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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 284

'हे सुग्रीव, हम तो समुद्र के किनारे पहुँच ही गये । अब कहाँ से और कैसे इस समुद्र को पार
किया जाय, इसका उपाय तुम सोचो । पहले एक सुंदर स्थान में इस वानर-सेना को ठहरने
की आज्ञा दो ।' सुग्रीव ने इस कार्य के लिए नील को नियुक्त किया । नील ने शीघ्र ही
सारी सेना को एक सुन्दर स्थान में ठहराने का प्रबंध किया । वानरों के, शिविरों में आने तथा
वहाँ उनके ठहरते समय जो तुमुल शब्द हो रहा था, वह सूर्यमंडल तक व्याप्त होकर
ऐसा लगता था, मानो वह समुद्र को डाँट रहा हो कि ऐ समुद्र, मैं स्वयं तो वनचरों
(वानर) से उत्पन्न हूँ, भला मैं तुम्हारे वनचरों से (जल-चर) उत्पन्न घोष को कैसे सहन
कर सकता हूँ और वह समुद्र के घोष को दबा देता था । सारी वानर-सेना, तीन सैनिक-
शिविरों में, समुद्र-तट पर स्थित वनों में ठहर गई ।
तब रामचंद्र ने लक्ष्मण से एकांत में कहा—'हे सौमित्र, इस समुद्र की विशालता
तो देखो, इसके अंत का पता कोई कैसे पा सकेगा ? इसी प्रकार दुःख-समुद्र का भी अंत
नहीं होगा ।'

५. संध्या-वर्णन

इस प्रकार कहते हुए प्रभु रामचंद्र जब दुःख-समुद्र में डूब गये, तब सूर्य भी पश्चिम
समुद्र में ऐसा डूब गया, मानो उसने ऐसा विचार किया हो कि रामचंद्र का जीवन ही
मेरा जीवन है । सूर्यास्त होते ही समस्त लोक मणिहीन मंजूषा की भाँति कांतिहीन
हो गये । संध्या-राग चारों ओर इस प्रकार व्याप्त हो गया, मानो मनसिज के बाणों की अग्नि
से तप्त मनवाले राम का शीतोपचार करने के निमित्त पश्चिम समुद्र राग-रंजित वस्त्र
लेकर आया हो । कमल-दलों का यौवन ढल जाने से, कमल अपने शेष सौंदर्य को लिये
हुए मुकुलित हो गये, मानो यह बता रहे हों कि राम के प्रताप के आगे इंद्र के शत्रु
रावण का मुँह भी ऐसा ही कुम्हला जायगा । चारों ओर अंधकार ऐसा व्याप्त होने लगा,
मानो राम का शीतोपचार करने के लिए दिग्बधुएँ ललित तमाल-पल्लव-राशियों को उछाल
रही हों । जहाँ-तहाँ कुमुद ऐसे विकसित हुए, मानो वे यह सोचकर हँस रहे हों कि सूर्यवंश-
तिलक राम की वधू को बंदी बनाकर हर्षित होनेवाले दनुजेंद्र का हर्ष भंग हो जायगा ।
सारा आकाश इस प्रकार नक्षत्र समूह से अलंकृत था, मानो वह इस बात की सूचना दे
रहा हो कि रामचंद्र के पैने शरों से मारा समुद्र सूख जायगा और उसके गर्भ में स्थित
रत्न-राशियाँ इस प्रकार दिखाई पड़ेंगी । आकाश के सारे नक्षत्र समुद्र के जल में इस प्रकार
प्रतिबिंबित हो रहे थे, मानो रामचंद्र के विरह-ताप का शमन करने के लिए निशासुंदरी ने
सुगंधित मल्लिका-पुष्पों की शय्या का प्रबंध कर दिया हो । चक्रवाक एक दूसरे से अलग होकर
शीघ्र गति से चारों दिशाओं में चले गये, जिससे सब दिशाओं में इस बात की घोषणा
करें कि श्रीरामचंद्र विरह-व्यथा से पीड़ित हो रहे हैं, यदि हम भी विरह में पीड़ित हों,
तो क्या, आश्चर्य है । चन्द्र अपनी किरणों को आकाश में व्याप्त करते हुए ऐसा उदित
होने लगा, मानो वह श्रीराम की निंदा यों कर रहा हो कि हे राजन्, मैं राजा (नक्षत्रों
का) होकर समुद्र को प्रसन्नता से प्रफुल्ल कर देता हूँ और आप राजा होकर उसको सुखा देना
चाहते हैं । आप पूर्णकला से समन्वित हैं, क्या आपके लिए यह उचित है ? यदि आप