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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 508 में से

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पृष्ठ 283

युद्धकांड २५३
मनुवंशचन्द्र, (रामचन्द्र) के सान्निध्य से वह सेना-समुद्र उद्वेलित हो रहा था । इस प्रकार
वह वानर-सेना-समुद्र (दक्षिण के) महासागर के गर्व को चूर करने के लिए निकल पडा।
(उस सेना-समुद्र के बीच में) धीर राम-लक्ष्मण आकाश के मध्य भाग में प्रकाशमान होने-
वाले सूर्य तथा चन्द्र की भाँति सुशोभित थे । जब नदियो में उतरकर सेना चलने लगी, तब
नदी का पानी उमडने लगा । जब वह सेना सह्याद्रि पर्वत तथा मलय पर्वत के मध्य भाग
से होकर जाने लगी, तब मद पवन के चलने से वृक्षो की शाखाएँ आपस में रगड खाकर
उन वानरो पर पुष्प बरसाने लगी । यह उचित ही तो था । वन-लक्ष्मी प्रभु राम के
आगमन से हर्षित होकर पुष्पाञ्जलि दिये बिना कैसे रह सकती थी ?
वानर-वीर उस पर्वत-प्रदेश में स्थित सरोवरों में उतरकर उनका निर्मल जल
पानकर सतुष्ट होते । उन सरोवरों में पाये जानेवाले कमल-समूहो को वे अपने कर-कमल-
युग्मो से इस प्रकार तोडते, मानो कह रहे हो कि हे कमलाकर, (सरोवर) जैसे कमलो का
शत्रु (चद्रमा) क्रोध में कमलो को जैसे तोड डालेगा, वैसे ही हमारे कमलाप्त-कुल-तिलक
(सूर्यवशतिलक) दशकठ के वदन-कमलो को भी तोड देगा । वे इस प्रकार कुमुदो*
को कुचल डालते थे, मानो कह रहे हो कि हम दुष्ट-शत्रु की स्त्रयो को दुख* देकर, जानकी
के दुखो* को भी इसी प्रकार* कुचल डालेंगे । सरोवरों के गर्भ से दीर्घ मृनालो को वे इस
प्रकार उखाडते थे, मानो कह रहे हो कि हम राक्षसो के उदरस्थ आँतो को इसी प्रकार
चीरकर बाहर निकालेंगे । इस प्रकार के विनोदो में मग्न होते हुए सभी वानर सरोवरों
के किनारे लाँघकर जाते और फिर पहाडो पर चढकर वहाँ प्राप्त होनेवाला मधु छककर
खाते और फिर जल पीकर बडे उत्साह के साथ आगे बढते जाते थे ।
४ महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र का देखना
तब रामचन्द्र ने महेन्द्र पर्वत पर चढकर वहाँ से अनतिदूर पर दीखनेवाले समुद्र
का अवलोकन किया । वह समुद्र विविध क्रूर प्राणियो को अपने गर्भ में एकत्र किये हुए
बडा प्रचड रूप धारण करके ऐसा कहते हुए-से दिखाई दे रहा था कि जो रावण दीर्घ-
काय मगर-रूपी हाथियो के झुडो से, उत्तुग तरग-रूपी घोडो से, कछुए तथा केंकडे-रूपी
रथ-समूह से, असख्य मत्स्य-रूपी सैनिको मे, सर्पों के फन-रूपी पताकाओ से, उनकी सुदर
तथा चटुल पूँछ-रूपी खड्गोसे, मीनावली-रूपी चामरो से, ऊपर तैरनेवाले झाग-रूपी छत्रो से,
घनघोष-रूपी भेरी-निनाद से तथा जल-रूपी वीर रस से, मेरी शरण में आया हुआ है,
उसका वध में कैसे करने दूँ गा ?
ऐसे विशाल समुद्र को देखकर राघव आश्चर्यचकित हुए और निदान उस समुद्र
के निकट पहुँचे । समुद्र के किनारे समस्त सेना को एकत्र करने लायक चन्द्रकात शिलाओ
से पूर्ण एक विशाल प्रदेश में रामचन्द्र इस प्रकार बैठ गये, मानो वे अपने शर-रूपी वसी
से समुद्र के आश्रय में विचरनेवाले रावण-रूपी मोटे पाठीन (मछली विशेष) को पकड़ने
के लिए बैठे हो । तब वे अपने पास ही बैठे हुए सूर्यपुत्र सुग्रीव को देखकर बोले-

  • इन सभी शब्दो के लिए तेलुगु में एक ही शब्द (तोग) का उपयोग होता है ।
    कवि ने यहाँ इस शब्द का प्रयोग करके यमक अलकार सिद्ध किया है । —लेखक