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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 508 में से

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पृष्ठ 295

युद्धकांड २६५
में उस आर्त-रक्षक, कृपानिधि, दिव्य मूर्ति, जगद्विख्यात, सत्यनिष्ठ, नित्य यशोनिधि और निर्मलात्मा
रामचन्द्र भूपाल की शरण में जाऊँगा । वे सदा शरणागत की रक्षा करते है । में तो जा
ही रहा हूँ । कम-से-कम भविष्य में तुम नीतिसपन्न होकर अपना जीवन व्यतीत करना ।
ऐसा नही करोगे, तो जब सुग्रीव लका पर आक्रमण करेगा, तब तुम्हें मेरे हित-वचन का
स्मरण होगा ; या जब वानर लंका को घेर लेंगे, तब तुम मेरी मन्त्रणा का स्मरण करोगे,
या रघुराम के भयंकर वाण तुम्हारा नाश करने लगेंगे, तब तो अवश्य मेरी वानो को याद
करोगे ।'
१४. विभीषण का अपनी माता के भवन में जाना
ऐसा कहकर विभीषण ने अपने अग्रज को प्रणाम किया और वड़े वेग से अपनी
माता के अत पुर की ओर चला । वह क्रुद्ध सिंह के आक्रमण से आहत होकर, उससे
बचकर जानेवाले मत्त हाथी के समान तथा भयकर रव के साथ गिरनेवाले वज्रपात से
खडित पर्वत के समान दीखते हुए अपनी माता के घर में पहुँचा । वह अत पुर विश्वकर्मा
से निर्मित था और कैलास पर्वत के सदृश शोभायमान था । अत पुर में पहुँचकर विभीषण ने
' अपनी माता को प्रणाम किया, जो अत्यन्त निर्मल प्रभा से दीप्तिमान् थी; पर रावण की
दुष्टता का स्मरण करके अत्यधिक दुखित हो रही थीं । वह श्वेत तथा मोटे वस्त्र धारण
किये हुए थी । उसकी भौंहें तथा केश, चन्द्रिका में घुलकर, आकाश-गंगा के झाग का रोगन
चढ़ाये हुए के समान अत्यधिक धवल दिखाई पडते थे और दर्शको में आदर का भाव
उत्पन्न करते थे । सहारा लेकर चलने के लिए उनके हाथ में एक डडा था । असंख्य वृद्ध
ब्राह्मण, उनके समीप उनकी सेवा में लगे हुए थे । करुणा-रूपी जल-प्रवाह सरस वाग्विलास-
रूपी लहरें, शम तथा दम-रूपी दोनो तट, धवल केश-रूपी झाग, निकटवर्ती ब्राह्मणो के
वेदोच्चारण की ध्वनि-रूपी जल-घोष असंख्य श्रेष्ठ ब्राह्मण-रूपी पक्षियो के साथ विलसित
होती हुई वह वृद्धा जाह्नवी के समान दीख रही थी । उसके निकट (बैठे हुए) कितने
ही ब्रह्मराक्षस वेद-पुराण तथा शास्त्र आदि पढकर उसे सुना रहे थे ।
अपनी वृद्धा माता को प्रणाम करके विभीषण आँखो में आँसू भरकर खडा रहा ।
उसे इस प्रकार दुखी देखकर माता कैकसी सभ्रमित हुईं और वडे स्नेह से उसे अपने क्रोड
में भरकर वार-वार कहने लगी--'हे वत्स, तुम इस प्रकार दुःखी क्यो हो ? क्या अत पुर पर
कोई ऐसी विपत्ति आई है, जिसका निवारण करना कठिन है ? या किमी ब्राह्मण का वध
हो चुका है ? या ब्रह्मा ने क्रोध किया है ? या शिव रुष्ट हो गये हैं ? या विष्णु क्रुद्ध
हो गये हैं ? या गमचन्द्रजी लका पर चढ आये हैं ? शीघ्र बताओ कि तुम्हारे दुख का क्या
कारण है, अन्यथा मेरे प्राण मेरे शरीर में नही रह सकेंगे ।'
तब विभीषण ने हाथ जोडकर कहा--'हे माता, सुनिए । आज आपका ज्येष्ठ पुत्र,
रविकुलाधीश राम के समुद्र-तट पर पहुँचने के सबंध में अपने मन्त्रियों के साथ परामर्श
कर रहे थे । तब मैने उनसे साग्रह निवेदन किया कि किमी भी प्रकार से सोचा जाय, उत्तम यही है
कि सीता को राम की सेवा में पहुँचा दिया जाय । यदि हम ऐसा न करें, तो अवश्य
ही राघव समुद्र पार करके आयेंगे और हमारे कुल का नाश करेंगे । इस पर रावण अग्नि
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