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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 508 में से

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पृष्ठ 294

२६४ रंगनाथ रामायण
तब विभीषण ने मन-ही-मन हँसते हुए रावण से कहा—"हे राक्षसाधीश, देवताओ
की वृद्धि करने, ऋषियो की रक्षा करने, तथा असुरो को दड देकर पृथ्वी का पालन करने
के लिए आदिनारायण ने सूर्यवश में दशरथ का पुत्र होकर जन्म लिया है । उस महा
महिमा-सपन्न आदि देव की महिमा का वर्णन ब्रह्मा भी नही कर सकता । सनकादि मुनि
भी उसका वखान नही कर सकते । भला, तुम उनकी महिमा कैसे जान सकोगे । राम
साधारण मानव नही हैं । इसलिए यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो राम के दर्शन
करके कमलमुखी सीता को उन्हें सौंप दो । विचार करके देखो, अर्थ तथा काम मात्र की
प्राप्ति से धर्म की सिद्धि नही हो सकती । तुम तो कभी नीतिमार्ग का अनुसरण करना
नही चाहते । तुमसे भी अधिक तुम्हारे मित्र तथा अनुयायी उसे नही चाहते । हे दानवेन्द्र,
कार्य तथा अकार्य का विवेक नही रखनेवाले तुम्हारे लिए धर्म का क्या मूल्य हो सकता है ?
वानर अवश्य समुद्र पार करके यहाँ आयेंगे । हाथ जोडकर (दया की भिक्षा माँगने-
वाली) राक्षस-स्त्रियो के केश पकडकर उन्हें घसीटेंगे । ऐसा करने के पहले ही तुम सीता
को रामचन्द्र के पास पहुँचा दो । यही मेरा तुम से अनुरोध है । मै तुम्हें राज करते हुए
देखना चाहता हूँ, अग्नि-ज्वालाओ के सदृश राघव के असंख्य शरो को उद्दण्डता से तुम्हारे
वक्ष पर लगते हुए में देखना नही चाहता । प्रलय-काल की अग्नि किस प्रकार कुलपर्वतो
के शिखरो को गिरा देती है, वैसे ही राम युद्ध में तुम्हारे सिर गिराने लगेंगे । उस दृश्य
को मै कैसे देख सकूँगा ?"
विभीषण की इन बातो को सुनते ही रावण के दसो मुख क्रोध से लाल हो गये,
कनपटी की शिराएँ फूल गईं और प्रचड गति से निःश्वास चलने लगा, मानो धूम से युक्त
अनल ही हो । अपने पदाघात से पृथ्वी को चूर-चूर करते हुए, तथा गर्जन से आकाश
को कँपाते हुए, अपने क्रोध का पूर्ण स्वरूप प्रकट करते हुए, तुरत वह सिंहासन से उतरकर
विभीषण की ओर लपका और उस पर प्रहार करने के लिए अपना खड्ग उठाया । फिर,
अपने-आप को रोककर उसने विभीषण पर पदाघात किया । तब वज्रपात से गिरनेवाले पर्वत के
उन्नत शिखर के समान विभीषण पृथ्वी पर गिर पड़ा । गिरे हुए विभीषण पर जब रावण
खड्ग का प्रहार करने का उपक्रम करने लगा, तब प्रहस्त ने उसे रोका । सभा के सभी
लोग कहने लगे—'हाय, यह कैसा अनर्थ है ?'
रावण की आँखो से क्रोध की ज्वालाएँ निकल रही थी । उसने प्रहस्त को देखकर
कहा—'हे प्रहस्त, तुमने इसके दुर्वचन सुने ? इसे अनुज मानकर इस पर कौन विश्वास कर
सकता है । इसको तुरत बाहर निकालो । सौजन्य के कारण विलव करो, तो मेरी सौगध है।'
तब प्रहस्त ने क्रोध प्रकट करते हुए विभीषण को देखकर कहा—'अव तुम यहाँ मत
रहो । यहाँ से तुम अपनी इच्छा से कही भी जाकर रहो।' तब विभीषण अत्यधिक क्रुद्ध
हुआ । उसने अनल, नल, हर, सपाति नामक अपने साथियो को साथ लेकर हाथ में गदा
लिये हुए वहाँ से चल पड़ा और चलने समय उसने रावण को देखकर कहा—'हे राक्षसेन्द्र,
तुम कामातुर हो, समस्त पापो का भाडार हो और क्रूर कर्म करनेवाले हो । मै पहले से
से ही तुम से दूर रहना चाहता था । तुम्हारा यह आचरण मेरे लिए नया नही है ।