रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
१. श्रीराम का हनुमान् की प्रशंसा करना
आश्रितो के हिताकाक्षी, सूर्यवश के सवर्द्धक रामचन्द्र ने जब प्राणाधिका प्रिया के इन प्रिय
वचनो को हनुमान् के द्वारा सुना और उनका पता जान लिया, तब उन्होने बडे प्रेम से
कहा—"हनुमान् ने जैसा कार्य किया है, क्या, वैसा कार्य करना देवताओ के लिए भी सभव है ?
ऐसा प्रतीत होता है कि शक्ति में या तो हनुमान् ही श्रेष्ठ है, या पवन श्रेष्ठ है या
गरुड ही श्रेष्ठ हैं । समुद्र को पार करना उनके सिवा और किसके लिए सभव है ? देव,
गधर्व, दैत्य तथा किन्नरो के लिए भी दुर्गम, राक्षस-सेना के प्रचड बाहुबल से दिन-रात
सुरक्षित लका में प्रवेश करके वहाँ से जीवित लौट आना क्या शशिधर (शिव) के लिए भी
सभव है ? अपने प्रभु का महान् कार्य बडे आनन्द के साथ जो शीघ्र ही सपन्न करता है,
वही उत्तम पुरुष है । प्रभु के कार्य में विघ्न पडने पर, विलव के साथ उसे पूरा करने-
वाला मध्यम श्रेणी का पुरुष है । प्रभु के बताये हुए कार्य से बचने की चेष्टा करनेवाला
तथा हीला-हवाला करनेवाला व्यक्ति दुस्सेवक है । इन तीनो में हनुमान् निस्सदेह श्रेष्ठ
व्यक्ति ही सिद्ध हुआ है । अनिलकुमार ने एक महान् कार्य को बडे हर्ष तथा तत्परता से
सपन्न किया है । अब उसका प्रत्युपकार, मैं किस प्रकार से कर सकूँगा । अब (प्रेम से)
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उसका आलिंगन करना ही इस समय मेरे वश की बात है।" यो कहकर प्रभु ने हनुमान्
को अपने हृदय से लगा लिया ।
इस प्रकार, सुग्रीव के समक्ष राम ने हनुमान् की प्रगसा करके कहा—'हे पवनपुत्र,
मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि तुम जानकी का पता लगाकर आये हो। मुझे अत्यन्त आनन्द का अनुभव
हो रहा है । पता नही, इस कार्य की समाप्ति कैसे होगी । मेरा मन यह सोचकर व्याकुल
हो रहा है कि इस विशाल समुद्र को लाँघकर जाने की क्षमता वानर-सेना को कैसे प्राप्त
होगी ।' इतना कहकर राम अपना सिर झुकाकर चुप हो रहे । रविपुत्र, राम के मन की
चिन्ता को दूर करने के उद्देश्य से कहने लगा—'हे देव ! आप साधारण लोगो की भाँति
इस प्रकार क्यो दुःखी हो रहे हैं ? आप क्यो कहते हैं कि हम समुद्र को पार नही कर
सकते ? हम अवश्य समुद्र को पार करेंगे, सुवेलाद्रि को पार करके लका को जीतेंगे और
रावण का सहार करके ससार का दुःख दूर करेंगे । हे राजन्, आप विचार कीजिए । मेरे
सभी वानर परिश्रमशील है ; बाहुबल से सपन्न है, और दुर्जय हैं । हे राघव, इनके
रहते हुए आप इस प्रकार क्यो चितित होते हैं ? आप तैयार हो जाइए । उद्योगी पुरुष
के लिए नभी अर्थ सद्यः फल-प्रद सिद्ध होते हैं । गत्रु सदा उत्साही व्यक्ति से भयभीत
रहते हैं, उत्साहहीन व्यक्ति से नहीं ।'
सुग्रीव के इन वचनो को सुनकर प्रभु ने हनुमान् से कहा—'ठीक है । मैं पहले
समुद्र से (मार्ग देने की) प्रार्थना करूँगा । यदि उसने नही दिया, तो अपने वाणो की अग्नि
से समुद्र को ही सुखा दूंगा, या उस पर पुल बाँधूँगा । हे पवनपुत्र, समुद्र पार करना
मेरे लिए कौन बड़ा कार्य है ? अब तुम यह तो बताओ कि उस दशकंठ के नगर में
किनने किले हैं, उसकी सेना कितनी बडी है ? उसके नगर के कितने द्वार हैं ? कितने राक्षस
उन द्वारो की रक्षा करते हैं ? उस नगर के सौधो की पंक्तियाँ कैसी हैं ? तुम तो इन
सबका पता लगाकर आये हो, इसलिए मैं तुमसे इन सब बातो का विवरण सुनना चाहता हूँ।'
२. लंका के वैभव का वर्णन
तब हनुमान् हाथ जोड़कर बड़े विनय के साथ प्रभु से इस प्रकार निवेदन करने लगा—
"हे दाशरथि, उस नगर में सतत (गण्ड-स्थलों से) मधु-धारा वहानेवाले, मुख से रौद्र भाव
प्रकट करनेवाले, पर्वताकार भद्र गजो के असंख्य समूह हैं । बहुत-से आयुधों से सज्जित,
आश्चर्यजनक तथा भयंकर दीखनेवाले, छत्रो, पताकाओ तथा विविध चिन्हो एव ध्वजाओ
से युक्त सूर्य-बिंव की प्रभा के समान मणियो से दीप्तिमान्, अश्वो एव सारथियो से युक्त
असंख्य रथ हैं । वीर रस के समुद्र की लहरो के समान दिखाई देनेवाले विविध रंगो से
युक्त, (दर्शकों की) दृष्टियो को चौंधिया देनेवाले अपनी हिनहिनाहट से सबको आश्चर्य-
चकित करनेवाले, अपने वेग में पवनदेव के अश्वो को भी मात करने की दिव्य शक्ति
रखनेवाले तथा मनोहर आकारवाले, अश्व अनगिनत सख्या में हैं । हे देव, हे राघव, वहाँ
के राक्षसवीरो की तो गिननी ही नही हो सकती है; वे ऐसे दिखाई देते हैं, मानो
बिजलियो से युक्त काले बादलो ने ही दानवो का रूप ले लिया हो, या काले पर्वत ही
मूर्त्तिमान् रौद्र वा-ना रूप धारण किये हुए हों, या जिस गरल का पान शिव ने किया था,
आप शत्रुओ का नाश कर देते हैं ।
17. अव उन सवका वर्णन ही मैं क्यो करूँ ? महान् वैभव से सपन्न हो रावण, प्रति दिन अपनी
18. सेना के साथ भ्रमण के लिए निकलता है और सवका निरीक्षण करता है । अपने उद्धत
19. गर्व से प्रेरित होकर वह सतत दूसरो को युद्ध के लिए चुनौती देता रहता है । पराक्रम
20. तथा शक्ति से सपन्न शत्रुओ के लिए भी लका को वश में करना दुष्कर है । इसके अलावा
21. समुद्र में जल, वन, (कृत्रिम) स्थल, तथा पर्वत के चार दुर्ग और हैं । वे सतत दिखाई
22. तो देते हैं, किन्तु उनको घेरने का उपक्रम करने जायें, तो उनका पता ही नही लगता ।
23. “हे राजन्, इस लका नगर की रक्षा करनेवाले भयकर राक्षस मृत्यु की जिह्वा की
24. समता करनेवाले, शूल धारण किये हुए सतत रक्षण-कार्य में तत्पर रहते हैं । ऐसे रक्षक
25. पश्चिम द्वार पर दस सहस्र रहते हैं । पूर्व द्वार पर स्वय रावण चतुरगिणी सेना के साथ
26. रहता है । दक्षिण द्वार पर एक लाख राक्षस रक्षा करते रहते हैं । उत्तर द्वार पर अगणित
27. शस्त्रो से सुसज्जित एक लाख राक्षस रहते हैं । नगर के मध्य में एक लाख पच्चीस
