
उनको आहत देखकर सभी राक्षस भयभीत हो तुरत भाग खड़े हुए ।
इस प्रकार राक्षसो को भागते हुए देखकर शतमाय अपनी शक्ति का प्रदर्शन
करते हुए गज से भिड गया । तब गज ने एक लट्ठ लेकर उसका सामना किया । इतने में
बडे वेग से ऋषभ, शतवली, पनस, गवाक्ष तथा अगद एक साथ उस पर वृक्षो तथा पर्वतो
की अविरत वृष्टि करने लगे, किन्तु शतमाय ने शर, तोमर, भाले, चक्र, गदा,
खड्ग आदि श्रेष्ठ शस्त्रो की वर्षा करके वीरो को क्रूर गति से त्रस्त कर दिया । उसके
हाथो से यो पीडित होकर वानर-नायक रोषोद्दीप्त हो शतमाय पर पिल पडे । गवाक्ष ने
उसके रथ के घोड़ो को मार डाला, अगद ने उसका झडा काट डाला, पनस ने उसके
रथ को पैरो तले कुचल डाला, ऋषभ ने सारथी को मार डाला और नल ने उसके शस्त्रास्त्रो
को काट डाला और शतवली ने अपनी मुष्टियो से उस पर प्रहार किया । किन्तु,
शतमाय ने उन मुष्टि के आघातो की उपेक्षा करके तलवार और ढाल लेकर गरुड के
समान बडे लाघव से आकाश की ओर उछला । तब बडी तत्परता के साथ (युद्ध-भूमि में)
पडे हुए खड्ग, ढाल आदि लेकर शतवली भी उसके पीछे आकाश की ओर उछला ।
आकाश में वे दोनो भेरुड पक्षियो (दो सिरवाले पक्षी) के समान एक दूसरे पर वार
करने लगे । वे कभी पैंतरें बदलते, कभी निकट आते, फिर शीघ्र ही दूर हट जाते; कभी
गिरते तो कभी उठते और एक दूसरे को गिराने की चेष्टा करते हुए लडने लगे । तब
शतमाय ने अपने खड्ग को चमकाकर शतवली के विशाल वक्ष पर प्रहार किया, किन्तु
शतवली ने अपनी ढाल को आगे करके उस वार से अपने को बचा लिया और अपने
तीक्ष्ण कृपाण से शतमाय की जाँघो को काट डाला, तो वह राक्षस सिर के बल पृथ्वी पर
गिर पड़ा और उसका सिर पर्वत-शिखर के समान छिन्न-भिन्न होकर छितरा गया ।
शतमाय की मृत्यु को देखकर शतवली के साथ सभी वानरो ने हर्ष का गभीर
निनाद किया ।

३९८ रंगनाथ रामायण
तब महानाद ने अपने धनुष के टंकार से पृथ्वी तथा आकाश को कँपाते हुए अपना
रथ अंगद की ओर दौड़ाया और अंगद पर तीन पैने बाण चलाये । तब कपिराज अंगद
बड़े क्रोध से उससे भिड़ गया और एक योजनाकार पर्वत को उसके रथ पर फेंका । किन्तु,
उस राक्षस ने बड़े वेग से अपनी गदा से उस पर्वत को बीच में ही चूर-चूर कर दिया ।
तब वालि-पुत्र क्रुद्ध होकर सहज ही उसके रथ-पर कूद गया और अपनी अनुपम शक्ति से
उसका धनुष तोड़ डाला, उसे रथ पर गिराकर उसके वक्ष को ऐसे दबाया कि उसकी
आँखें निकल आईं और वह हाँफने लगा । फिर, अंगद ने उसके कंठ को मरोड़कर उसे
काट डाला और रक्त-सिक्त मुंड को पृथ्वी पर गिरा दिया ।
अपने अनुज को मृत देखकर महाकाय अपार शोक से पीड़ित हो, भयंकर ध्वनि से
हाहाकार करते हुए, अपनी कांति-किरणों को चारों ओर विकीर्ण करनेवाले अपने महान् रथ
पर बैठे उद्धत सिंह के समान झूमते हुए निकला । उसने क्रूर बाण चलाते हुए वानरों पर आक्रमण
किया और कई वानरों को पृथ्वी पर गिरा दिया । उसके समक्ष खड़े रहने में असमर्थ हो
वानर-सेना हनुमान् की ओट में चली गई । तब महाकाय ने अपने सारथी से कहा—
'अब मेरे समक्ष खड़े होकर युद्ध करने की क्षमता रखनेवाला कोई नहीं है । तुम रथ को
सीधे राम के निकट ले चलो ।' तब उसने घोड़ों के रास ढीले किये और वेग से रथ
को राम की ओर चलाया । रथ की क्रूर गति के समक्ष खड़े होने में असमर्थ हो वानर-
सेना भागने लगी । तब महाकाय ऊँचे स्वर में कहने लगा—'हे वानरो, तुम क्यों भयभीत
हो रहे हो ? मेरा क्रोध केवल उस राजकुमार पर है, जिसने शिव-धनुष का भंग करके
सीता के साथ विवाह किया है । जिसने परशुराम का गर्व-भंग किया है, वही मेरे जोड़
का है, अन्य कोई नहीं । जिसने युद्ध में खर का वध किया था, उसी पर मेरा बाण
चलेगा, दूसरों पर नहीं । जिसने अपने बाण के अग्र भाग के समक्ष समुद्र को आने के
लिए विवश किया था, केवल उसीसे मैं युद्ध करूँगा, दूसरों से नहीं । मैं त्रिभुवन को
अपने शौर्य से दीप्त करनेवाले, कैलास पर्वत को उठानेवाले रावण का पुत्र हूँ, इन्द्रजीत
का भाई हूँ, मेरा नाम महाकाय है । मैं अब युद्ध करने के निमित्त आया हूँ ।'
तब अंगद ने अत्यंत क्रुद्ध होकर कहा—'हे महाकाय, युद्ध-भूमि में ऐसा प्रलाप
क्यों कर रहे हो ? तुम्हारे पिता ने कैलास पर्वत को उठाया था, इसलिए हम दोनों में
युद्ध होना उचित है । इसके लिए न राम की आवश्यकता है, न अन्य कपि-वीरों की ।
इतना कहकर उसने एक विशाल वृक्ष से उस पर प्रहार किया, तो महाकाय ने अपने दारुण
शरों से अंगद का शरीर ढँक-सा दिया । इसके पश्चात् महाकाय ने बड़े क्रोध से अंगद पर
अपनी गदा से प्रहार किया, तो अंगद विवश होकर गिर पड़ा । उनको गिरते हुए देखकर
सभी दैत्यों ने समस्त पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए सिंहनाद किया और सभी वानर-वीरों ने
एक साथ महाकाय पर आक्रमण किया और उस पर शिलायो तथा वृक्षों को फेंकने लगे;
किन्तु महाकाय ने अपने बाणों से उन शिलाओं तथा वृक्षों को खंडित कर दिया । फिर,
उसने गवाक्ष पर दस बाण, पृथु पर पाँच बाण, महाबली गज पर नौ बाण, शतबली पर तीन
बाण, ऋषभ पर अस्सी बाण, शोधन और मेघपुष्पक पर साठ बाण चलाकर उनका दर्प-दलन किया ।

