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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 508 में से

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पृष्ठ 285

युद्धकांड २७५
ऐसा करेंगे, तो आपको भी (मेरे समान) कलंक लग जायगा । चन्द्रिका समस्त दिशाओ
में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्र विकट अट्टहास कर रहा हो कि हे राजा राम, जिस
शिव ने मुझे अपने सिर पर धारण करके मेरा सम्मान किया है, ऐसे शिवजी के धनुष
को तोडने के कारण ही आपको विरह-दुख हुआ है। उज्ज्वल चाँदनी चारो दिशाओ में
ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्रमा ने समुद्र के फेन-रूपी चदन को अपनी किरणो के द्वारा
लहरो से आकृष्ट करके, दिग्वधुओ के शरीर पर मल दिया हो । तब चकोर-चकोरी
अत्यधिक आनद से एक दूसरे का आलिंगन करते बार-बार अपनी चोचो को पसारकर
छककर चंद्रिका-रस का पान करते, बडे अनुराग से अपनी प्रियाओ को पिलाते, उनके पीने
पर स्वय पीते और इसी प्रकार बडे मोद-मग्न हो चन्द्रिका में खेलते-कूदते । इस प्रकार,
जब वे अपनी प्रियाओ से अलग होते, फिर उनको ढूँढकर उनके साथ बडे आनंद से रहने
लगते थे । इन पक्षियो को देखकर वियोग-दुःख से पीडित राम, सीताजी का स्मरण करके
मन-ही-मन अत्यधिक व्यथा का अनुभव करने लगते ।
अपने अग्रज को इस प्रकार सतप्त होते देख लक्ष्मण उन्हें शांति पहुँचाने
के उद्देश्य से बोले--'हे देव, आप अनुपम वीर हैं, उदात्त चित्तवाले हैं । आप इसके लिए क्यो
दुखी हैं । अभी हम समुद्र को पार करके लका पहुँचेंगे, युद्ध में दशकंठ का सहार करेंगे,
और मिथिलेश की प्रिय पुत्री, कमलवदनी सीता को मुक्त करेंगे । आप खिन्न न होइए ।'
अनुज के इन नम्र वचनो को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए ।
सैनिक-शिविरो में, वानर उस आनंदप्रद चाँदनी में मुदित मन से रामचन्द्र के गुणो
का गान करते, खेलते तथा कूदते रहे । कुछ लोग समुद्र के किनारे बडे आह्लाद से विचरण
कर रहे थे । कुछ लोग विष्णु के सभी अवतारो की कथाएँ दूसरो को सुना रहे थे, तो कुछ
वानर पिघलनेवाली उन चन्द्रकांत शिलाओ पर बडे आनंद से सोने का यत्न कर रहे थे ।
इस प्रकार, वे बडी देर तक विविध क्रीडाओ में मग्न रहे ।
शीघ्र ही पूर्व दिशा में अरुणिमा का ऐसा आभास हुआ, मानो वडवानल ही इस
भय से कपित होते हुए कि, जब राघव समुद्र पर अपने पैने बाणो का प्रयोग करेंगे, तब
उनका लक्ष्य बन जाऊँगा, उदयाचल पर चढ गया हो । सभी नक्षत्र इस भय से व्याकुल
हो छिपने लगे कि समुद्र का दहन करने के लिए राम के बाणो से उत्पन्न अग्नि की शिखाएँ
कही आकाश तक न व्याप्त हो जायें । धीरे-धीरे सूर्य का उदय होने लगा, मानो वे अपने
पौत्र (राम) को सचेत करने के लिए आ रहे हो कि हे राघव, अभी विलंब क्यो करते हो,
समुद्र को पार करके शीघ्र ही रावण का सहार करो । सभी कमल एक साथ ऐसे
विकसित हुए, मानो कमलाप्त-वशज (सूर्यवंशी) राघव का विजय-कमल, साम्राज्य-कमल, तथा
कीर्ति-कमल एक साथ ही विकसित हो रहे हो । तब दाशरथि जगकर प्रात कालीन मध्या-
वदन आदि नित्यकर्मो से निवृत्त हुए ।
६ मंत्रियों के साथ रावण की मंत्रणा
लका में रावण ने अपने मंत्रियो की सभा बुलाई और उनसे कहा--"हे मंत्रिवरों,
तुम जानते ही हो कि एक वानर ने, एक यत्र-सचालित चित्रो की भाँति, मेरे नगर में