28. हजार राक्षस रहते हैं । हे सूर्यवशतिलक, ऐसी लका में, विना अन्य किसी का ध्यान
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के लिए मेरे अस्त्र के सिवाय (मुक्ति का) और कोई उपाय नहीं है । वह छिप कहाँ
सकता है ?' फिर उन्होंने नील को देखकर कहा—'तुम सेना के आगे-आगे ऐसे मार्ग से
चलो जो बहुत ही मनोहर हो तथा जिसमें स्वच्छ एवं मीठा जल, पके हुए फल, तथा
पेड़ों की छाया का प्राचुर्य हो । साथ-ही-साथ शत्रुजनों का भी पूरा ध्यान रखते हुए आगे
बढ़ना ।' नल उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए चल पड़ा । सुग्रीव ने सभी वानरों
को युद्ध-यात्रा पर चलने की आज्ञा दी ।
३. कपि-सेनाओं की युद्ध-यात्रा
तब वानर-सेना जहाँ-तहाँ की गुफाओं से बड़े उत्साह के साथ चली । उनके पदाघातों
की घोर ध्वनि से सब गुफाएँ गूंजने लगीं । उनके घोर हुंकार, तथा विकट अट्टहास के निनाद
आकाश तक व्याप्त हो गये । कुछ वानर भयंकर गर्जन करते हुए, अपनी शक्ति के गर्व में
झूमते हुए जा रहे थे । कुछ पके हुए फल-वृक्षों को ही अपने कंधों पर रखे हुए उनके फलों
को चबाते हुए जा रहे थे । कुछ वानर राम के समक्ष खड़े होकर कह रहे थे कि—'हे
राज भूपाल, हम अवश्य युद्ध में राक्षस-समूह के साथ रावण का वध करेंगे ।' इस प्रकार,
सभी वानरवीर अत्यधिक उत्साह से उछलते, हर्ष-निनाद करते, अपनी पूँछों को हिलाते,
पर्वत-शिखरों पर चढ़कर अपनी इच्छा से भयंकर गर्जन करने लगे । उस ध्वनि से आकाश
गूँजने लगा; पृथ्वी डोलने लगी, पहाड़ काँपने लगे, अष्ट दिग्गज धँस-से गये, आदिशेष
अत्यधिक भार का अनुभव करने लगा, कच्छप ने अपना सिर झुका लिया । उस विशाल
सेना के चलने से जो धूलि उठी वह कई रंगों से आकाश में व्याप्त होकर ऐसी दीखने
लगी, मानों उस ध्वनि के आधिक्य के कारण पृथ्वी से निःश्वास का धुआँ इस रूप में निकल
रहा हो ।
वानरों की उस विशाल सेना के अग्र भाग में नील के नेतृत्व में चलनेवाली सेना
(गरुड़ के) भयंकर मुख के समान थी दोनों पार्श्व भागों में चलनेवाली सेनाएँ दो पक्षों
की भाँति थीं; मध्य भाग में आनेवाले रामचंद्र आत्मा के समान थे; पीछे बड़े आटोप के
साथ आनेवाली सेना पूँछ की तरह प्रकट होती थी । इस तरह वह विशाल सेना ऐसी
दीख रही थी, मानो नागपाश से पीड़ित होनेवाले सूर्यवंशी राजकुमारों के संकट दूर करने
के निमित्त, गरुड़ पृथ्वी पर चल रहा हो । प्रजंघ, केशरी तथा दविमुख आदि वानर-वीर
भीड़ को हटाकर मार्ग बनाते हुए जा रहे थे । उनके पीछे अत्यधिक हर्षोल्लास से भरे
हुए हृदयों से गवय, तार, गंधमादन, हनुमान्, अंगद, शरभ, नल, जांबवान्, हर, मैन्द आदि
वानर जा रहे थे । उनके पीछे रामचंद्र, अनुज लक्ष्मण के साथ चल रहे थे । इस प्रकार,
सह्याद्रि पर पहुँचकर वही उन्होंने पड़ाव डाला । सुग्रीव ने वहाँ के विशाल वनों में,
तड़ागों के किनारे, तथा वृक्षों की छाया में सेना को ठहरने का आदेश दिया ।
दूसरे दिन पूर्ववत् सेना को रवाना करके लक्ष्मण स्वयं भी अपने प्रभु राम के साथ
चले । वानरों के चलने से धरती हिलने लगी । उस सेना-समुद्र में वीर रस का उफान-सा
उठ रहा था, उनकी शक्ति चारों ओर व्याप्त हो रही थी; (सैनिकों की) शरीर-
कांति की तरंगें उठ रही थीं; हर्ष-ध्वनियों का घोष आकाश का स्पर्श कर रहा था,
युद्धकांड २५३
मनुवंशचन्द्र, (रामचन्द्र) के सान्निध्य से वह सेना-समुद्र उद्वेलित हो रहा था । इस प्रकार
वह वानर-सेना-समुद्र (दक्षिण के) महासागर के गर्व को चूर करने के लिए निकल पडा।
(उस सेना-समुद्र के बीच में) धीर राम-लक्ष्मण आकाश के मध्य भाग में प्रकाशमान होने-
वाले सूर्य तथा चन्द्र की भाँति सुशोभित थे । जब नदियो में उतरकर सेना चलने लगी, तब
नदी का पानी उमडने लगा । जब वह सेना सह्याद्रि पर्वत तथा मलय पर्वत के मध्य भाग
से होकर जाने लगी, तब मद पवन के चलने से वृक्षो की शाखाएँ आपस में रगड खाकर
उन वानरो पर पुष्प बरसाने लगी । यह उचित ही तो था । वन-लक्ष्मी प्रभु राम के
आगमन से हर्षित होकर पुष्पाञ्जलि दिये बिना कैसे रह सकती थी ?
वानर-वीर उस पर्वत-प्रदेश में स्थित सरोवरों में उतरकर उनका निर्मल जल
पानकर सतुष्ट होते । उन सरोवरों में पाये जानेवाले कमल-समूहो को वे अपने कर-कमल-
युग्मो से इस प्रकार तोडते, मानो कह रहे हो कि हे कमलाकर, (सरोवर) जैसे कमलो का
शत्रु (चद्रमा) क्रोध में कमलो को जैसे तोड डालेगा, वैसे ही हमारे कमलाप्त-कुल-तिलक
(सूर्यवशतिलक) दशकठ के वदन-कमलो को भी तोड देगा । वे इस प्रकार कुमुदो*
को कुचल डालते थे, मानो कह रहे हो कि हम दुष्ट-शत्रु की स्त्रयो को दुख* देकर, जानकी
के दुखो* को भी इसी प्रकार* कुचल डालेंगे । सरोवरों के गर्भ से दीर्घ मृनालो को वे इस
प्रकार उखाडते थे, मानो कह रहे हो कि हम राक्षसो के उदरस्थ आँतो को इसी प्रकार
चीरकर बाहर निकालेंगे । इस प्रकार के विनोदो में मग्न होते हुए सभी वानर सरोवरों
के किनारे लाँघकर जाते और फिर पहाडो पर चढकर वहाँ प्राप्त होनेवाला मधु छककर
खाते और फिर जल पीकर बडे उत्साह के साथ आगे बढते जाते थे ।
४ महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र का देखना
तब रामचन्द्र ने महेन्द्र पर्वत पर चढकर वहाँ से अनतिदूर पर दीखनेवाले समुद्र
का अवलोकन किया । वह समुद्र विविध क्रूर प्राणियो को अपने गर्भ में एकत्र किये हुए
बडा प्रचड रूप धारण करके ऐसा कहते हुए-से दिखाई दे रहा था कि जो रावण दीर्घ-
काय मगर-रूपी हाथियो के झुडो से, उत्तुग तरग-रूपी घोडो से, कछुए तथा केंकडे-रूपी
रथ-समूह से, असख्य मत्स्य-रूपी सैनिको मे, सर्पों के फन-रूपी पताकाओ से, उनकी सुदर
तथा चटुल पूँछ-रूपी खड्गोसे, मीनावली-रूपी चामरो से, ऊपर तैरनेवाले झाग-रूपी छत्रो से,
घनघोष-रूपी भेरी-निनाद से तथा जल-रूपी वीर रस से, मेरी शरण में आया हुआ है,
उसका वध में कैसे करने दूँ गा ?