इतने में मूर्च्छित अंगद ने आँखें खोलीं । अपने मुँह से बहनेवाले रक्त को वार-
वार पोंछते हुए, एक विशाल गदा लिये हुए वह उस महाकाय के रथ पर कूद पड़ा और
अपनी उद्दण्ड शक्ति को प्रकट करते हुए उसके सारथी को मार डाला । फिर, उसके धनुष
के खण्ड-खण्ड कर दिये, सभी अश्वों को मार गिराया और उसके पश्चात् उस राक्षस-वीर
पर गदा का ऐसा प्रहार किया कि महाकाय का मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगा । तब
महाकाय भी रथ से नीचे उतरकर भयंकर गदा से अंगद पर प्रहार किया; किन्तु अंगद ने
प्रतिघात किया । महाकाय ने अंगद का वार बचाकर उद्धत गति से अंगद के सिर पर
गदा-दण्ड से प्रहार किया । उस प्रहार के कारण अंगद के सिर से रक्त फूट निकला ।
किन्तु, अंगद ने बिना धैर्य खोये, अपनी गदा से महाकाय पर ऐसा प्रहार किया कि महाकाय
का सिर फूट गया । तब भी महाकाय ने भयंकर आघात करके उसे रक्त की बाढ में
ऐसा डुबोया, मानो उसने सोच लिया कि इसके पिता ने मेरे पिता को एक सहस्र
वार समुद्र में डुबोया था और उसका प्रतिशोध मुझे लेना चाहिए । इस प्रकार, इन्द्र का
पोता तथा महाकाय दोनों भयंकर युद्ध करते हुए रक्त-सिक्त होकर ऐसे दीखने लगे, मानो
रक्त-वर्ण की नदियों से विलसित दो महापर्वत हों । दोनों की गदाओं के आपस में
टकराकर छिन्न-भिन्न होने से, वे दोनों वीर इस प्रकार मल्लयुद्ध करने लगे, जैसे पूर्वकाल में
इन्द्र तथा बल नामक राक्षस ने आपस में द्वंद्व-युद्ध किया था । उनके पदाघात से धूलि
उड़-उड़कर आकाश में व्याप्त हो गई । वे वालि-सुग्रीव के द्वंद्व-युद्ध का स्मरण दिलाते हुए
परस्पर ऐसे भिट गये थे कि मालूम नहीं होता था कि यह वानर है, और यह राक्षस है ।
तब सभी वानर अंगद को उत्साह देते हुए कहने लगे—'हे वीर, इस दुष्ट राक्षस
की उपेक्षा क्यों करते हो ? तुम वालि के पुत्र हो । वालि के समान तुम्हारा बाहुबल भी
श्रेष्ठ है । जब वालि ने दुन्दुभी से युद्ध किया था, तब उसने दुंदुभी को इतनी देर तक
ठहरने नहीं दिया था । तुम अपने पराक्रम का प्रदर्शन करके इस देवताओं के शत्रु का
संहार शीघ्र कर डालो ।' इस प्रकार, जब वानरों ने उत्साहवर्द्धक जय-निनाद किया, तब
अंगद ने उस राक्षस पर अपनी मुष्टि से तीव्र प्रहार किया । वह उस आघात से चकराकर
पृथ्वी पर गिर पड़ा । पृथ्वी पर गिरे हुए उस राक्षस के वक्ष को पैरों से दबाकर अंगद ने
उसका कंठ मरोड़कर सिर को धड़ से अलग कर दिया और उसे ऊपर उछालकर विजय-
गर्जन किया । अंगद को देखकर सभी वानरों ने विपुल हर्ष-नाद किया । यह देखकर सभी
दानव तितर-बितर हो गये । कुछ समुद्र में कूद पड़े, कुछ लंका में घुस गये और शेष
राक्षस चारों दिशाओं में भाग गये । सभी वानरों ने अंगद की प्रशंसा की और उसे सीता-
पति के समक्ष ले जाकर सारा वृत्तांत उन्हें कह सुनाया । रघुपति यह समाचार सुनकर
अत्यंत प्रसन्न हुए और बड़े हर्ष से हृदय से लगाकर और कृपा-पूर्ण दृष्टि से देखकर मंदहास
करने लगे ।
हतशेष राक्षसों ने जब यह वृत्तांत रावण को सुनाया, तब राक्षस-कुलाधीश ने बड़ी
प्रीति से मृत महाकाय का स्मरण किया । वह दुख से, आँखों में आँसू भरे, सिर झुकाये
खड़ा रहा और फिर संभ्रमचित्त से अंतःपुर में चला गया । रात-भर चिंता में निमग्न

३२० रंगनाथ रामायण
रहने से वह सो भी नही सका । प्रात काल होते ही वह अपने सामंतो के साथ, अपने
उज्ज्वल रथ पर बैठकर अतःपुर से निकला और दुर्ग के स्तूप पर चढकर अपने विशाल
दुर्ग को ध्यान से देखा । फिर, वहाँ के सैनिको के शिविरो का निरीक्षण किया और दुर्ग
की रक्षा के लिए और अधिक सैनिको को नियुक्त किया । उसके पश्चात् रावण ने प्रहस्त
से कहा—'यह प्रसिद्ध दुर्ग अभेद्य है । यह किसी भी पराक्रमी शत्रु के वश में आनेवाला
नही है । आज वानर-समूह ने इसे भेद डाला है, यह देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा है ।
इतना ही नही, श्रीराम के बाहुवल का विक्रम दुर्वार प्रतीत हो रहा है । युद्ध करने योग्य
या तो तुम हो, या मै हूँ या मेरा भाई कुभकर्ण है । निद्रा में मग्न हो, मेरा भाई जाग
नही रहा है । इसलिए या तो तुम युद्ध करने के लिए जाओ या मै जाऊँ ।'
तब प्रहस्त ने राक्षसेश्वर से कहा—"हे देव, मै अभी जाता हूँ और उन नरो का
ऐसा सहार करता हूँ कि देवता भी मेरे बाहुवल की प्रशसा करेंगे । मै अपने प्रताप का
ऐसा प्रदर्शन करूँगा कि भूत, प्रेत तथा डाकिनी छककर रक्त-पान करेंगे और मोद-मग्न
होकर कह उठेंगे, 'लो देखो, प्रहस्त उन वन्दरो की कैसी दुर्गति कर रहा है ।' आपने
मुझे युद्ध में जाने का आदेश दिया, तो ऐसे समय में, मेरा आपको हितोपदेश देना उचित
तो नही है । फिर भी, एक बात सुन लीजिए । मेरा विचार है यह कार्य आपके लिए
उचित नही है । अब आप मानें या न मानें । आप स्वयं विचार करके देख लें । मै
आपकी आज्ञा का उल्लघन नही करता । पहले आपने अपने बुद्धिमान् मंत्रियो के हित-वचन
नही सुने । अब तो सुनिए और सीता को भूपाल के पास पहुँचा दीजिए । यह युद्ध
अनावश्यक है ।"
५६. प्रहस्त का युद्ध
इतना कहने के पश्चात् प्रहस्त रावण की आज्ञा लेकर युद्ध के लिए रवाना हुआ ।
उसने अपने वेत्रधरो को भेजकर अपनी चतुरगिणी सेना को एकत्रित किया और मणिमय
किकिणी के रणन से मुखरित होनेवाले ऐसे रथ पर सवार होकर चला, जिसका मेघ-
समान घोष तबतक सुनाई पड़नेवाला था, जबतक वानरो के श्रेष्ठ अगो के पवन उसका
स्पर्श नही करे, और जिसके ऊपर की सर्प-ध्वजा तबतक लहरानेवाली थी, जबतक
वानर-रूपी गरुड उस पर उतर नही आवे । उसके निकलते समय तुरहियो की जो ध्वनि हुई,
उससे दिशाएँ चक्कर काटने लगी, आकाश विचलित हो गया, नक्षत्र टूटकर गिरे और
वसुंधरा विदीर्ण-सी हो गई । इस प्रकार, प्रहस्त पूर्व के द्वार से कालांतक के समान युद्ध
करने के लिए निकला ।
दैत्यो के सिंहगर्जनी के साथ निकलनेवाले प्रहस्त की उग्र मूर्ति को देखकर राम-
चन्द्र आश्चर्य करने लगे और उसे विभीषण को दिखाकर बोले,—'हे विभीषण, तेज, वल,
तथा शौर्य से विस्मित होनेवाले इस राक्षस-नेता का नाम क्या है ? विपुल साहस के
साथ उसका वानरो पर आक्रमण करना देखकर मुझे आश्चर्य होता है ।'
तब विभीषण ने कहा—'हे देव, यह रावण की समस्त सेना का सेनापति है ।
इनकी अपनी सेना रावण की सेना की तीन चौथाई है । अपने साहस के लिए तीनो

