सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 286

[Page Header]
२५६ | रंगनाथ रामायण

प्रवेश किया, लकिनी का वध किया, सीता के लिए लका को शोध डाला, मेरे पुत्र का वध
किया, मेरी शक्ति का तिरस्कार करते हुए मेरी नगरी को जलाकर भस्म किया और
बहुत-से राक्षसो का वध किया । वह हमारे हाथ में फँसकर भी हमारे हाथ से वचकर
चला गया । वही राघवो को समुद्र के किनारे ले आया है । यदि सूर्यवशतिलक
समुद्र को सुखाकर या समुद्र पर पुल वाँधकर इस पार चला आया, तो हमारा सब किया-
कराया मिट्टी में मिल जायगा । उसके समुद्र पार करने के पहले हम क्या उपाय करें,
जिससे वह लका में नही आ सके । तुम अच्छी तरह सोच-विचारकर कहो कि हमारा
अब क्या कर्त्तव्य है । यदि तुम्हारा बताया हुआ उपाय उपयोगी होगा, तो वैसा ही करेंगे ।”
तब उन मूर्ख मत्रियो ने राक्षसेश्वर से कहा—“हे देव, आपके वश में बहुत-से ऐसे
दिव्यास्त्र हे, जो देवताओ के लिए भी अजेय है । आप ने सर्पराज को वाँधा, उसका विष
उगलवाकर गर्व-भग किया । रुद्र के मित्र कुवेर का गर्व चूर करके आपने उसका
पुष्पक विमान ले लिया । मय की ख्याति को नष्ट करके उसकी प्रिय पुत्री से विवाह कर
लिया । मृत्यु-देवता अंतक (यम) को वदी बनाकर उस अंतक के लिए आप अंतक वन गये ।
अनुपम वलगाली वरुण को कँपा दिया और उसे अपने वश में कर लिया । हे सम्राट्,
आपने सभी चक्रवर्त्तियो के राज्य बात-की-बात में हस्तगत कर लिये । क्या आपने शूलपाणि
(शिव) के निकट अपने वाहुवल का प्रदर्शन करके उनको नीचा नही दिखाया ? क्या,
स्वर्ग के देवताओ के साथ उस इन्द्र का गर्व आपने नही तोड़ा ? क्या, आपने अग्नि को अपनी
प्रतापाग्नि का ताप दिखाकर उसका ताप नष्ट नही किया ? क्या, दैत्यनाथ नैऋत पर क्रुद्ध
होकर अपने पराक्रम से उसका गर्व-भग नही किया ? आपने पवन को एक स्थान पर स्थिर
रहने नही दिया और अपने वाहुवल से उसे विचलित कर दिया । राम तो एक मानवमात्र है
और आप मनुष्य-भक्षी है । यह कैसे सभव है कि वह आपके हाथो से वचकर जीवित रहे ?
आपके पुत्र ने ईश्वर की प्रीति के लिए महेश्वर-यज्ञ करके शाश्वत कीर्त्ति तथा पूर्ण
सफलता प्राप्त की, इन्द्र को जीतकर उसने इंद्रजीत का नाम प्राप्त किया । उसने इद्र
को भी वदी वनाया था, किन्तु ब्रह्मा के प्रार्थना करने पर उन्होने उसे ब्रह्मा को दे दिया ।
क्या, युद्ध में विजय पाने के लिए वह अकेला ही पर्याप्त नही है ? हे दैत्यराज, आपको
चिता करने की कोई आवश्यकता नही है ।”

७. दानव-वीरों के दर्पपूर्ण वचन

इस प्रकार, जब मत्री रावण को समझा रहे थे, तब महान् वलशाली एव प्रलय-काल
के रुद्र को भी परास्त करनेवाले शूर, ब्रह्मास्त, इंद्रजीत, शतमाय, दुर्मुख, अतिकाय, मकराक्ष,
खड्गरोम, वृश्चिकरोम, सर्परोम, अग्निवर्ण, विरूपाक्ष, अक्षीणवल धूम्राक्ष, अक्षतविजयी
उपाक्ष, अनुपम बली रश्मिकेतन, अमित पराक्रमी अग्निकेतन, वज्रदंष्ट्र, सप्तघ्न, शोणिताक्ष,
प्रवलशूर महापार्श्व, कुभ, निकुंभ, सूर्यशत्रु, अग्निकोपन, महोदर, देवताओ को जीतनेवाला
देवांतक, अद्वितीय पराक्रमी तथा नरो का नाश करनेवाला एव भयंकर आकारवाला महाकाय,
विद्युज्जिह्व, कंपन तथा अकपन आदि अभेद्य विक्रमी एव श्रेष्ठ दैत्यवीर, राक्षस राजा
रावण के सामने क्रोधाभिभूत होकर खड़े रहे । उनकी लाल-लाल आँखो मे क्रोध की भयकर