ऐसे विशाल समुद्र को देखकर राघव आश्चर्यचकित हुए और निदान उस समुद्र
के निकट पहुँचे । समुद्र के किनारे समस्त सेना को एकत्र करने लायक चन्द्रकात शिलाओ
से पूर्ण एक विशाल प्रदेश में रामचन्द्र इस प्रकार बैठ गये, मानो वे अपने शर-रूपी वसी
से समुद्र के आश्रय में विचरनेवाले रावण-रूपी मोटे पाठीन (मछली विशेष) को पकड़ने
के लिए बैठे हो । तब वे अपने पास ही बैठे हुए सूर्यपुत्र सुग्रीव को देखकर बोले-
- इन सभी शब्दो के लिए तेलुगु में एक ही शब्द (तोग) का उपयोग होता है ।
कवि ने यहाँ इस शब्द का प्रयोग करके यमक अलकार सिद्ध किया है । —लेखक
'हे सुग्रीव, हम तो समुद्र के किनारे पहुँच ही गये । अब कहाँ से और कैसे इस समुद्र को पार
किया जाय, इसका उपाय तुम सोचो । पहले एक सुंदर स्थान में इस वानर-सेना को ठहरने
की आज्ञा दो ।' सुग्रीव ने इस कार्य के लिए नील को नियुक्त किया । नील ने शीघ्र ही
सारी सेना को एक सुन्दर स्थान में ठहराने का प्रबंध किया । वानरों के, शिविरों में आने तथा
वहाँ उनके ठहरते समय जो तुमुल शब्द हो रहा था, वह सूर्यमंडल तक व्याप्त होकर
ऐसा लगता था, मानो वह समुद्र को डाँट रहा हो कि ऐ समुद्र, मैं स्वयं तो वनचरों
(वानर) से उत्पन्न हूँ, भला मैं तुम्हारे वनचरों से (जल-चर) उत्पन्न घोष को कैसे सहन
कर सकता हूँ और वह समुद्र के घोष को दबा देता था । सारी वानर-सेना, तीन सैनिक-
शिविरों में, समुद्र-तट पर स्थित वनों में ठहर गई ।
तब रामचंद्र ने लक्ष्मण से एकांत में कहा—'हे सौमित्र, इस समुद्र की विशालता
तो देखो, इसके अंत का पता कोई कैसे पा सकेगा ? इसी प्रकार दुःख-समुद्र का भी अंत
नहीं होगा ।'
५. संध्या-वर्णन
इस प्रकार कहते हुए प्रभु रामचंद्र जब दुःख-समुद्र में डूब गये, तब सूर्य भी पश्चिम
समुद्र में ऐसा डूब गया, मानो उसने ऐसा विचार किया हो कि रामचंद्र का जीवन ही
मेरा जीवन है । सूर्यास्त होते ही समस्त लोक मणिहीन मंजूषा की भाँति कांतिहीन
हो गये । संध्या-राग चारों ओर इस प्रकार व्याप्त हो गया, मानो मनसिज के बाणों की अग्नि
से तप्त मनवाले राम का शीतोपचार करने के निमित्त पश्चिम समुद्र राग-रंजित वस्त्र
लेकर आया हो । कमल-दलों का यौवन ढल जाने से, कमल अपने शेष सौंदर्य को लिये
हुए मुकुलित हो गये, मानो यह बता रहे हों कि राम के प्रताप के आगे इंद्र के शत्रु
रावण का मुँह भी ऐसा ही कुम्हला जायगा । चारों ओर अंधकार ऐसा व्याप्त होने लगा,
मानो राम का शीतोपचार करने के लिए दिग्बधुएँ ललित तमाल-पल्लव-राशियों को उछाल
रही हों । जहाँ-तहाँ कुमुद ऐसे विकसित हुए, मानो वे यह सोचकर हँस रहे हों कि सूर्यवंश-
तिलक राम की वधू को बंदी बनाकर हर्षित होनेवाले दनुजेंद्र का हर्ष भंग हो जायगा ।
सारा आकाश इस प्रकार नक्षत्र समूह से अलंकृत था, मानो वह इस बात की सूचना दे
रहा हो कि रामचंद्र के पैने शरों से मारा समुद्र सूख जायगा और उसके गर्भ में स्थित
रत्न-राशियाँ इस प्रकार दिखाई पड़ेंगी । आकाश के सारे नक्षत्र समुद्र के जल में इस प्रकार
प्रतिबिंबित हो रहे थे, मानो रामचंद्र के विरह-ताप का शमन करने के लिए निशासुंदरी ने
सुगंधित मल्लिका-पुष्पों की शय्या का प्रबंध कर दिया हो । चक्रवाक एक दूसरे से अलग होकर
शीघ्र गति से चारों दिशाओं में चले गये, जिससे सब दिशाओं में इस बात की घोषणा
करें कि श्रीरामचंद्र विरह-व्यथा से पीड़ित हो रहे हैं, यदि हम भी विरह में पीड़ित हों,
तो क्या, आश्चर्य है । चन्द्र अपनी किरणों को आकाश में व्याप्त करते हुए ऐसा उदित
होने लगा, मानो वह श्रीराम की निंदा यों कर रहा हो कि हे राजन्, मैं राजा (नक्षत्रों
का) होकर समुद्र को प्रसन्नता से प्रफुल्ल कर देता हूँ और आप राजा होकर उसको सुखा देना
चाहते हैं । आप पूर्णकला से समन्वित हैं, क्या आपके लिए यह उचित है ? यदि आप
युद्धकांड २७५
ऐसा करेंगे, तो आपको भी (मेरे समान) कलंक लग जायगा । चन्द्रिका समस्त दिशाओ
में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्र विकट अट्टहास कर रहा हो कि हे राजा राम, जिस
शिव ने मुझे अपने सिर पर धारण करके मेरा सम्मान किया है, ऐसे शिवजी के धनुष
को तोडने के कारण ही आपको विरह-दुख हुआ है। उज्ज्वल चाँदनी चारो दिशाओ में
ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्रमा ने समुद्र के फेन-रूपी चदन को अपनी किरणो के द्वारा
लहरो से आकृष्ट करके, दिग्वधुओ के शरीर पर मल दिया हो । तब चकोर-चकोरी
अत्यधिक आनद से एक दूसरे का आलिंगन करते बार-बार अपनी चोचो को पसारकर
छककर चंद्रिका-रस का पान करते, बडे अनुराग से अपनी प्रियाओ को पिलाते, उनके पीने
पर स्वय पीते और इसी प्रकार बडे मोद-मग्न हो चन्द्रिका में खेलते-कूदते । इस प्रकार,
जब वे अपनी प्रियाओ से अलग होते, फिर उनको ढूँढकर उनके साथ बडे आनंद से रहने
लगते थे । इन पक्षियो को देखकर वियोग-दुःख से पीडित राम, सीताजी का स्मरण करके
मन-ही-मन अत्यधिक व्यथा का अनुभव करने लगते ।
अपने अग्रज को इस प्रकार सतप्त होते देख लक्ष्मण उन्हें शांति पहुँचाने
के उद्देश्य से बोले--'हे देव, आप अनुपम वीर हैं, उदात्त चित्तवाले हैं । आप इसके लिए क्यो
दुखी हैं । अभी हम समुद्र को पार करके लका पहुँचेंगे, युद्ध में दशकंठ का सहार करेंगे,
और मिथिलेश की प्रिय पुत्री, कमलवदनी सीता को मुक्त करेंगे । आप खिन्न न होइए ।'
अनुज के इन नम्र वचनो को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए ।
सैनिक-शिविरो में, वानर उस आनंदप्रद चाँदनी में मुदित मन से रामचन्द्र के गुणो
का गान करते, खेलते तथा कूदते रहे । कुछ लोग समुद्र के किनारे बडे आह्लाद से विचरण
कर रहे थे । कुछ लोग विष्णु के सभी अवतारो की कथाएँ दूसरो को सुना रहे थे, तो कुछ
वानर पिघलनेवाली उन चन्द्रकांत शिलाओ पर बडे आनंद से सोने का यत्न कर रहे थे ।
इस प्रकार, वे बडी देर तक विविध क्रीडाओ में मग्न रहे ।
शीघ्र ही पूर्व दिशा में अरुणिमा का ऐसा आभास हुआ, मानो वडवानल ही इस
भय से कपित होते हुए कि, जब राघव समुद्र पर अपने पैने बाणो का प्रयोग करेंगे, तब
उनका लक्ष्य बन जाऊँगा, उदयाचल पर चढ गया हो । सभी नक्षत्र इस भय से व्याकुल
हो छिपने लगे कि समुद्र का दहन करने के लिए राम के बाणो से उत्पन्न अग्नि की शिखाएँ
कही आकाश तक न व्याप्त हो जायें । धीरे-धीरे सूर्य का उदय होने लगा, मानो वे अपने
पौत्र (राम) को सचेत करने के लिए आ रहे हो कि हे राघव, अभी विलंब क्यो करते हो,
समुद्र को पार करके शीघ्र ही रावण का सहार करो । सभी कमल एक साथ ऐसे
विकसित हुए, मानो कमलाप्त-वशज (सूर्यवंशी) राघव का विजय-कमल, साम्राज्य-कमल, तथा
कीर्ति-कमल एक साथ ही विकसित हो रहे हो । तब दाशरथि जगकर प्रात कालीन मध्या-
वदन आदि नित्यकर्मो से निवृत्त हुए ।
६ मंत्रियों के साथ रावण की मंत्रणा
लका में रावण ने अपने मंत्रियो की सभा बुलाई और उनसे कहा--"हे मंत्रिवरों,
तुम जानते ही हो कि एक वानर ने, एक यत्र-सचालित चित्रो की भाँति, मेरे नगर में
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२५६ | रंगनाथ रामायण
प्रवेश किया, लकिनी का वध किया, सीता के लिए लका को शोध डाला, मेरे पुत्र का वध
किया, मेरी शक्ति का तिरस्कार करते हुए मेरी नगरी को जलाकर भस्म किया और
बहुत-से राक्षसो का वध किया । वह हमारे हाथ में फँसकर भी हमारे हाथ से वचकर
चला गया । वही राघवो को समुद्र के किनारे ले आया है । यदि सूर्यवशतिलक
समुद्र को सुखाकर या समुद्र पर पुल वाँधकर इस पार चला आया, तो हमारा सब किया-
कराया मिट्टी में मिल जायगा । उसके समुद्र पार करने के पहले हम क्या उपाय करें,
जिससे वह लका में नही आ सके । तुम अच्छी तरह सोच-विचारकर कहो कि हमारा
अब क्या कर्त्तव्य है । यदि तुम्हारा बताया हुआ उपाय उपयोगी होगा, तो वैसा ही करेंगे ।”
तब उन मूर्ख मत्रियो ने राक्षसेश्वर से कहा—“हे देव, आपके वश में बहुत-से ऐसे
दिव्यास्त्र हे, जो देवताओ के लिए भी अजेय है । आप ने सर्पराज को वाँधा, उसका विष
उगलवाकर गर्व-भग किया । रुद्र के मित्र कुवेर का गर्व चूर करके आपने उसका
पुष्पक विमान ले लिया । मय की ख्याति को नष्ट करके उसकी प्रिय पुत्री से विवाह कर
लिया । मृत्यु-देवता अंतक (यम) को वदी बनाकर उस अंतक के लिए आप अंतक वन गये ।
अनुपम वलगाली वरुण को कँपा दिया और उसे अपने वश में कर लिया । हे सम्राट्,
आपने सभी चक्रवर्त्तियो के राज्य बात-की-बात में हस्तगत कर लिये । क्या आपने शूलपाणि
(शिव) के निकट अपने वाहुवल का प्रदर्शन करके उनको नीचा नही दिखाया ? क्या,
स्वर्ग के देवताओ के साथ उस इन्द्र का गर्व आपने नही तोड़ा ? क्या, आपने अग्नि को अपनी
प्रतापाग्नि का ताप दिखाकर उसका ताप नष्ट नही किया ? क्या, दैत्यनाथ नैऋत पर क्रुद्ध
होकर अपने पराक्रम से उसका गर्व-भग नही किया ? आपने पवन को एक स्थान पर स्थिर
रहने नही दिया और अपने वाहुवल से उसे विचलित कर दिया । राम तो एक मानवमात्र है
और आप मनुष्य-भक्षी है । यह कैसे सभव है कि वह आपके हाथो से वचकर जीवित रहे ?