लोकों में यह प्रख्यात है । यह अत्यधिक बलवान् है तथा रावण का मामा लगता है ।
यह महान् पराक्रमी है और इसका नाम प्रहस्त है । (रावण के द्वारा) चन्द्रशेखर के मित्र
(कुवेर) के सामत को पराजित होते समय इसने मणिभद्र को परास्त किया था। हे रवि-
कुलोत्तम, इसके साथ वानर-नायको को घोर युद्ध करना होगा ।'
इस प्रकार विभीषण के कहते समय ही वानर-वीर पर्वतो तथा वृक्षो को उठाये
सिंहनाद करते हुए दानवो का सामना करने लगे । असुर-सेना ने भी भयकर गर्जन करते
हुए वानरो पर आक्रमण किया । प्रलय-काल की अग्नि तथा वडवानल आपस में कभी
सघर्ष नही करते, पृथ्वी और आकाश का एक दूसरे से टकराकर चूर-चूर होना सभव
नही, भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डो का आपस में टकराना सभव नही । यदि ऐसा कभी हुआ
होता, तो इन राक्षस तथा वानर-सेनाओ के युद्ध की उपमा उनसे दी जा सकती थी ।
राक्षस अग्नि-सम बाण-समूह को वानरो पर चलाते थे । कुछ राक्षस खड्ग, गदा, भाले,
मूसल तथा भयकर चक्र आदि शस्त्रो को भी चलाते थे । तब वानर-सेना राक्षसो
पर बडे वेग से वृक्षो तथा पर्वतो को फेंकती थी । इस घोर युद्ध में पृथ्वी पर लुढकने-
वाले सिर, विदीर्ण होनेवाले वक्ष, चूर-चूर होनेवाले कधे, बाहर निकल पडनेवाली आँतें,
फूटनेवाले सिर, टूटनेवाली पसलियाँ, उमडनेवाला रक्त, छितरानेवाला भेजा, छिन्न-भिन्न
होनेवाले पैर, उछलकर गिरनेवाले हाथ, पिडाकृति धारण कर सडनेवाले शव, आधा
कटकर गिरे हुए शरीर, घूम जानेवाली पुतलियाँ, ये सब अत्यत भयकर दीखने लगे ।
युद्ध-भूमि में राक्षस और वानर निर्भय होकर बडे उत्साह से लडते थे । सहसा कपि-
वीरो ने राक्षसो पर बडा भयकर धावा बोल दिया । द्विविद ने नरातक पर एक पर्वत-
शिखर उठाकर फेंका । तार ने एक वट-वृक्ष को वेग से चलाकर कुभ हनु को गिरा दिया।
जाबवान् ने महानद पर एक विशाल पर्वत को गिरा दिया । दुर्मुख ने समुन्नत को एक
विशाल वृक्ष से मार गिराया ।
इस प्रकार, राक्षसो को वानरो के प्रहारो से बुरी तरह मरते हुए देखकर प्रहस्त ने
अपने प्रमुख साथियो की मृत्यु निश्चित जान और अत्यत क्रुद्ध होकर अपने रथ को विचित्र
वेग से चलाकर एक-एक प्रहार से एक साथ दस, बीस, तीस तथा चालीस वानरो का सहार
किया । तब वानर भी पर्वतो तथा वृक्षो को गिराकर प्रहस्त की सेना का नाश करने लगे।
रक्त की नदियाँ उमड-उडकर आकाश का स्पर्श करती हुई-सी बहने लगी, रक्त की उस
धारा में ही जहाँ-तहाँ वानर तथा असुर घोर गर्जन करते हुए युद्ध करते थे । उनके
पराक्रम को देखकर देवता भी उनकी प्रशसा करने लगे ।
तब प्रहस्त कालातक के समान अपने अद्वितीय प्रताप का प्रदर्शन करते हुए वानरो
के करो तथा चरणो को काटते हुए, उनके वक्ष स्थलो को विदीर्ण करते हुए, सिर तथा
बाहुओ को पृथ्वी पर गिराते हुए, हड्डियो तथा दांतो को चूर-चूर करते हुए, चक्रो से खड-
खड करके, अकुशो से चीरकर, भालो से चुभोकर, विशाल पाशो से बाँधकर, परशु से
काटकर, शूलो को भोककर बरछियो से उछालकर तथा शक्तियो से पीटकर वानरो के मास
तथा भेजा के ढेर-सा लगा दिया और अपनी शर-वृष्टि से वानरो को मारकर सभी भृतों
४१

३२२ रंगनाथ रामायण
को बलि चढ़ाई । इस प्रकार, प्रहस्त ने अपने दुर्वार विक्रम से वानरों का संहार करने में
सफल होकर सभी दिशाओं को विदीर्ण करते हुए भयंकर गर्जन किया ।
५७. नील के द्वारा प्रहस्त का वध
वानर-सेना को इस प्रकार नष्ट होते हुए देखकर, उद्भट-रण-कुशल नील भयंकर
हुंकार करते हुए प्रहस्त पर आक्रमण करने के लिए ऐसी अद्भुत गति से चला कि सारी
पृथ्वी काँप गई । उसने एक विशाल वृक्ष को उखाड़ लिया और सहज ही उस राक्षस
के रथ पर जा चढ़ा । उसने सारथी को मार डाला, अश्वों का नाश कर दिया, और
देखते-देखते प्रहस्त के धनुष को खंडित कर दिया । तब भयंकर गर्जन करते हुए प्रहस्त एक
मूसल लेकर रथ से उतर पड़ा और नील के सामने डट गया । नील ने निर्भीक होकर
उसका सामना किया, मानो वह अपनी विजय में पूरा विश्वास रखता हो । फिर, दोनों
युद्ध करते हुए एक दूसरे को परास्त करने का प्रयत्न करने लगे, जैसे वृत्रासुर तथा कौशिक ने
(पहले) किया था । प्रहस्त ने अच्छी तरह लक्ष्य करके मूसल से नील के ललाट पर
ऐसा तुला हुआ प्रहार किया कि उसका ललाट फूट गया । उससे छूटनेवाली रक्त-धारा
को पोंछते हुए नील ने अत्यधिक क्रोध से उस प्रहस्त पर वृक्षों से प्रबल प्रहार किया ।
किन्तु, उस राक्षस ने फिर से उसी मूसल से नील पर प्रहार किया । इस आघात से नील
लड़खड़ाने लगा, फिर भी उसने वृक्ष को छोड़कर उसी समय भयंकर गर्जन करके एक
विशाल पहाड़ उठाकर लक्ष्य करके उस राक्षस के सिर पर फेंका । नील के उस प्रहार से
प्रहस्त का शरीर, सिर तथा आभूषण छिन्न-भिन्न हो गये और इन्द्र के प्रहार से सिकुड़कर
गिरनेवाले पर्वत के समान वह राक्षस पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसके गिरते ही सभी कपियों ने
विजय-घोष किया और राक्षस-सेना लंका की ओर भागने लगी ।
उस समय सारी युद्ध-भूमि, अमृत-सागर-सुता (लक्ष्मी) के समान हरि* (विष्णु अथवा अश्व)
युत अंगों से, दानशील के निवास के समान मार्गणों * (याचक अथवा बाण) के
समूह से, जम्बूद्वीप के समान नवखंडों * (द्वीप अथवा खंड) से, प्रेमी पति के निकट वनिता
की भाँति राग-रस* (प्रेम रस अथवा रक्त) से, दुर्गम वन के सदृश पुंडरीकों * (व्याघ्र अथवा
गज) से, सुंदर मधु-मास की भाँति आरक्त, फुल्ल, पलाशों * (पलाश वृक्ष अथवा राक्षस) से,
शिव के निवास की नाईं भूत-गण * (शिव के सेवक अथवा प्रेत) से, सूर्य-प्रकाश से विलसित
गगन के समान अस्त-व्यस्त तारकों* (नक्षत्र अथवा आँख के तारे) से, तीव्र निदाघ के समान
अंबर-मणियों * (सूर्य अथवा वस्त्राभरण) से, अर्द्ध-नारीश्वर के समान अर्द्ध-शरीरों से युवत
हो, अनेक प्रकार से आश्चर्य उत्पन्न करती थी ।
तब नील शीघ्र ही राघवाधीश के समक्ष गया और उनके चरणों को प्रणाम किया।
वानरों ने बार-बार नील की प्रशंसा की । हतशेष राक्षस भयभीत हो भागकर रावण के
निकट पहुँचे और उसे सारा वृत्तांत कह सुनाया । तब रावण ने शोक-विह्वल हो अपने
मंत्रियों से कहा—'युद्ध करने गये हुए सभी वीर लौटने का नाम तक नहीं ले रहे हैं और
वानरों के हाथों मर रहे हैं। अब वैरियोँ का गर्व चूर करने के लिए मैं स्वयं ही जाऊँगा ।'
*इस प्रसंग में हरि, मार्गण, नवखंड आदि शब्दों में श्लेष है ।—ले०

युद्धकांड ३२३
५८ मंदोदरी के हित-वचन.
रावण की सभी बातें सुनकर, मंदोदरी शीघ्र माल्यवान् के पीछे, दैत्य-स्त्रियो के
साथ रावण की सभा की ओर चली। उसके पीछे-पीछे अतिकाय तथा प्रतीहारी चलने लगे ।
आयुधो से अलंकृत अन्य सैनिक भी उनका अनुसरण करने लगे । चामरिक-समूह
चामर डुला रहे थे और सभी मंत्री भी उसके साथ चल रहे थे । अपने समस्त आभूषणो
की शोभा को चारो ओर विकीर्ण करती हुई उसने रावण की सभा में ऐसे प्रवेश किया,
मानो नील-मेघो के मध्य विलसित होनेवाली बिजली हो ।
रावण ने मंदोदरी को अपने सिंहासन के अर्द्ध भाग पर आसीन कराया और प्रिय
वचन कहते हुए बुद्धिमान् मन्त्रियो को उचित आसनों पर बिठाया । प्रणाम करनेवाले
अतिकाय को प्रसन्नता से अपने निकट ही एक आसन पर बिठाया ? उसके पश्चात् दानवेश्वर ने
अपनी स्त्री से कहा--'हे कुवलयनेत्री, तुम तो इस प्रकार कभी सभा में नही
आती । आज तुमको कंपित शरीर से इस प्रकार सभा में आते देखकर मुझे आश्चर्य
हो रहा है ! तुम्हारे आगमन का क्या कारण है ?'
तब मंदोदरी ने अपने पति को देखकर कहा- "हे दनुजेश, आज मुझे यहाँ आने
की आवश्यकता पड़ी, इसलिए मैं आई हूँ । आप मेरे आगमन को बुरा न मानिए ।
हे देव, आपने देखा कि धूम्राक्ष आदि हमारे सेनापति युद्ध में कैसे मारे गये ? राम ने जन्म-स्थान
में चौदह सहस्र राक्षसो का सहार किया था और खर तथा त्रिशिर का वध किया था ।
मैं कहती हूँ कि ऐसा वीर एक साधारण मनुष्य नही हो सकता । इतना ही नही, राम ने
दण्डक-वन में महान् बलशाली कबंध का सहार किया । मारीच की मायाओ की उपेक्षा
करके उन्होने उसका वध किया । एक भयंकर अस्त्र से वालि का सहार किया । राघव ने
देवताओ के हित के लिए इस ससार में जन्म लिया है । वे स्वयं आदिनारायण है अन्यथा
इस पृथ्वी पर ऐसा पराक्रमी नर कहाँ मिलेगा ? उन्होने ही तो नीलकंठ के धनुष को भग्न
किया था ? अपने पिता की आज्ञा से जिस समय वे वन में तपस्वी का जीवन व्यतीत
करते थे, उसी समय आप सीता को हर लाये । रामचन्द्र ने आपका क्या अहित किया था।
राम-लक्ष्मण से युद्ध करने की क्षमता तीनो लोको में कौन रखता है ? यदि साम, दान
तथा भेद से शत्रु वश में आ जाय, तो दण्ड का उपाय अपनाना उचित नही । यदि आप
दण्ड देना भी चाहें, तो क्या राम-लक्ष्मण आपसे दण्ड भोगेंगे ? हे देव, राम परमात्मा हैं,
अत आप उनके समक्ष नतमस्तक हो, तो इसमें कोई दोष नही । यदि आप उनसे शरण
मांगें, तो वे आपको अवश्य अपनायेंगे । शरण माँगने से आपका शुभ ही होगा, हानि नही ।
काकुत्स्थवंशी राम के गुण, रूप, कृपा आदि गुण-गण का वर्णन करना कैसे संभव है ?
यदि वे क्रोध में आ जायें, तो इन्द्रादि देवता भी ठहर नही सकते, तब आपके लिए (उनका
सामना करना) कैसे संभव है ? अब आप इस प्रयत्न को छोड़ दीजिए । व्यर्थ ही दर्प की
अग्नि में नाश मत होइए । हठ छोड़िए और संताप त्यागकर सीता को लौटा दीजिए ।
इसी में आपका हित होगा । हे लंकेश, आप अपने कुल तथा लंका की रक्षा कीजिए ।
ऊँचे वाहनो तथा मणि-भूषणो के साथ आप जानकी को लौटा दीजिए और उपाक्ष, अतिकाय

३२४ रंगनाथ रामायण
तथा माल्यवान् के द्वारा संधि का प्रस्ताव भेजिए। बहुत क्यो ? क्या, आपने कार्त्तवीर्य के
साथ संधि नहीं की थी ? तब उस कार्त्तवीर्य को जीतनेवाले भार्गव राम को परास्त करने-
वाले यशस्वी राम क्या संधि करने के योग्य नही है।"
५९. मंदोदरी की मंत्रणा की उपेक्षा करना
मंदोदरी के इन दीन वचनों को सुनकर रावण क्रोध से दीर्घ श्वास लेने लगा ।
उसकी लाल आँखों से क्रोधाग्नि की चिनगारियाँ छूटने लगीं । उसने मदोदरी को देखकर
कहा—'हे नारी, हित-बुद्धि से तुमने मुझे उपदेश दिया है; किन्तु तुम्हारी बातो में एक
भी मुझे अच्छी नहीं लगतीं। दानव, यक्ष, गंधर्व देव आदि की सेवाएँ प्राप्त करने-
वाले मुझे तुम वानरों के आश्रय में जीनेवाले नर को प्रणाम करने का उपदेश देती हो ।
ऐसी बात तुम इस सभा में कैसे कह सकी ? क्या, तुम्हारे लिए यह उचित है ? उस
इक्ष्वाकुवंशी ने जान-बूझकर पहले हमारा अहित किया था; तभी तो मैं उसकी स्त्री को
ले आया । खर-दूषण आदि के संहार तथा तुम्हारी ननद के अपमान को भुलाकर मूर्ख के
समान मैं कैसे राम से संधि कर लूं ? यह असंभव है । अपने भयंकर बाणो से विभीषण,
सुग्रीव तथा राम-लक्ष्मण के साथ सभी वानरो को मारकर मैं विजय पाऊँगा । यदि विजय नहीं
प्राप्त करूँगा, तो युद्ध-भूमि में ही अपने प्राण दे दूँगा; किन्तु उस राम के साथ न संधि करूँगा,
न जानकी को ही लौटाऊँगा । यही मेरा दृढ़ निश्चय है । तुम्हारे ज्येष्ठ पुत्र, उदात्त
पराक्रमी, इन्द्रजीत के रहते तुम्हें किस बात का भय है ? मेरे पुत्र भयंकर आकारवाले
तथा दुर्वार पराक्रमी हैं; मेरा सामना कौन कर सकता है ?'
इन बातो को सुनकर मंदोदरी चिंताक्रांत मन से सिर झुकाकर सभा से ऐसे चली गई,
मानो रावण की लक्ष्मी ही यों सोचती हुई रावण से अलग हो रही हो कि यह नीच
तथा निकृष्ट नीति का अनुसरण करते हुए अपना बुरा-भला आप ही नही पहचान पा रहा है।
६०. रावण का प्रथम युद्ध
तब रावण ने अपने गुप्तचरों से कहा—'चिर काल से मेरे मन में जो क्रोध था,
उसका आज परिहार करूँगा । मैं उस (राम) के लिए कालरुद्र हूँ और वह मेरे लिए
अंधकासुर है । मेरे तूणीरों से निकलनेवाले अस्त्र, केंचुलों से मुक्त होनेवाले क्रूर सर्पों के
समान राघव को लगेंगे । राम मृत्यु से प्रेरित होकर, कपि-सेना का विश्वास करके यहाँ
आया है । तुम शीघ्र मेरे युद्ध करने के लिए दिव्य शस्त्रास्त्रों से सज्जित करके रथ ले
आओ ।'
उसके आदेशानुसार वे गुप्तचर सूर्य-प्रभा के समान दीप्तिमान् श्रेष्ठ रथ ले आये । फिर,
अपने नीच मनोरथ पर आरूढ होने की भाँति रावण उस रथ पर आरूढ हुआ । अपने
दीप्तिमान् आभूषणों से अलंकृत रावण के उस रथ पर बैठते ही, उसके आभूषणों की प्रभा
दिशाओं तथा आकाश में आश्चर्यजनक ढंग से व्याप्त हो गई, मानो युद्ध में राम के बाणों
की अग्नि-ज्वालाओं में रथ-समेत स्वयं रावण दग्ध हो रहा हो । निशानों का विपुल निनाद,
पटह, भेरी तथा शंख का भयंकर घोष, हाथियों की चिंघाड़, अश्वों की हिनहिनाहट, बन्दी