आपके पुत्र ने ईश्वर की प्रीति के लिए महेश्वर-यज्ञ करके शाश्वत कीर्त्ति तथा पूर्ण
सफलता प्राप्त की, इन्द्र को जीतकर उसने इंद्रजीत का नाम प्राप्त किया । उसने इद्र
को भी वदी वनाया था, किन्तु ब्रह्मा के प्रार्थना करने पर उन्होने उसे ब्रह्मा को दे दिया ।
क्या, युद्ध में विजय पाने के लिए वह अकेला ही पर्याप्त नही है ? हे दैत्यराज, आपको
चिता करने की कोई आवश्यकता नही है ।”
७. दानव-वीरों के दर्पपूर्ण वचन
इस प्रकार, जब मत्री रावण को समझा रहे थे, तब महान् वलशाली एव प्रलय-काल
के रुद्र को भी परास्त करनेवाले शूर, ब्रह्मास्त, इंद्रजीत, शतमाय, दुर्मुख, अतिकाय, मकराक्ष,
खड्गरोम, वृश्चिकरोम, सर्परोम, अग्निवर्ण, विरूपाक्ष, अक्षीणवल धूम्राक्ष, अक्षतविजयी
उपाक्ष, अनुपम बली रश्मिकेतन, अमित पराक्रमी अग्निकेतन, वज्रदंष्ट्र, सप्तघ्न, शोणिताक्ष,
प्रवलशूर महापार्श्व, कुभ, निकुंभ, सूर्यशत्रु, अग्निकोपन, महोदर, देवताओ को जीतनेवाला
देवांतक, अद्वितीय पराक्रमी तथा नरो का नाश करनेवाला एव भयंकर आकारवाला महाकाय,
विद्युज्जिह्व, कंपन तथा अकपन आदि अभेद्य विक्रमी एव श्रेष्ठ दैत्यवीर, राक्षस राजा
रावण के सामने क्रोधाभिभूत होकर खड़े रहे । उनकी लाल-लाल आँखो मे क्रोध की भयकर
ज्वालाएँ निकल रही थी । प्रलय-काल के प्रचण्ड प्रभंजन से मुक्त, कुलपर्वतों की भाँति वे
परस्पर देख रहे थे, फुफकारनेवाले सर्पों की भाँति उनकी साँस वेग से चल रही थी ।
वे बड़े गर्व से शूल उठाते, खड्गों को खींचते, करवालों को आकाश में घुमाते, लाठियों
को ऊँचा करते, चक्रों को घुमाते, प्रवल मुद्गरों को सँभालने, दीर्घ खड्गों को दिखाते,
भालों को घुमाते और धनुष का टंकार करते हुए अपने क्रोध को प्रकट कर रहे थे ।
उनके इस क्रोध-प्रदर्शन के समय, उनके करवाल एक दूसरे से टकराकर स्फुलिंग
उगलते थे, परस्पर उनके केयूर तथा मुकुटों के रगड़ खाने से मोती बिखर जाते थे और
आभूषण चूर-चूर हो जाते थे । वे क्रोधोन्मत्त हो आकाश को कँपा देनेवाली गंभीर ध्वनि
से रावण से कहने लगे—'हे देव, देवता गंधर्व, दैत्य तथा किन्नर आपको देखने का भी
साहस नही करते; इन्द्र भी तो आपको देखकर भय से सिकुड़ जाता है । तब नर तथा
वानरों का साहस ही कितना है कि वे आपका सामना कर सकें ? उस दिन हम कुछ
असावधान से रहे, इसलिए उस नीच वानर ने अपनी दुष्टता से आतंक फैला दिया था ।
अब हमारे सामने किसकी शक्ति है कि लंका में प्रवेश करने का साहस करे । हे दानव-
नाथ, इतना क्यो, आप हमें शीघ्र आदेश दीजिए । हम तुरंत जाकर उन वानरों का नामो-
निशान मिटा देंगे और राजकुमारों का संहार करके वापस आयेंगे ।'
८. राक्षसवीरों को विभीषण का उपदेश
इस प्रकार की दुर्वार गर्वोक्तियाँ कहनेवाले राक्षसों को देखकर विभीषण, समस्त
इन्द्रियों को अपने वश में किये हुए योगीन्द्र की भाँति, गरजनेवाले उद्दण्ड मेघों को शांत
रखनेवाले इन्द्र की भाँति उन सब को अपने-अपने आसनों पर बैठ जाने का आदेश देकर
बोला—"हे वीरो, तुम उतावले मत बनो । किंचित् विचार करके देखो । किसी भी कार्य
को साधने के लिए पहले साम, दान, तथा भेद के उपायों का आश्रय लेना चाहिए । यदि
उनसे कार्य सिद्ध न हो, तभी दण्ड-विधान का आश्रय लेना पड़ता है । पहले ही दण्ड-
नीति को अपनाना नीति-विरुद्ध है । शत्रु के असावधान रहते समय ही, उसको जीतना
सुलभ है, या उस समय उसको जीता जा सकता है, जब कोई अन्य शत्रु उस पर आक्रमण
करने आता है और वह भगवान् की कृपा से वंचित रहता है । राम कभी असावधान
नही रहते, उनका पराक्रम दुर्वार है, उन पर कोई आक्रमण करने नहीं आता । और तो
और, वे स्वयं भगवान् है । शिव-धनुष का भंग उन्हों ने तो किया था ? वे परम विवेकी हैं,
अनुपम बाहुबल-संपन्न, तथा विजयी है । तुम चाहे जितना भी डींग हाँको, उस सूर्यकुल-
तिलक को जीतना क्या, तुम्हारे लिए संभव है ? उस वायुपुत्र की शक्ति का किंचित्
विचार करो, जिसने विशाल समुद्र को एक छोटी नहर की भाँति पार कर लिया है ।
तुम नहीं जानते कि उसने तुम्हारे देखते-देखते लंका में कैसा उत्पात मचा दिया ? उस
वानर ने राम की सेना के शौर्य का आभासमात्र दिखाया है । ऐसे अनेक वानर और
उनसे भी अधिक शक्तिशाली असंख्य वानर उनकी (राम की) सेवा में हैं । तुम लोग
राम के पराक्रम के आगे कैसे टिक सकते हो ? हे दानववीरो, क्रोधोन्मत्त हो अपने तथा
दूसरों के बल का अनुमान किये बिना, ऐसे वचन कहना क्या बुद्धिमानी है ? सुंदरियों में
३३
श्रेष्ठ सुंदरी राम की पत्नी सीता जब भयभीत होकर रामचन्द्र को पुकारने लगी, तब
राक्षसेश्वर अत्यंत वेग से उन्हें उठा लाये । हम स्वयं सोचें, उन्होंने हमें कौन-सी हानि पहुँचाई है ?