मागधो के स्तुति-गान की गंभीर ध्वनि, रथो के चलने की ध्वनि, सैनिको के हुकार, तथा
पृथ्वी को विदीर्ण करनेवाले उनके पदाघात की सम्मिलित ध्वनि भयंकर गति से समस्त
ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो लका के समुद्र के सभी जलचर एक साथ आर्त-ध्वनि कर
रहे हो कि रामचन्द्र जैसे पहले समुद्र पर क्रुद्ध हुए थे, वैसे ही वे आज क्रुद्ध हो गये हैं ।
(राक्षसो के) वृहदाकार रथ, रामचन्द्र के मनोरथो के समान ऐसे चलने लगे, मानो कह
रहे हो कि हे राम, हम दैत्य-समूह को ले आये है, आप इन्हें ग्रहण कीजिए । असख्य
गज-समूह पृथ्वी को कँपाते हुए चलने लगे । उनके कर (सूँड) रामचन्द्र के करो (हाथ)
के लिए दुर्जय न होने पर भी भयंकर दीख रहे थे और उन सूँडो के चारो ओर शिली-
मुख (भ्रमर) ऐसे झकार कर रहे थे, मानो कह रहे हो कि इनमें रामचन्द्र के शिलीमुख
(वाण)-समूह लगकर इनका (गजो का) मद गिराने के पहले हम अब इनकी मद-धाराओ
का पान कर लें । घोडे ऐसे झूमते हुए चल रहे थे,

३२६ | रंगनाथ रामायण

समुज्ज्वल मुँह पर अत्यधिक रोष दिखाई पड रहा है, वार-वार अपने अंकुश की प्रेरणा से
हाथी की चाल को तीव्र करने का प्रयत्न करते हुए बडे वेग से आ रहा है, वही उपाक्ष है।
भीषण घटा-रव करनेवाले रथ पर चढकर आनेवाला, महोदर है । उसने युद्ध में बहुत-से
लोगो का सहार किया था । रत्न-प्रभा-सपन्न अरुण कवच धारण किये, अश्व पर आरूढ
जो उद्धत होकर गरुड के समान वेग से आ रहा है, वह पिशाचो का नायक है । युद्ध
में इसका सामना करनेवाला कोई नही है । सिंह पर चढकर शूल हाथ में लिये जो
आ रहा है, वह युद्ध-प्रिय त्रिशिर है । विपुल घटारव करनेवाले तथा सर्प-ध्वजा से युक्त रथ
पर बैठकर धनुष का टकार करनेवाला, काले शरीर का वह राक्षस, कुभ है । स्वर्ण-
मणि-खचित ध्वजा से युक्त इस चित्ररथ पर बैठकर आनेवाला, वह विशालबाहु राक्षस,
निकुंभ कहलाता है । अग्निसम उज्ज्वल रथ पर आरूढ हो, बडे दर्प के साथ युद्ध करने
की तीव्र लालसा से विष-दृष्टियो से कपि-सेना की ओर देखते हुए, धनुष पर बाण चढाते
हुए आनेवाला नरातक नामक राक्षस है । जैसे भूत-गण कालनेत्र की (शिवजी) सेवा
में रहते है, वैसे ही गज-मुख, अश्व-मुख, सिंह-मुख, व्याघ्र-मुख, सर्प-मुख तथा उष्ट्र-मुख-
वाले भयंकर राक्षस जिसकी सेवा में लगे हुए हैं, और जो भयंकर गर्जन कर रहा है, वह
उभरी हुई आंखोवाला राक्षस देवातक है । हे देव, वहाँ जो स्वर्ण-रथ पर आरूढ है, जो
एक विशाल धनुष को एक तृण के सदृश सँभाले हुए भयंकर टकार कर रहा है, जो कभी
पराजय का नाम तक नही जानता, जो नरभोज का पुत्र है, जो अपने शरीर पर अरुण
चंदन का लेप किये हुए है, जो तीक्ष्ण तथा क्रुद्ध दृष्टियो से युक्त है, जिसका शरीर सांध्य-
मेघो के समान है, जो विंध्याचल के सदृश विशालकाय है, और जो करोडो छत्र-चामरो
से विलसित है, वही युद्ध का श्रेष्ठ शूर, अतिकाय है । वहाँ जो दम सहस्र श्वेत छत्रों तथा
स्वर्ण-चामरो से विलसित है, जो सिंह-ध्वज से युक्त तथा बलिष्ठ अश्व जुते हुए रथ परँ
आरूढ हो, विपुल शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित हो, धनुष का टकार करते हुए, हम पर दृष्टि
गडाये आ रहा है, वह इन्द्रजीत है । उसने ब्रह्मा के वर से अपार बाहुबल प्राप्त करके
अखिल देवताओ को युद्ध में जीत लिया था और इन्द्र को वदी बनाकर बडे गर्व से झूम-
रहा है । हे सूर्यकुलतिलक, अब मै उस प्रतापी लकानाथ को दिखाऊँगा, जो कनक-रत्न-प्रभा-
कलित दण्डो से युक्त चामरो से विलसित है, जिसके सिरो पर शोभायमान होनेवाले विचित्र
रत्नो की आभा से दीप्त दस किरीट ऐसे दीख रहे है, मानो (वे किरीट) बारहो सूर्य-
बिंबो को गलाकर बनाये गये हो, जिसके कर्णो को अलकृत करनेवाले महनीय मणिकुण्डलों
की प्रभा सभी दिशाओ में व्याप्त हो रही है, जो अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टियो से बहुत भयंकर
दीख रहा है, जिसने हर के निवास-स्थान कैलास पर्वत को उठाया था और देवागनाओ को वदी
बनाया था, जिसके वक्ष स्थल ने ऐरावत के दाँतो के प्रहारो को सहन किया था, जिसने
समस्त लोको पर विजय प्राप्त की थी और जिसने इन्द्र को भी युद्ध में परास्त किया था,
वही रावण वहीं सेना के मध्य में झूमता हुआ आ रहा है ।"
विभीषण के इस प्रकार सभी वीरो का परिचय देने के पश्चात्, राघव ने आश्चर्य
प्रकट करते हुए कहा-'हे विभीषण, यह बडी विचित्र बात है कि यह दानवेश्वर ऐसे महान्

युद्धकांड ३८७
तेज तथा सुदर आकार से विलसित है । भला, राक्षसो में ऐसा तेजस्वी कौन है ? यदि
यह क्रूरकर्मी नही होता, तो वह समस्त ससार के लिए पूज्य होता । इसके सभी राक्षस-
वीर सैनिक, पर्वताकारवाले, अपार शक्तिशाली, योद्धा, क्रूर-चरित्र तथा भयकर है। इसके
पश्चात् उग्रलोचन (शिव) के पिनाक को वश में लाने में निपुण राम तथा लक्ष्मण ने
धनुष तथा वाण धारण किये मानो (ससार को) बता रहे हो कि क्रुद्ध होने पर भी धर्म-
मार्ग का ही अनुसरण करनेवाले इन राजकुमारो की समता कौन कर सकता है ।'
तब रावण ने अपने सभी राक्षस-वीरो को देखकर कहा--'नगर के द्वारो पर तथा
बड़े-बड़े आँगनो में असख्य सैनिक लका के रक्षणार्थ रहें । जब हम और तुम युद्ध के लिए
चले जायेंगे, उस समय यदि वानर लका में प्रवेश करें, तो हमारी शक्ति किस काम की
होगी ? इसलिए इसका ध्यान रहे।' तब असख्य राक्षस इस रक्षण-कार्य के लिए चले गये ।
इसके पश्चात् रावण ने धनुष तथा बाण धारण किये हुए बड़े वेग से वानरो की
सेना पर ऐसे आक्रमण किया, जैसे दावाग्नि वनो को घेर लेती हो और पृथ्वी आकाश से
भिड जाती हो । उसने अत्यत तीक्ष्ण वाणो की ऐसी तीव्र वर्षा की कि यह विदित नही
होता था कि यह आकाश है, यह पृथ्वी है और ये दिशाएँ है । अपने उद्दण्ड बल को
प्रकट करते हुए उस राक्षस ने झुंड-के-झुंड वानरो को सहज ही खडित करके चूर-चूर
कर दिया, अस्थि, मज्जा, मास तथा रक्त से सारी युद्ध-भूमि को भर दिया और अपने धनुष
के टकारो से दिशाओ को प्रतिध्वनित करने लगा । गिरनेवाले, भ्रमित होनेवाले, मरनेवाले,
चकरानेवाले, भयभीत होनेवाले, आर्त्तनाद करनेवाले तथा विकृताग होनेवाले वानरो से रण-
भूमि को पूर्ण देखकर देवता सभ्रमित तथा व्याकुल हो गये ।
उस समय क्रूर कालानल की दुर्वार लीला के समान भयकर दशानन को अत्यत
भयानक रूप धारण करके गरजते हुए देखकर सुग्रीव ने उसका सामना किया और एक
पर्वत उठाकर उस पर फेंका, किन्तु रावण ने उसे बीच में ही अपने विपुल अस्त्रो से
चूर-चूर कर दिया और अपनी दीप्ति-ज्वालाओ को आकाश में फैलाते हुए, जलनेवाले एक
तीक्ष्ण शर को सुग्रीव के वक्ष पर चलाया, तो वह शर उसके शरीर के आर-पार निकल-
कर पृथ्वी में गड गया । तुरत सुग्रीव लडखडाते हुए पृथ्वी पर गिर पडा । यह देखकर
दानव हर्षध्वनि करने लगे और वानर अश्रु-धाराएँ बहाने लगे । इस पर महान् बाहुबली
ऋषभ, सुदंष्ट्र, गज, गवाक्ष, गवय, नल तथा ज्योतिर्मुख नामक वानरो ने क्रोधोन्मत्त होकर
रावण पर पर्वतो तथा वृक्षो से अविरत प्रहार किया । किन्तु, रावण ने उन सब को
बीच में ही खडित कर दिया और उन सातो वानरो को एक ही बाण से मृत-सा
कर दिया ।
६२. हनुमान् का रावण से युद्ध करके मूर्च्छित होना
अपनी सेना के नायको को इस प्रकार गिरते देखकर हनुमान् अत्यधिक क्रुद्ध हुआ
और बड़े दर्प मे रावण के रथ पर कूदकर उससे कहने लगा--'हे रावण, कदाचित् तुम
गर्व से फूलते रहे हो कि मैंने देवेन्द्र आदि देवताओ तथा राक्षसो पर विजय प्राप्त की है,
किन्तु मेरे सामने तुम्हारी दाल नही गल सकती, मैं तुम्हारा तेल निकाल दूँ गा । चिरकाल