तुम लोग इस बात का तो विचार करते हो कि उन्होंने खर-दूषण आदि राक्षसों
को खंड-खंड कर दिया, किन्तु तुम यह नहीं सोचते कि पहले उन राक्षसों ने ही उनको
घेरा था । क्या, राम-लक्ष्मण पर आक्रमण करना उनको उचित था ? अपने किये हुए
कर्मों के फल भोगकर वे नष्ट हो गये और अमर-लोक को प्राप्त हो गये । अब उनकी
चिंता क्यों करें ? हमारी भलाई इसी में है कि वीर वानरों के लंका में प्रविष्ट होने के
पहले, हमारे दुर्गों के उनके पदाघात से नष्ट होने के पहले ही, सौमित्र के बाण-रूपी वज्र
के गिरने के पहले, रामचन्द्र के क्रोध से उत्तेजित होने के पहले ही और उनकी क्रोधाग्नि
से लंका के भस्म होने के पहले ही, हम सीता को श्रीरामचन्द्र के पास पहुँचा दें ।
सीता को ले आने के दोष का यही परिहार है । राम-भूपाल धर्मात्मा हैं और धर्म की
सदा विजय होती है ।”
इस प्रकार विभीषण ने कई प्रकार से राक्षसवीरों को समझाया और फिर दशकंठ
को देखकर कहा—‘हे प्रभु, दुर्व्यसन सुख तथा धर्म में बाधा डालनेवाले होते हैं । अतएव
आप उनका त्याग कीजिए । धर्म-पालन सुख तथा कीर्ति प्रदान करनेवाला होता है । इसलिए
आप धर्म के पथ का अनुसरण कीजिए और नीतिज्ञ कहलाइए । हठ छोड़िए, और प्रसन्न-
चित्त होइए । यदि आप अपने समस्त कुल की रक्षा करना चाहते हैं, तो जानकी को मुक्त
कर दीजिए । उस राम से हम शत्रुता क्यों करें ?’ इस प्रकार के नीतियुक्त वचन
सुनना रावण को अप्रिय लगा । इसलिए वह तुरंत सभा-भवन छोड़कर अंतःपुर में चला गया ।
९. रावण को विभीषण का हितोपदेश
दूसरे दिन प्रातःकाल ही विभीषण संध्यावंदन आदि प्रातःकाल के नित्य कर्मों से
निवृत्त होकर अपने रथ पर सवार हो रावण के अंतःपुर को चला । उसके चारों ओर
राक्षस सैनिक उसकी सेवा में चल रहे थे । वह रमणीय तथा चित्र-विचित्र तोरणों से
अलंकृत राज-मार्ग से होकर सुंदर शिल्पों को देखते हुए रावण के उस अंतःपुर के सिंह-
द्वार पर पहुँचा, जहाँ (अश्वों की) हिनहिनाहट, (गजों की) चिंघाड़, पटह तथा शंखों के
निनाद, सेवा-कार्यों में प्रवृत्त परिचारिकाओं की पायलों का झंकार, अंतःपुर के रक्षकों के
हुंकार, सूत-मागध बंदी-जनों की स्तुति, परिवारकों के वार्त्तालाप की ध्वनि, तथा गजों की
निःश्वास-वायु के कारण बड़े वेग से फड़फड़ानेवाली पताकाओं की ध्वनि, समुद्र की तरंगों
के घोष के समान समस्त दिशाओं को वधिर बना रही थी । वह अंतःपुर विश्वस्त राक्षस-
वीरों से ऐसा रक्षित था, मानो नक्षत्रों से परिवृत्त हो । उस सौध के सिंहद्वार पर असंख्य,
गज-रथ तथ अश्वों का समूह था । ऐसे सिंहद्वार के निकट विभीषण अपने रथ से उतरा
और अंतःपुर में प्रवेश किया । वहाँ यज्ञ आदि सत्कर्मों से अनुरक्त पूजनीय ब्राह्मणों को
पुण्याहवाचन तथा शान्ति-पाठ करते हुए देखा । विभीषण उन्हें देखते हुए बड़ी प्रीति से
आगे बढ़ा और सभा-भवन में पहुँचकर अपने अग्रज को अत्यंत भक्ति के साथ प्रणाम किया।
फिर, रावण का आदेश पाकर एक उचित आसन पर बैठा ।
' युद्धकांड २५६
उसके पश्चात् मंत्रणा-कुशल विभीषण सभी मंत्रियो के समक्ष कहने लगा—"हे देव,
हे दैत्यनाथ, आप ध्यान देकर मेरा निवेदन सुनिए । जिस दिन से आप सीता को ले आये हैं,
उसी दिन से दु शकुन दिखाई देने लगे हैं । आजकल होम-कुडो में त्रेताग्नियाँ प्रदीप्त
नही होती । उन कुडो को घेरकर बहुत-से साँप पडे रहते हैं । सतत मदजल वहानेवाले
जिन हाथियो के गडस्थल पर भ्रमरो का गुजार होता रहता था, वे मत्तगज आज शुष्क
शरीरो से, गर्दनो को ऊपर उठाये, चुपचाप खडे रहते हैं । अत्यधिक शक्ति तथा स्फूर्त्ति
से सपन्न उत्तम अश्व, आज आंखो से पानी गिराते हुए चारा-पानी छोडकर, शक्तिहीन
हो पडे हुए हैं । हे असुराधिपति, इन सब के निराकरण का एक ही मार्ग है । आप सीता
को ले जाकर श्रीराम को सौंप दीजिए । वे आपके अपराध पर ध्यान नहीं देंगे (वे आपको
क्षमा कर देंगे) । यही नीतिवान् के लिए 'उचित कार्य है । 'यही कार्य उचित है', इस
बात को सब लोग समझते हैं, किन्तु आपको इस धर्म का उपदेश देने से वे
२६० रंगनाथ रामायण
गये और उनसे कहा—'हे देव आज प्रभु, सभा में विराजमान हैं और आपको बुला लाने
के लिए हमें भेजा है।' यह आदेश सुनकर कुंभकर्ण अपने पुत्र कुंभ तथा निकुंभ के साथ
शीघ्र सभा-मंडप में पहुँचा। मणिमय, महिमा-समन्वित तथा नर्त्तकियो के संगीत की मधुर
ध्वनि से संपन्न उस सभा-मंडप में सिंहासनस्थ अपने अग्रज को उसने प्रणाम किया और
बड़ी नम्रता से एक उन्नत आसन पर बैठ गया। अपने भाई के साथ ही विभीषण भी आ
गया और स्वर्ण के आसन पर उपविष्ट हुआ। तब रावण सुरेश (इंद्र) के समान प्रभाव
उत्पन्न करते हुए प्रहस्त को देखकर बोला—'लंका नगर की रक्षा के लिए और भी अधिक
सैनिको को नियुक्त करो; सभी मार्गों में किले के द्वारो पर, भीतर तथा बाहर, राक्षस-
वीरो को सावधान रहने की चेतावनी देकर नियुक्त करो।'
१०. कुंभकर्ण को सीतापहरण का वृत्तांत सुनाना
उसके पश्चात् दानवेश्वर कुंभकर्ण को देखकर अत्यधिक व्यग्रता से कहने लगा—
"हे कुंभकर्ण, मैं तुम्हें एक ऐसी बात सुनाता हूँ जिसे तुमने अबतक नहीं सुना होगा। मैं एक
दिन जनपद में गया और वहाँ राम की पत्नी, भूमि-सुता कमलाक्षी सीता पर मुग्ध होकर
उन्हें यहाँ ले आया। कुछ दिन पहले हनुमान् नामक एक वानर यहाँ आया और सीता
से मिलकर उसे प्रणाम किया और कहा—'हे देवी, आपके पति राम यहाँ अवश्य आयेंगे।'
सीता उन बातो पर विश्वास किये बैठी है। वह मानव (राम) अत्यधिक साहस के साथ
समुद्र के उस पार शिविर डाले पड़ा हुआ है। वह अपने साथ, वनो में पाये जानेवाले
वानरो की एक बड़ी सेना एकत्र करके लाया है। शीघ्र मुझसे युद्ध करके सीता को
ले जाने के निमित्त वह आ रहा है। वह भले ही यहाँ आवे। मैंने इन्द्र आदि देवताओ
को परास्त किया है। जिस कैलास पर्वत पर शिव रहते हैं, उसे मैंने उठाया है। शंभु से
मैंने चंद्रहास (नामक खड्ग) प्राप्त किया है। कमलनभव ब्रह्मा का वर मुझे प्राप्त है।
तिस पर मुझे तुम्हारी शक्ति की सहायता प्राप्त है। तब, क्या एक साधारण मानव मुझे
परास्त कर सकता है ? राम कैसे मुझे युद्ध में जीत सकेगा, और कैसे उस सुंदरी को
यहाँ से ले जा सकेगा ?"
इन बातो को सुनकर कुंभकर्ण ने क्रोध में आकर सब लोगो के समक्ष रावण से
कहा—'हे रावण, राम को धोखा देकर, उनकी पत्नी को इतनी क्रूरता के साथ तुम कैसे
लाये ? क्या इस प्रकार उसे ले आना उचित था ? तुमने अपने मन में नीति का विचार
ही नहीं किया। धर्म-मार्ग का स्मरण ही नहीं किया। काम के पीछे तुमने सारे कुल को
कलंकित किया। जिस दिन तुम सीता को ले आये, उसी दिन लंका का सर्वनाश हो गया ?
इसका नाश तो अब निश्चित ही है, चाहे कैसे भी हो। तुम उस सूर्यवर्चस राम के अप्रति-
हत बाणो का लक्ष्य हुए बिना अपने भाग्य से बचकर चले आये, यही बड़ी गनीमत है।
अब मैं जाता हूँ। हे रावण, इतना बड़ा कार्य सँभालने का भार मुझ पर पड़ा है। अब
तुम वानर तथा राघवो का किंचित् भी भय किये बिना सुख भोगते रहो।'
इन बातो को सुनकर महापार्श्व ने कहा—'हे राक्षसाधीश, आप तो समस्त लोकों
के अधिपति हैं। क्या आप सीता के साथ बलपूर्वक रति-क्रीडा नही कर सकते ?' यह
युद्धकांड २६१
सुनकर मन-ही-मन अत्यत प्रसन्न होते हुए राक्षसराज ने कहा—'हे महापार्श्व, सुनो ।
एक बार मैं ब्रह्मा की सभा में जाते समय पुजिकस्थली नामक एक सुदरी को देखकर उस
पर मुग्ध हुआ और वासना से प्रेरित होकर वलपूर्वक उसके साथ रति-क्रीडा की । यह
बात जानकर ब्रह्मा मुझ पर क्रुद्ध हुए और शाप दिया कि हे राक्षस, स्त्रियो के प्रति आदर
दिखाये विना, अनुचित रीति से यदि तुम भविष्य में किसी भी स्त्री के साथ वलात् रति-
क्रीडा करोगे, तो अवश्य तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे । यही कारण है कि मैं
किसी भी स्त्री की स्वीकृति प्राप्त किये विना उसके साथ वलात्कार नही करता । मेरी
शक्ति का विचार किये विना वानर-सेना के साथ राम का लंका पर चढ आना उसी
प्रकार है, जैसे भद्रगजो के समूह का सोनेवाले सिंह को जगाना ।'
तब विभीषण ने हँसकर रावण से विनयपूर्वक निवेदन किया—'हे भाई, तुम्हारे
लिए सीता एक भयंकर कालसर्पिणी है । उनकी उसामें ही (नागिन का) फुफकार है
और उनका दुख ही गरल है । वह (काली नागिन) किसी भी
मुँह से ऐसी विचित्र बातें सुन रहे हैं । क्या, तुम समझते हो कि राक्षस उतने शक्ति
हीन हैं ?'