३२८ रंगनाथ रामायण
से इस पृथ्वी पर उन्नत दशा में जीवित रहनेवाले तुम पर प्रहार करने के लिए मेरी
दक्षिण बाहु अपने-आप आगे बढ़ रही है । अभी मैं तुम्हारा वध करके तुम्हें यमपुर भेज
दूँगा । इसे निश्चय जानो ।'
हनुमान् के ये वचन सुनकर रावण का मुख क्रोध से विकृत हो उठा । उसने कहा-
'यदि तुममें शक्ति तथा सामर्थ्य हो, तुम अपनी समस्त शक्ति लगाकर मुझे एक घूसा
मारो । उसके पश्चात् तुम्हारे शौर्य तथा शक्ति को देखकर मैं भी घूसा मारूँगा ।' तब
हनुमान् ने अपना अद्भुत शौर्य दिखाते हुए दशकंठ से कहा—'देवाधिदेव, राम के भेजने
पर तुम्हारे नगर में आकर मैंने सीता का अन्वेषण किया और अंत में सीता को देखकर
उनसे रामचंद्रजी का संदेश सुनाया और लौटते समय अपना पराक्रम दिखाकर तुम्हारे वन
का सर्वनाश किया, तुम्हारी लका को जलाकर तुम्हारे पुत्र का वध किया और दैत्यों के
संभ्रमित होकर देखते-देखते मैं लौट पड़ा । आज तुम दर्प से फूलकर मेरी शक्ति देखने की
बात कह रहे हो । हे रावण, उस दिन तुम कहाँ छिप गये थे ?'
इस पर क्रुद्ध होकर असुरेश्वर ने हनुमान् के वक्ष पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया।
हनुमान् इस प्रहार से सिकुड़-सा गया; किन्तु फिर भी उसने अपनी समस्त शक्ति से रावण
पर एक घूसा चलाया । झंझावात से कंपित होनेवाले विशाल वृक्ष की भाँति, रावण काँप
गया । पीड़ित होनेवाले असुरेश्वर को देखकर इन्द्र आदि देवता हर्षित हुए; पर अल्प-
काल में ही रावण सँभल गया और हनुमान् को देखकर कहने लगा—'तुम्हारी शक्ति
प्रशंसनीय है । तुम्हारी मुष्टि के प्रभाव से मैं प्रेत-लोक का दर्शन कर आया ।' हनुमान् ने
कहा—'हे रावण, तुम अभी जीवित हो, फिर भी तुम मेरी प्रशंसा क्यो करते हो ?
(तुम्हारी बातें सुनकर) मुझे लज्जा हो रही है । तुम्हें तो मुझ पर प्रहार करना चाहिए।'
'तब लो, यह घूसा' कहते हुए रावण अपनी वज्र-सम मुष्टि से हनुमान् के वक्ष पर घोर
प्रहार किया । तुरंत हनुमान् मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ।
६३. नील का रावण से युद्ध करना
हनुमान् के गिर जाने के पश्चात् रावण नील से भिड़ गया । इतने में हनुमान् सचेत
हुआ और रावण को नील पर आक्रमण करते देखा; किन्तु वहाँ जाना अनुचित समझकर
वह वही रह गया । अपने ऊपर उद्धत गति से आक्रमण करनेवाले रावण को देखकर नील ने
बड़े क्रोध से मलय-शृंग को उठाकर फेंका । देवताओ के शत्रु ने सात बाणो से उसे बीच
में ही खंडित कर दिया । उसके पश्चात् भी नील रावण के विशाल वक्ष को लक्ष्य करके
पर्वतो तथा वृक्षो को चलाता रहा; किन्तु रावण ने अपने पैने बाण-समूह से उन सबको
चूर-चूर कर दिया और नील के शरीर पर कई पैने शर चलाये, जिसके कारण उसके
शरीर से रक्त की धाराएँ बहने लगीं । इस पर भी नील विचलित नही हुआ । सभी
राक्षसो को भयभीत करते हुए, लघुत्व धारण करके वह दानवराज के रथ पर कूद पड़ा
और अपनी अद्भुत शक्ति का परिचय देते हुए, उस रथ की ध्वजा पर उछलकर उसको
तोड़ दिया; फिर धनुष के अग्र-भाग पर कूदकर, रावण के लक्ष्य को भंग कर दिया ।
फिर, उसने अपने बाहुबल से सुर-सिद्ध-साध्यो को आश्चर्यचकित करते हुए रावण के

मुकुटों को पैरों से कुचलने लगा । उसने एक मुकुट को दूसरे मुकुट पर फेंका, एक मुकुट
पर से दूसरे मुकुट को गिराया, एक मुकुट से दूसरे मुकुट पर पद-प्रहार करके सभी मुकुटों
को मिट्टी में मिला दिया । इससे संतुष्ट न होकर, वह सूक्ष्म रूप में रहनेवाले अपने को
पकड़ने में रावण को असफल होते देखकर, हँसने लगा । फिर उसने रावण के छत्र फाटकर
फेंक दिये, उसके चामरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया, रथ पर प्रहार करके उसको खंड-खंड
कर दिया, क्रूरता के साथ दानवेश्वर की मुष्टि पर पद-प्रहार किया, उसके हारों को खींच-
कर फेंक दिया और उसके विशाल वक्ष पर प्रहार करने लगा । इस प्रकार, बड़े उत्साह
से युद्ध करनेवाले उस नील को देखकर राक्षस तथा वानर-सेनाएँ आश्चर्यचकित हो गईं ।
राम तथा लक्ष्मण भी विस्मित हुए । तब रावण अत्यन्त क्रोध से महान् अग्नि-बाण को
अपने धनुष पर चढ़ाकर उस अग्नि-पुत्र (नील) से कहा—'बलिहारी है तुम्हारे लाघव की।
मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ । तुम अपनी लघुता ही मुझे दिखाते रहो । अब यह लो,
अग्नि-बाण अपनी ज्वालाओं का प्रकाश फैलाता हुआ चला । इससे बचने का उपाय करो।'
यों कहते हुए उसने बाण चलाया । अग्नि-बाण के प्रभाव से नील का सारा शरीर जलने
लगा और वह पृथ्वी पर गिर पड़ा । अग्नि-पुत्र होने के कारण उसकी

३३० | रंगनाथ रामायण


अधिक ताप से युक्त थी । यह देखकर सभी देवता चकित-से रह गये । प्रलय-काल के
समान भयंकर गति से तथा अशनि से भी अधिक तेज से उस शक्ति को अपनी ओर
आते देखकर, लक्ष्मण ने उसका निवारण करने के लिए घोर शर-वृष्टि कर दी; किन्तु
उन बाणों की उपेक्षा करते हुए वह शक्ति लक्ष्मण के निकट आई और उनकी भुजाओं
के मध्य में लग गई । तुरन्त लक्ष्मण पृथ्वी पर गिर पड़े ।
तब दशानन ने लक्ष्मण को अपने बीस हाथों से उठाने का प्रयत्न किया, किन्तु
विष्णु का अंश होने के कारण वह उन्हें उठाने में असमर्थ हुआ । वह आश्चर्यचकित
होकर सोचने लगा कि मैं तो कैलास पर्वत को भी उखाड़कर उठा सका था, और मेरु
तथा मंदर पर्वतों को उठाने की शक्ति भी रखता हूँ । कैसा आश्चर्य है कि यह लक्ष्मण इतना
भारी हैं । ऐसा सोचते हुए, अपने बीस हाथों का सारा बल लगाकर रावण ने फिर एक
बार लक्ष्मण को उठाने का प्रयत्न किया । इतने में हनुमान् अत्यन्त क्रोध से उसके निकट
पहुँचा और सिंह-गर्जन करके उस क्रूर राक्षस के वक्ष पर वज्रसम अपनी मुष्टि से घोर
प्रहार किया । उस प्रहार से रावण मूर्च्छित होकर घुटनों के बल गिर पड़ा । रावण की
उस दशा को देखकर देवताओं ने हर्ष-ध्वनि की; कपियों ने सिंहनाद किया और राक्षस
त्रस्त हो उठे । विष्णुभक्त होने के कारण हनुमान् ने, रावण के लिए दुर्वह लक्ष्मण को
अपनी श्रेष्ठ शक्ति से सहज ही उठा लिया और शीघ्र ले जाकर उन्हें रामचंद्र के समक्ष
लिटा दिया । लक्ष्मण को लगी हुई शक्ति राम के तेज से निस्तेज हो उनसे छूटकर फिर
रावण के रथ की ओर लौट गई । थोड़ी देर में लक्ष्मण सचेत हो गये ।

६५. राम-रावण का प्रथम युद्ध

वहाँ रावण भी मूर्च्छा से मुक्त हो अपने चंचल धनुष को लेकर युद्ध के लिए सन्नद्ध
हुआ । लक्ष्मण के मूर्च्छित होने से सभी वानर भयभीत होकर भाग आये थे । रावण को
उद्धत गति से आक्रमण करने के लिए आते देखकर राम स्वयं क्रुद्ध होकर उस देव-वैरी का
सामना करने के लिए अपने धनुष का भयंकर टंकार करते हुए आगे बढ़े । तब पवन-
पुत्र ने राम से कहा—'हे सूर्यकुल-तिलक, जब यह रावण रथ पर बैठकर आप से युद्ध
करेगा, तब आप पैदल ही उसका सामना करें, यह कैसे उचित होगा ?' तब ऐरावत पर
आरूढ़ होनेवाले इंद्र की भाँति, राम हनुमान् के कंधों पर बैठे और बड़े रोष से धनुष
का भयंकर टंकार करने लगे । रावण ने क्रोधोन्मत्त होकर राम को देखा और उन पर
अग्नि-शिखाओं के सदृश बाणों की वर्षा आरंभ की । राघव ने भी उस पर श्रेष्ठ बाण
चलाये; किन्तु इन्द्र के शत्रु ने उन्हें बीच में ही काट डाला । तब राम ने उद्धत गति से
अर्द्धचन्द्र बाण चलाकर राक्षसेंद्रवर का धनुष काट डाला और पाँच तेज बाण चलाकर उसे
व्यथित कर दिया । तब रावण ने हुंकार करके एक तीक्ष्ण बाण हनुमान् के ललाट पर
चलाया । उस भयंकर बाण को हनुमान् के ललाट पर लगते देखकर राम ने बड़े क्रोध से
अपना भाला संभाला और उससे प्रहार करके रावण के सारथी को, अश्वों को, रथ को,
ध्वजा को, छत्र को और चामरों को क्षणमात्र में नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और फिर सुमंत्रक
नामक शर रावण के वक्ष पर चलाया । उस शर के प्रहार से रावण अत्यन्त पीड़ित हुआ

और थर-थर काँपते हुए निश्चेष्ट हो गया। फिर, राम ने उद्दीप्त क्रोध से अर्द्ध-चन्द्र वाण
का प्रयोग ,करके उसके दसो मुकुटो को नीचे ऐसे गिराया, मानो दसो दिशाओ में व्याप्त
उस राक्षस के प्रताप को ही झटका देकर गिरा दिया हो । अपने उज्ज्वल मुकुटो की प्रभा
से रहित हो रावण मन-ही-मन अत्यधिक दुखी हुआ और सुध-बुध खोकर खडा रहा । तब
राघव ने रावण से कहा--'वानरो के साथ भयंकर युद्ध करने के कारण तुम थके हुए हो।
अत., में तुम्हारा वध किये विना तुम्हें छोड़ देता हूँ । तुम शीघ्र लका को लौट जाओ ।'
६६. रावण का खिन्न होकर लंका लौट जाना
तब रावण विरथ हो दुखी मन, अकेले ही पैदल, लका की ओर चल पडा । वह
उत्तप्त निःश्वास छोड़ रहा था और उसका उद्दीप्त क्रोध बुझ गया था। उसका अत्यधिक
गर्व चूर हो चुका था। उसकी शक्ति नष्ट-सी हो गई थी और उसका दर्प दलित-सा
हो गया था । उसका मुख पीला पड़ गया था और वह बार-बार अपने सूखे हुए ओठो
को आर्द्र करता हुआ जा रहा था और भय के कारण उसका कठ सूख रहा था । इस
प्रकार जानेवाले रावण को देखकर सभी भूत तालियाँ पीटते हुए ठहाका मारकर हँसने लगे ।
सभी वानर जहाँ-तहाँ दौड़ते हुए, उछल-कूद करते हुए रावण का उपहास करने लगे ।
निदान रावण लका में पहुँच गया और अत्यधिक चिंता में डूबकर छटपटाने लगा । सिंह के
हाथो में फँसकर भी, बचकर निकल आये हुए गज की भाँति, गरुड की पकड से छूटकर
गिरे हुए त्रस्त सर्प की भाँति, रावण भयभीत हुआ। विद्युत् की-सी प्रभा से समन्वित,
भयंकर ज्वालाओ से युक्त तथा ब्रह्मास्त्र से भी अधिक शक्तिशाली राम के वाणो से अपने
सहार की चिंता करते हुए वह बार-बार लू की-सी गरम साँसें छोड़ने लगा । लज्जित
होने के कारण उसका माहस जाता रहा । वह सभा में स्थित दैत्यों को देखकर बोला--
'हे दानववीरो, आज मेरा शौर्य और मेरी शक्ति मिट्टी में मिल गई । स्वाभाविक पराक्रम
से सपन्न एक व्यक्ति राम-भूपाल, इस ससार में जन्मे है । मै ने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया था
कि युद्ध में सुर, सिद्ध, साध्य, गरुड, गधर्व, राक्षस, पक्षी, यक्ष, किन्नर, उरग आदि
किसी से भी मै पराजित नही होऊँगा । तब मैंने नर तथा वानरो की उपेक्षा कर दी थी ।
मेरे दुष्कर्म ही मेरी विपत्ति का कारण बन गये हैं । मैं अपनी दुर्दशा का कैसे वर्णन करूँ?
अब तुम लोग सावधानी से दुर्ग की रक्षा करो । द्वारो पर अधिक सख्या में रक्षको को
नियुक्त करो । प्रहस्त आदि महान् वीर युद्ध करते हुए अपने प्राण खो चुके है । अब कौन
ऐसा वीर है, जो राम-लक्ष्मण को जीतने की क्षमता रखता है ? विविध युद्धो को करने
में प्रवीण, सहज पराक्रमी राम-भूपाल पर आक्रमण कर सकने की क्षमता अब केवल मेरे
अनुज कुभकर्ण के सिवा और किसमें है ?'
६७. राक्षसों का कुंभकर्ण को जगाना
इसके पश्चात् दशकंठ ने सबको देखकर कहा--'मेरा भाई छह मास तक लगातार
सोने के पश्चात् जगा, सभा में आकर मेरे साथ मत्रणा की और फिर आज नौ दिन से
सो रहा है । वह अवश्य शत्रुओ का सहार कर सकता है । उस अनुपम वीर को जगाकर
किसी प्रकार यहाँ ले आओ ।'