११ इन्द्रजीत का विभीषण को अपने पराक्रम का परिचय देना
रामानुज की बाणाग्नि से दग्ध होना इन्द्रजीत के भाग्य में लिखा हुआ था । इसलिए
वह अत्यधिक मद से उन्मत्त हो, किसी भी प्रकार की नीति का ख्याल किये बिना कहने
लगा- "हे विभीषण सुनो । राक्षसों की शक्ति तथा प्रताप का विचार करके देखो, तो यह
निश्चय है कि हम में से अल्पशक्तिमान् भी राम तथा लक्ष्मण को जीत सकता है । तीनो
लोकों पर बड़े वैभव से राज्य करनेवाले इन्द्र को क्या मैंने पकड़कर बंदी नहीं बनाया ?
उनके ऐरावत को पकड़कर उनके दाँत मैंने नहीं तोड़े ? ये सब मेरे लिए कौन बड़ी बात थी ?
मैंने अग्नि को अपमानित किया; यम को दबा दिया, नैऋत की शक्ति को नष्ट
किया तथा वरुण को परास्त किया । दिक्पालों को इस प्रकार निष्ठुर होकर त्रास देनेवाले
मेरे प्रबल हाथों से क्या, ये मानव नष्ट नहीं होंगे ? तुम तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर उनकी
महिमा का राग अलाप रहे हो । हे विभीषण, सप्त समुद्रों में प्रविष्ट होकर मैं उन्हें
आलोड़ित करूँगा; मेरु तथा मंदर पर्वतों को नचा दूंगा; समस्त पृथ्वी को लाँघ जाऊँगा,
इस पृथ्वी को ऐसे उछालूँगा कि वह जाकर आकाश से टकरा जायगी, मैं समस्त लोकों
को सुखा दूंगा, सारे वनचर समूह को इस प्रकार समुद्र में डुबो दूँगा कि वे थर-थर
काँप उठेंगे; पृथ्वी का भार वहन करनेवाले उस शेष नाग को पकड़कर, उसका विष
निचोड़ दूँगा । अपने भुज-बल से सूर्य तथा चंद्र को पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर रगड़ दूँगा ।
वनचर-समूह को पकड़कर उन्हें सूर्य तथा दिशाओं के उस पार फेंक दूँगा; युद्ध में वानरों
का रक्त भूतों को पिलाऊँगा, अपने शर-समूह से आकाश, दिशाएँ तथा पृथ्वी को ढक
दूँगा । सूर्य के रथ का जूआ पकड़कर आकाश में घुमाऊँगा और उसे पृथ्वी में दबा दूँगा।
अपने दायें और बायें हाथों में पृथ्वी तथा आकाश को ग्रहण कर उनको ऐसा मसल दूँगा
कि वे चूर-चूर हो जायँ । हे विभीषण, तुम दनुजेश्वर के भाई हो; इसलिए मैं तुम्हें कुछ
कहे बिना क्षमा करता हूँ । यदि दूसरा कोई होता, तो मैं कदापि ऐसी बातें नहीं सहता ।
ऐसी व्यर्थ की बातें क्यों करते हो ?'
१२. विभीषण द्वारा इन्द्रजीत के दंभ की निंदा
इन दर्पपूर्ण वचनों को सुनकर विभीषण अत्यंत क्रुद्ध हुआ और इंद्रजीत को देखकर
इस प्रकार कहने लगा- "तुमने सूर्यवंशज राम को क्या समझ रखा है कि ऐसे मात्सर्य-
युक्त अनुचित वचन कह रहे हो ? तुम्हारे हाथों से पराजित होने के लिए वे इन्द्र नहीं हैं;
वे तो युद्ध में भयंकर बननेवाले राम हैं । तुम्हारे द्वारा परास्त होने के लिए वे अग्नि-
देव नहीं हैं; वे तो रणनीति-कुशल राम हैं । तुममे हार जाने के लिए वे यम नहीं हैं,
वे तो रण में प्रचण्ड रूप धारण करनेवाले राम हैं । तुमने परास्त होने के लिए, वे नैऋत
नहीं हैं; वे तो युद्ध में व्योत्पादक रूप धारण करनेवाले राम हैं । तुम्हारे द्वारा विजित
होने के लिए वे वरुण नहीं हैं; वे तो रण में अत्यधिक सावधान रहनेवाले राम हैं । वे
तुममे हार जानेवाला पवन नहीं हैं, वे युद्ध-निपुण राम है। तुममे परास्त होने वाले कुबेर नहीं हैं;
वे तो युद्ध में वज्रसम शत्रुओं का नाश करनेवाले राम हैं । तुम्हारे हाथों से पराजित होने
के लिए वे पशुपति नहीं हैं, वे तो रण में अवश्य विजय प्राप्त करनेवाले रामचंद्र हैं । युद्ध
में उनका सामना करना इतना सहज मत समझो, जितना दिक्पालों का सामना करना है । मदांध
होकर असंभव कार्यों को साधने का विचार करोगे, तो मुँह की खाकर गिरोगे । तुम पुत्र नहीं हो,
कुलनाशक हो । तुम ही रावण के शत्रु हो । रामचन्द्र के अग्निसम बाणों के प्रहार के सामने
क्या रावण टिक सकता है ? उचित यही है कि रावण मणियों, गज-मणियों तथा अश्व-मणियों
साथ उस मानिनी-मणि (सीता) को रामचन्द्र के पास पहुँचा दे ।
१३ रावण का विभीषण को नगर से निर्वासित करना
तब रावण ने विभीषण को रोषपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा—'शत्रु के साथ भी
सतत (युद्ध करते हुए) रह सकते हैं, विष उगलनेवाले सर्प के साथ भी निर्भय होकर
रह सकते हैं, किन्तु शत्रु से मिले हुए पर अपना बनकर रहनेवाले लोगों के साथ जीवन
बिताना कठिन है । तुम ऐसे ही व्यक्ति हो । इसीलिए मेरे सामने तुम बडे गर्व से शत्रु
की प्रशंसा करते रहते हो । तुम मेरे अनुज हो, इसलिए अवध्य हो ? (क्रोध से) क्या,
तुम सचमुच मेरे अनुज हो ? तुम तो मेरे ज्ञाति (गोतिया) हो ।'
कुंभकर्ण ने देखा कि ब्रह्मा का शाप प्रबल है, (अर्थात्, रावण का अंत निश्चित है),
न तो वह अपने अनुज की बातों को अनुचित कह सका, न अपने अग्रज को अनुचित
कहने से रोक ही सका । इसलिए वह बडे आदर के साथ अपने अग्रज को प्रणाम करके
सोने के लिए अपनी गुफा में चला गया । उसके चले जाने के पश्चात् विभीषण ने रावण
को देखकर कहा—'हे भाई, तुम मेरे अग्रज हो, इसलिए तुम पर आनेवाली विपत्ति की
कल्पना से भयभीत होकर मैंने तुमको उचित परामर्श दिया है । हे असुरेन्द्र, आप्त बंधुओं
के हित-वचन तुमको बुरे लगते हैं । ऐसे मंत्री बहुत कम होंगे, जो अच्छा परामर्श देते हैं
और ऐसे राजा भी बहुत कम होंगे, जो उन वचनों को सुनते हैं । मेरा धर्म है कि मै
आपके हित का विचार करके उचित परामर्श दूँ और आपका धर्म है कि आप उसे स्वीकार
करें । सीता को लौटा देना तुम्हारे लिए नीतिमगत होगा । यदि ईश्वर स्वयं प्रतिकूल हो,
तो शक्ति तथा पराक्रम आदि किस काम आयेंगे ? दशरथ के पुत्र स्वयं ईश्वर हैं, भला
उनके अतिरिक्त और कोई ईश्वर भी है ?'
विभीषण के इन वचनों को सुनकर रावण की भौंहें तन गईं, मुख विकृत हो उठा, क्रोध
के कारण आँखों से अग्नि निकलने लगी और होंठ फड़कने लगे । उसने गरजकर कहा—
'तुम मेरे सम्मुख राम को ईश्वर कहने हो ? एक साधारण मानव कहीं ईश्वर हो सकता है ?
अविवेकी पिता के द्वारा राज से निर्वासित होकर, वनों में भटकते हुए कन्द-मूल तथा
पत्तों पर जीवन व्यतीत करनेवाले को कहीं ईश्वर कहते हैं । यदि वह ईश्वर होता, तो
जब मैं उसकी पत्नी को चुराकर लाया, तभी वह मुझ पर आक्रमण करता । इसके विपरीत,
वह अपने भाई के साथ जंगलों में रोते-कलपते फिरता रहा और भटककर सुग्रीव नामक
एक वानर के आश्रम में रह रहा है । क्या, यह सब ईश्वर के ढंग हैं ? एक कायर
मानव को मेरे समान कहकर, क्यो बार-बार मेरे सामने उसकी प्रशंसा करने हो ?'
२६४ रंगनाथ रामायण
तब विभीषण ने मन-ही-मन हँसते हुए रावण से कहा—"हे राक्षसाधीश, देवताओ
की वृद्धि करने, ऋषियो की रक्षा करने, तथा असुरो को दड देकर पृथ्वी का पालन करने
के लिए आदिनारायण ने सूर्यवश में दशरथ का पुत्र होकर जन्म लिया है । उस महा
महिमा-सपन्न आदि देव की महिमा का वर्णन ब्रह्मा भी नही कर सकता । सनकादि मुनि
भी उसका वखान नही कर सकते । भला, तुम उनकी महिमा कैसे जान सकोगे । राम
साधारण मानव नही हैं । इसलिए यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो राम के दर्शन
करके कमलमुखी सीता को उन्हें सौंप दो । विचार करके देखो, अर्थ तथा काम मात्र की
प्राप्ति से धर्म की सिद्धि नही हो सकती । तुम तो कभी नीतिमार्ग का अनुसरण करना
नही चाहते । तुमसे भी अधिक तुम्हारे मित्र तथा अनुयायी उसे नही चाहते । हे दानवेन्द्र,
कार्य तथा अकार्य का विवेक नही रखनेवाले तुम्हारे लिए धर्म का क्या मूल्य हो सकता है ?
वानर अवश्य समुद्र पार करके यहाँ आयेंगे । हाथ जोडकर (दया की भिक्षा माँगने-
वाली) राक्षस-स्त्रियो के केश पकडकर उन्हें घसीटेंगे । ऐसा करने के पहले ही तुम सीता
को रामचन्द्र के पास पहुँचा दो । यही मेरा तुम से अनुरोध है । मै तुम्हें राज करते हुए
देखना चाहता हूँ, अग्नि-ज्वालाओ के सदृश राघव के असंख्य शरो को उद्दण्डता से तुम्हारे
वक्ष पर लगते हुए में देखना नही चाहता । प्रलय-काल की अग्नि किस प्रकार कुलपर्वतो
के शिखरो को गिरा देती है, वैसे ही राम युद्ध में तुम्हारे सिर गिराने लगेंगे । उस दृश्य
को मै कैसे देख सकूँगा ?"
विभीषण की इन बातो को सुनते ही रावण के दसो मुख क्रोध से लाल हो गये,
कनपटी की शिराएँ फूल गईं और प्रचड गति से निःश्वास चलने लगा, मानो धूम से युक्त
अनल ही हो । अपने पदाघात से पृथ्वी को चूर-चूर करते हुए, तथा गर्जन से आकाश
को कँपाते हुए, अपने क्रोध का पूर्ण स्वरूप प्रकट करते हुए, तुरत वह सिंहासन से उतरकर
विभीषण की ओर लपका और उस पर प्रहार करने के लिए अपना खड्ग उठाया । फिर,
अपने-आप को रोककर उसने विभीषण पर पदाघात किया । तब वज्रपात से गिरनेवाले पर्वत के
उन्नत शिखर के समान विभीषण पृथ्वी पर गिर पड़ा । गिरे हुए विभीषण पर जब रावण
खड्ग का प्रहार करने का उपक्रम करने लगा, तब प्रहस्त ने उसे रोका । सभा के सभी
लोग कहने लगे—'हाय, यह कैसा अनर्थ है ?'
रावण की आँखो से क्रोध की ज्वालाएँ निकल रही थी । उसने प्रहस्त को देखकर
कहा—'हे प्रहस्त, तुमने इसके दुर्वचन सुने ? इसे अनुज मानकर इस पर कौन विश्वास कर
सकता है । इसको तुरत बाहर निकालो । सौजन्य के कारण विलव करो, तो मेरी सौगध है।'
तब प्रहस्त ने क्रोध प्रकट करते हुए विभीषण को देखकर कहा—'अव तुम यहाँ मत
रहो । यहाँ से तुम अपनी इच्छा से कही भी जाकर रहो।' तब विभीषण अत्यधिक क्रुद्ध
हुआ । उसने अनल, नल, हर, सपाति नामक अपने साथियो को साथ लेकर हाथ में गदा
लिये हुए वहाँ से चल पड़ा और चलने समय उसने रावण को देखकर कहा—'हे राक्षसेन्द्र,
तुम कामातुर हो, समस्त पापो का भाडार हो और क्रूर कर्म करनेवाले हो । मै पहले से
से ही तुम से दूर रहना चाहता था । तुम्हारा यह आचरण मेरे लिए नया नही है ।
युद्धकांड २६५
में उस आर्त-रक्षक, कृपानिधि, दिव्य मूर्ति, जगद्विख्यात, सत्यनिष्ठ, नित्य यशोनिधि और निर्मलात्मा
रामचन्द्र भूपाल की शरण में जाऊँगा । वे सदा शरणागत की रक्षा करते है । में तो जा
ही रहा हूँ । कम-से-कम भविष्य में तुम नीतिसपन्न होकर अपना जीवन व्यतीत करना ।
ऐसा नही करोगे, तो जब सुग्रीव लका पर आक्रमण करेगा, तब तुम्हें मेरे हित-वचन का
स्मरण होगा ; या जब वानर लंका को घेर लेंगे, तब तुम मेरी मन्त्रणा का स्मरण करोगे,
या रघुराम के भयंकर वाण तुम्हारा नाश करने लगेंगे, तब तो अवश्य मेरी वानो को याद
करोगे ।'
१४. विभीषण का अपनी माता के भवन में जाना
ऐसा कहकर विभीषण ने अपने अग्रज को प्रणाम किया और वड़े वेग से अपनी
माता के अत पुर की ओर चला । वह क्रुद्ध सिंह के आक्रमण से आहत होकर, उससे
बचकर जानेवाले मत्त हाथी के समान तथा भयकर रव के साथ गिरनेवाले वज्रपात से
खडित पर्वत के समान दीखते हुए अपनी माता के घर में पहुँचा । वह अत पुर विश्वकर्मा
से निर्मित था और कैलास पर्वत के सदृश शोभायमान था । अत पुर में पहुँचकर विभीषण ने
' अपनी माता को प्रणाम किया, जो अत्यन्त निर्मल प्रभा से दीप्तिमान् थी; पर रावण की
दुष्टता का स्मरण करके अत्यधिक दुखित हो रही थीं । वह श्वेत तथा मोटे वस्त्र धारण
किये हुए थी । उसकी भौंहें तथा केश, चन्द्रिका में घुलकर, आकाश-गंगा के झाग का रोगन
चढ़ाये हुए के समान अत्यधिक धवल दिखाई पडते थे और दर्शको में आदर का भाव
उत्पन्न करते थे । सहारा लेकर चलने के लिए उनके हाथ में एक डडा था । असंख्य वृद्ध
ब्राह्मण, उनके समीप उनकी सेवा में लगे हुए थे । करुणा-रूपी जल-प्रवाह सरस वाग्विलास-
रूपी लहरें, शम तथा दम-रूपी दोनो तट, धवल केश-रूपी झाग, निकटवर्ती ब्राह्मणो के
वेदोच्चारण की ध्वनि-रूपी जल-घोष असंख्य श्रेष्ठ ब्राह्मण-रूपी पक्षियो के साथ विलसित
होती हुई वह वृद्धा जाह्नवी के समान दीख रही थी । उसके निकट (बैठे हुए) कितने
ही ब्रह्मराक्षस वेद-पुराण तथा शास्त्र आदि पढकर उसे सुना रहे थे ।
अपनी वृद्धा माता को प्रणाम करके विभीषण आँखो में आँसू भरकर खडा रहा ।
उसे इस प्रकार दुखी देखकर माता कैकसी सभ्रमित हुईं और वडे स्नेह से उसे अपने क्रोड
में भरकर वार-वार कहने लगी--'हे वत्स, तुम इस प्रकार दुःखी क्यो हो ? क्या अत पुर पर
कोई ऐसी विपत्ति आई है, जिसका निवारण करना कठिन है ? या किमी ब्राह्मण का वध
हो चुका है ? या ब्रह्मा ने क्रोध किया है ? या शिव रुष्ट हो गये हैं ? या विष्णु क्रुद्ध
हो गये हैं ? या गमचन्द्रजी लका पर चढ आये हैं ? शीघ्र बताओ कि तुम्हारे दुख का क्या
कारण है, अन्यथा मेरे प्राण मेरे शरीर में नही रह सकेंगे ।'
तब विभीषण ने हाथ जोडकर कहा--'हे माता, सुनिए । आज आपका ज्येष्ठ पुत्र,
रविकुलाधीश राम के समुद्र-तट पर पहुँचने के सबंध में अपने मन्त्रियों के साथ परामर्श
कर रहे थे । तब मैने उनसे साग्रह निवेदन किया कि किमी भी प्रकार से सोचा जाय, उत्तम यही है
कि सीता को राम की सेवा में पहुँचा दिया जाय । यदि हम ऐसा न करें, तो अवश्य
ही राघव समुद्र पार करके आयेंगे और हमारे कुल का नाश करेंगे । इस पर रावण अग्नि
३४
२६६ रंगनाथ रामायण
समान जल उठे और मुझ पर ऐसा पदाघात किया कि आसन के साथ मै पृथ्वी पर गिर
पड़ा । इतने से सतुष्ट न होकर उन्होंने मुझपर खड्ग चलाना भी चाहा । किन्तु, मै किसी
तरह वहाँ से बचकर यहाँ आ गया हूँ । अब मै उसी राम भूपाल की शरण में जाऊँगा
और उनकी कृपा प्राप्त करके वही रहूँगा । अब यहाँ पर मेरे आप्त बंधु और कौन है
कि मै यहाँ रहूँ ।'
इन बातो को सुनकर कैकसी भय से मूर्च्छित हो गई और थोड़ी देर के बाद सँभल-
कर अपने पुत्र से कहने लगी—"हे वत्स, मै पूर्व से ही यह बात जानती हूँ । जिस समय
देवता, देवेन्द्र तथा ब्रह्मा ने अमृत सागर के निकट पहुँचकर भगवान् विष्णु को अपनी
विपत्तियो का वृत्तांत सुनाया, तब उन्होने कहा 'बड़ी निर्दयता से तुम्हें त्रास देनेवाले
क्रूर रावण तथा कुभकर्ण का वध करने के लिए मै सूर्यवश में जन्म लूँगा ।' तुम्हारे पिता
ने यह वृत्तांत मुझे विस्तार से सुनाया था । तब मैने भयभीत होकर अपने पति से पूछा—
'हे देव, आपके पुत्रो में कौन ऐसा पुण्यवान् है, जो आपके वश का उद्धार करेगा ?' तब
उन्होने कहा—'सत्य, धर्म, तथा पवित्रता से सपन्न, नित्य यशस्वी तुम्हारा कनिष्ठ पुत्र ही
राम की कृपा प्राप्त करके इस लका का पालन करेगा ।' इस प्रकार, कहकर तुम्हारे पिता
तपस्या करने के निमित्त मेरु पर्वत पर चले गये । हे पुत्र, सूर्यवशतिलक राम ही विष्णु है,
मानिनी सीता ही महालक्ष्मी है । क्या, तुम्हारे पिता विश्रवसु की बात मिथ्या हो
सकती है ? तुम अवश्य राम की शरण में रहते हुए सुखी रहो और राक्षस-कुल को
बचाने का प्रयत्न करो ।”
इतना कहकर उसने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और उसे मंत्राक्षत देकर विदा
किया । विभीषण ने भी अपनी माता को वार-वार प्रणाम किया, और मन-ही-मन प्रसन्न
होते हुए, अपने मत्रियो के साथ आकाश की ओर इस प्रकार उड़ा, मानो यह बता रहा हो
कि रावण के पच-प्राण उसका शरीर छोड़कर इसी प्रकार उड जायेंगे । उस गुणनिधि
विभीषण को देखकर लका के लोग अपने-अपने आँगनौ में तथा गलियो में एकत्र होकर
आपस में कहने लगे—'रावण ने धर्म का त्याग करके, भाई के प्रेम को भी ठुकराकर,
विभीषण को निर्वासित किया है । नीति-रीति तथा कुशलता को उसने तिलाजलि दे दी है।
रावण का नाश तो होगा ही, अब लका की क्या दशा होगी ?' कुछ लोग मन-ही-मन
सोचने लगे कि विभीषण ही अब लका का राजा होगा । कुछ अन्य यह सोचने लगे, क्या
विभीषण के राम से मिल जाने मात्र से रावण का नाश हो सकेगा ? ऐसे भी लोग थे,
जो सोच रहे थे कि भले ही यह (विभीषण) राम के पास जाय, क्या राम इसका विश्वास
करेंगे ?