रावण के आदेशानुसार राक्षसों ने कई प्रकार के गंध-पुष्प और विविध मिष्टान्न
आदि खाद्य पदार्थ लेकर कुंभकर्ण की उस गुफा में प्रवेश किया, जो तीन योजन लंबा था
तथा सब प्रकार के सुख-सुविधाओं से पूर्ण होने के कारण भोगों का निवास, पाताल के
समान महनीय, वज्रायुध की महिमा से समन्वित, इंद्रलोक के समान संसार के श्रेष्ठ तेज से
विलसित, अग्नि के निवास के समान, अत्यधिक भयंकर यमलोक के समान, विविध मेदा,
मांस आदि से युक्त होने के कारण (नैऋत) राक्षस के भवन के आँगन के समान, निरुपम
वारुणी से युक्त होने से वरुणालय के समान, सुगंधित वायु से युक्त पवन के निवास के समान,
श्रेष्ठ निधियों से युक्त कुबेर के भवन के समान, श्रेष्ठ विभूति का आगार शिव के निवास
के समान, तथा श्रेष्ठ पद्म-राग की प्रभा से समन्वित ब्रह्म-लोक के समान, सुशोभित थी ।
सोनेवाले कुंभकर्ण के दीर्घ निःश्वासों से राक्षस कंपित हो उठे, किन्तु जैसे-तैसे उसके
निकट पहुँचे और निर्मल तथा विशाल स्वर्ण-पर्यंक पर, हंस-तूलिका-तल्प पर शयन करने-
वाले कुंभकर्ण को देखा । वह अपने कंधे पर कपोल टिकाये, सतत दीर्घ निःश्वास छोड़ते
हुए सो रहा था । उसके मुख पर श्रम-जल की बूँदें थीं और उसके नेत्र किंचित् खुलें
हुए-से थे । उसके शरीर पर कर्पूर तथा चंदन का लेप था और उसके वक्ष पर उज्ज्वल
मणिमय हारों का समूह था । वह आनंद में अपने आपको भूलकर निद्रा तथा कामिनियों
के साथ रति-क्रीड़ा में सतत तल्लीन रहनेवाले के समान दीख रहा था और कदाचित्
देवताओं पर कई बार विजय प्राप्त करने के संबंध में स्वप्न देख रहा था । ऐसे कुंभकर्ण
को देखकर आगंतुक राक्षस दुःखी होने लगे कि हाय, ब्रह्मा ने ऐसे महान् वीर को ऐसी
निद्रा क्यों दी ? उसके पश्चात् उन्होंने उसके आगे भात की राशियाँ तथा महिष एंव वराह
का पकाया मांस आदि सजाये, चंदन तथा पुष्पों से उसकी पूजा की, धूप जलाया, दीपों
से आरती उतारी और हाथ जोड़कर उसकी स्तुति के पाठ किये । फिर, उन्होंने अशनि-
घोष से भी अधिक भयंकर ध्वनि की, निसानों का विपुल निनाद किया, भीषण भेरी-ध्वनि की,
और सिंह के समान गर्जन किया । वह महाध्वनि पाताल-लोक में, नक्षत्र-पथ में
सभी दिशाओं में तथा स्वर्ग में भी व्याप्त हो गई । इस पर भी कुंभकर्ण नहीं जगा,
इसके विपरीत वह और अधिक गंभीर निद्रा में डूब गया । तब सभी राक्षसों ने गदा,
मूसल, मुद् गर आदि से उसपर प्रहार किया । दस हजार भाले उसकी पसलियों में चुभोये ।
उस पर लगातार पहाड़ गिराये और उसकी छाती पर चढ़कर, हाथों तथा पैरों से ताड़न
किया । फिर भी कुंभकर्ण नहीं जगा । तब उन्होंने भीषण सिंहनाद करते हुए, शंख बजाते
हुए असंख्य कुंभ, पटह, भेरी, तुरही आदि का घोर निनाद किया । दस हजार भयंकर
राक्षस लगातार निसानों को बजाते ही रहे । इतनी ध्वनि होने पर भी कुंभकर्ण नीलाद्रि
के समान बिना हिले-डुले ही पड़ा रहा । तब राक्षसों ने उसे हाथी, घोड़े, ऊँट, जंगली
भैंसे आदि जानवरों से रौंदवाया और बड़े लट्ठों से उसका सारा शरीर चूर-चूर कर दिया
और एक साथ सभी वाद्य बजाये । सारी लंका इस ध्वनि से काँप उठी और वानर-सेना
भी शंकित होने लगी । इतना सब करने पर भी कुंभकर्ण ऐसा सो रहा था, मानो उसके
कान पर जूँ तक न रेंगी हो । तब कुछ राक्षस दिशाओं को कंपायमान करते हुए भेरीनिनाद

युद्धकांड ३३३
करने लगे, कुछ पर्वत गुफाओ को प्रतिध्वनित करते हुए सिंह-सम गर्जन करने लगे,
कुछ अपने हाथो में उसके केश लपेटकर नोचने लगे, कुछ उसके कर्ण-पुटो में प्रवेश करके
उसके परदो को दाँतो मे काटने लगे और कुछ अविराम गति से गदा, मुद्गर, खड्ग,
मूसल आदि से उसके मुख तथा वक्ष पर प्रहार करने लगे । तब उस राक्षस की नीद
थोडी उचटी । उसने एक जँभाई ली और फिर सोने लगा । तब राक्षसो ने उसे बडे-बडे
रस्सो से बाँध दिया और एक सहस्र घट उबलता हुआ तेल उसके कानो में उडेल दिया,
नथुनो में जलती हुई शलाकाएँ रखी, एक साथ भयकर गति से वे भेरियो का निनाद
करने लगे और लगातार हाथी तथा घोडो से उसका वक्ष रौंदवाने लगे । तब कुभकर्ण
किंचित् शकित-सा हुआ और सर्प के समान भयकर हाथो को फैलाया, थोडा-सा जगा,
हुंकार भरकर अँगडाई ली और अपने विशाल मुख को विकृत करते हुए जँभाई ली और
आँखें खोलकर भयकर रूप धारण किये ऐसे बैठ गया, मानो उसने यह सोच लिया हो कि
जब राम मुझे महान् सायुज्य पद ही देनेवाले है, तब मुझे इस निद्रा की क्या आवश्यकता है
और अपनी निद्रा त्याग दी । उसका मुँह प्रलयकाल के सूर्य-बिंब के समान लाल था,
और विंध्याचल की गुफाओ से निकलनेवाले पवन के समान उसकी उसासे चल रही थी
और उसकी आँखें प्रलय-काल के अर्क-बिंब के समान लाल दीख रही थी ।
इस प्रकार, उसके जगकर बैठने के पश्चात् सभी राक्षस दानवेश्वर के पास जाकर
बोले- 'हे देव, कई प्रकार से पीडा पहुँचाने के पश्चात् आपके अनुज जगे हैं, हम उनसे
युद्ध में जाने की प्रार्थना करें या आपके सम्मुख उन्हें लिवा लायें ? आप जो आज्ञा दें ।'
तब रावण ने बड़ी प्रीति से कहा- 'उसको यही लिवा लाओ ।'
६८. राघवों की युद्ध-यात्रा पर कुंभकर्ण का क्रुद्ध होना
रावण की आज्ञा के अनुसार राक्षस कुभकर्ण के पास गये । अपने समक्ष अडे हुए
राक्षस-समूह को देखकर उसने कहा- 'तुम लोगो ने मुझे क्यो जगाया ? अब रावण के
लिए कौन-सा कार्य आ पडा है ? कहो, बात क्या है ?' तब उन्होने कहा- 'आप स्वय
प्रभु रावण से ही सारी बातें जान लें ? आपको लिवा लाने के लिए उन्होने हमें भेजा है।
इससे अधिक हम और कुछ नही जानते ।'
तब कुभकर्ण उठा, जी भरकर स्नान किया, सुदर वस्त्राभूषण पहने और प्रकाशमान
किरीट धारण किया । उसके पश्चात् बडे मोद से राक्षसो ने कई प्रकार के मिष्टान्न,
पकवान, मधु, महिष तथा सूकर का मास, भेजा तथा घी के बरतन लाकर उसके सामने रखे ।
कुभकर्ण ने पहले बडी प्रीति के साथ मेदा तथा मास खाया, छककर रक्त तथा
मधु पिया और अत्यधिक सतुष्ट हुआ । तब सभी राक्षस प्रणाम करके उसके समक्ष खडे
हुए । तब कुभकर्ण ने उन्हें देखकर कहा- 'दानवेश्वर अपने पुत्र तथा वधुजनो के साथ
कुशल है ? लका पर कोई विपत्ति तो नही आई ? यदि उस पर कोई विपत्ति आ पडी है,
तो मैं उस भय को दूर कर दूँगा । अमरेन्द्र से भी भिडकर उसे स्वर्ग मे भगा दूँगा,
प्रलय-काल की अग्नि को भी बुझा दूँगा, शत्रुओ के तीव्र दर्प को भग कर दूँगा ।'
तब उपाक्ष ने हाथ जोड़कर कुभकर्ण से कहा- 'हे राक्षसवीर, सुनिए, हमें देवता,