१५ विभीषण की शरणागति
विभीषण अपने मत्रियो के साथ बडे हर्ष से, आकाश-मार्ग से, रामचन्द्र के निकट
आ रहा था । तब सभी वानरो ने अत्यंत आश्चर्य से उसकी ओर अपने सिर ऐसे उठाये
मानो वे देवताओ को यह बता रहे हो कि हे देवताओ, रामचन्द्र (रावण पर) आक्रमण
करने जा रहे है, परन्तु रावण अब अपने सिर नही उठा सकेगा, उसका कुल नष्ट होगा ।
युद्धकांड २६७
तुम लोग भय को त्यागकर अपने सिर उठाओ । तब सुग्रीव ने उन्हें देखकर कहा—'हे
वानरो, वह देखो, कोई अखड विक्रमी पर्वताकार, दीर्घकाय, शस्त्रो से सुसज्जित होकर
इसी ओर आ रहा है । देखो, वह कौन है ? तब सभी वानर बडे-बडे वृक्षो तथा पर्वतो
को हाथ में उठाकर कहने लगे—'हे सुग्रीव, हे देव, हमें उससे युद्ध करने के लिए भेजिए;
हम युद्ध में उस दैत्य का सहार करेंगे ।'
उनकी बातें सुनकर विभीषण ने कहा—'हे वानरो, मैं तुम्हारे पक्ष का ही व्यक्ति हूँ ।
इस प्रकार उतावले मत बनो । मैं रावण का भाई हूँ, किन्तु मैं उत्तम राक्षस तथा
निष्कलक मन का हूँ । श्रीराम की शरण पाने के निमित्त मैं लका से यहाँ उनकी सेवा
में आया हूँ । मैंने रावण को विविध रीति से समझाया कि तुम सीताजी को राम की
सेवा में पहुँचा दो, किन्तु रावण ने मेरी बातो से क्रुद्ध होकर भरी सभा में मुझ पर पद-
प्रहार किया । उससे सतुष्ट न होकर उसने निर्दय होकर मुझसे कहा कि यदि तुम मेरे
राज्य में रहोगे, तो मैं तुम्हारा वध कर
२६८ रंगनाथ रामायण
रक्षस भला है या बुरा । क्षत्रिय का धर्म यही है कि चाहे शत्रु ही क्यो न हो, यदि वह
शरणार्थी होकर आये, तो उसकी रक्षा करनी चाहिए । बाज के द्वारा पीछा किये जाने पर
एक कपोत ने व्याकुल होकर राजा शिवि की शरण ली थी और शिवि ने अपना शरीर
भी त्यागकर कबूतर की रक्षा की थी । जो व्यक्ति आर्त्त व्यक्ति को शरण देता है, वह
अश्वमेध यज्ञ करने से प्राप्त होनेवाले पुण्य का भागी बनता है । हे सुग्रीव, विभीषण
ही क्यो, यदि रावण ही स्वय अपना गर्व तजकर मेरी शरण में आये, तो मैं उसकी भी
रक्षा करूँगा । यही हमारे वंश की रीति है । हे भानुपुत्र, मैं उस विभीषण को शरण
दूँगा । तुम तुरंत जाकर उस भय-विह्वल विभीषण को ले आओ ।'
राम की कृपा-बुद्धि का विचार करके, सुग्रीव आँखें मुकुलित करके तथा सिर कँपाकर
कहने लगा—'हे प्रभु, अपने परम शत्रु के अनुज के शरण माँगते ही, उसे अभयदान देकर
उसकी रक्षा के लिए तत्पर होना इस संसार में आपके सिवा अन्य किस राजा के वश की
बात है !' इतना कहकर सुग्रीव अपनी सेना के साथ आकाश-पथ की ओर उड़ा और
विभीषण को देखकर बोला—'हे विभीषण, श्रीराम ने तुम्हें अभयदान दिया है । यह
सत्य-वचन है । अब तुम उनके पास चलो !' यों कहकर उसने राक्षसराज विभीषण को
अपने हृदय से लगा लिया और बड़े हर्ष से उसे राम के समक्ष ले आया ।
१७ विभीषण की स्तुति
विभीषण ने रामचन्द्र को देखकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगा—
“हे नित्य सत्यस्वरूप, हे नित्य कल्याण-रूप, हे नित्य जगद्रक्षक, हे नित्य देव, हे जगत्कारक,
हे जगत् के आदिवीर, हे सृष्टिकर्त्ता, हे सर्वसंगातीत, हे सर्वानुभूत, हे सर्वजगत् में पवित्र,
हे जगद्विधाता, हे गुरु-लघु रूप, हे गुरुज्ञान-रूप, हे मधुरभाषी, हे श्रेष्ठ धनुर्धर, हे पद्म-
सम-नेत्रवाले, पद्माङ्कलित शरीरवाले, हे समस्त जीवाधार, परम पवित्र-स्वरूप, कविजनो
के लिए वेद्य, करुणासिंधु, विविध शास्त्रों के आधार, वेदातवेदी, तुम ही परमात्मा हो, तुम
ही मोक्षहो, तुम ही परमविद्या हो, तुम ही संसारके कर्त्ता हो, तुम ही ससार हो, और तुम ही ससार के
हर्त्ता हो। तुम ही यज्ञ-भोक्ता हो, यज्ञ भी तुम ही हो, और यज्ञ-फल के प्रदाता तुम ही हो;
तुम ही सूर्य-चन्द्र हो, तुम ही जलधि हो, तुम ही इंद्र आदि देवता हो और पृथ्वी भी तुम ही हो ।
तुम ही त्रिमूर्ति हो और त्रिमूर्तियों के परे जो रूप है, वह भी तुम ही हो ।
क्षर तथा अक्षर तुम ही हो, क्षर तथा अक्षर के ज्ञाता भी तुम ही हो । हे शतकोटि
सूर्यसम तेजस्वी, तुम्हारी जय हो ! हे संसार-सर्प-सुपर्ण (संसार-रूपी साँप के लिए गरुड़
पक्षी के समान दीखनेवाले) तुम्हारी जय हो ! हे ललित आगमों से प्रशंसित, हे लक्ष्मीपति,
हे दयासमुद्र, हे विबुध-शत्रुनाशक, श्रेष्ठ मुनिवन्द्य, आद्यन्तरहित, हे शत्रुनाशक, हे दशरथ-
राम, दिनकर-शशि-नेत्रवाले, दिव्य चरित्रवान्, अनुपम शुभ गात्रवाले, अखिलाधार, सहस्र-
मुख आदिशेष भी क्या, तुम्हारी महिमा का वर्णन कर सकेगा ? क्या पद्मसंभव ब्रह्मा
भी तुम्हारी महिमा की स्तुति करने में समर्थ हैं ? फिर मेरी क्या शक्ति है कि मैं तुम्हारी
प्रशंसा करूँ ? तुम्हारी महिमा को जानने की शक्ति मुझमें कहाँ है ? तुम्हारी स्तुति
करने की क्षमता ही मुझमें कहाँ है । मैं दानव हूँ, चंचल चित्तवाला हूँ । हे राजन्,